धर्मवीर भारती जी की कालजयी रचना अंधायुग में एक प्रसंग है जहाँ गांधारी कृष्ण को शाप देती है।

गांधारी :

तो सुनो कृष्ण
प्रभू हो या परात्पर हो
कुछ भी हो
सारा तुम्हारा वंश
इसी तरह पागल कुत्तों की तरह
एक दूसरे को फाड़ खायेगा
तुम खुद उनका विनाश करके कई वर्षों बाद
किसी घने जंगल में
साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
प्रभू हो पर मारे जाओगे एक पशु की तरह

…………
कृष्ण :

माता!
प्रभू हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा, तुम माता हो
…..
अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं वरन मैं ही मरा हूँ करोड़ों बार
……..
जीवन हूँ मैं तो मृत्यू भी तो मैं ही हूँ माँ
शाप तुम्हारा स्वीकार है।

एक असहनीय दुख है उपरोक्त गांधारी कृष्ण संवाद में। दुख और क्रोध से भरी गांधारी कृष्ण को शाप तो दे देती हैं परन्तु कृष्ण के इस प्रकार शाप को स्वीकार करने से स्थितियाँ एकदम से बदल जाती हैं उनके लिये और गांधारी रोने लगती हैं।

गांधारी:

यह क्या किया तुमने
रोई नहीं मैं अपने सौ पुत्रों के लिये
लेकिन कृष्ण तुम पर
मेरी ममता अगाध है
कर देते तुम शाप यह मेरा अस्वीकार
तो क्या मुझे दुख होता?
मैं थी निराश, मैं कटु थी
पुत्रहीना थी।

कृष्ण:

ऐसा मत कहो
माता!
जब तक मैं जीवित हूँ
पुत्रहीन नहीं हो तुम।
प्रभू हूँ या परात्पर
पुत्र हूँ तुम्हारा
तुम माता हो ।

जो दुख, जो भाव अंधायुग से लिये गये उपरोक्त प्रंसंग में है उसमें अगर ऐसा भी जोड़ दिया जाये कि कृष्ण वहाँ नहीं हैं और गांधारी को बाद में अपराध बोध होता है अपने द्वारा दिये गये शाप के कारण तो कृष्ण की अनुपस्थिति में गांधारी को हुयी छटपटाहट का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। गांधारी को तो साक्षात कृष्ण द्वारा ही संबल मिल गया पर बाकी चरित्र तो कृष्ण के बिना उनसे एक बार और मिलने के लिये छटपटाकर रह गये। और दिनकर जोशी की पुस्तक कृष्ण के पीछे छूट गये चरित्रों की विवशता का ही वर्णन करती है।

भावों को महत्व देने वाले जिस किसी भी भारतीय साहित्य प्रेमी ने इस पुस्तक को न पढ़ा हो उसके लिये इसका न पढ़ा जाना ऐसे ही है जैसे कि कोई बहुत मूल्यवान चीज थी हमारे आस पास और हम चूक गये उसके दर्शन करने से।

…[राकेश]


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