जिस मर्डर मिस्ट्री थ्रिलर को यश चोपड़ा ने बस यूँ ही वक्त के बाद अगली बड़ी फ़िल्म बनाने की तैयारियों के बीच छोटी सी अवधि में सीमित साधनों के साथ बना लिया था वह पिछले 5 दशकों से ज्यादा समय से दर्शकों को आकर्षित करती आ रही है|
राजेश खन्ना और यश चोपड़ा के इस पहले संयुक्त प्रयास के साथ इतना तो निश्चित रहता है कि इसे पहली ही बार देख रहे दर्शक पौने दो घंटे लम्बी फ़िल्म में कम से कम सवा घंटे तक फ़िल्म से आगे निकल कर यह अनुमान नहीं लगा सकते कि आगे क्या होगा?
हत्यारा कौन? एक मर्डर मिस्ट्री पर आधारित फ़िल्म में सबसे बड़ा राज़ यही होता है कि अगर क़त्ल हुआ है तो कातिल कौन है?
अच्छे को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है, एक फ़िल्मी गीत की ही पंक्ति है और यह बेहद आसान है कि बदनाम व्यक्ति के नाम पर कुछ भी किये जाओ और कृत्यों को उसके नाम चढाते चले जाओ और दुनिया इस बात को आसानी से मान लेगी और मान ही लेती है| ऐसा बहुत होता है कि किसी कुख्यात हो चुके गुंडे बदमाश के नाम छुटभैये भी अपराध करके क़ानून की निगाहों से बचे रहते हैं क्योंकि अपराध तो उस कुख्यात बदमाश के नाम दर्ज होते जा रहे हैं|
दर्यकों के मध्य फ़िल्म – इत्तेफाक, की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि परदे पर जो चरित्र दिखाई दे रहे हैं,उनके कृत्य उस वक्त दर्शक के लिए बेहद विश्वसनीय लगते हैं या नहीं| एक ही चरित्र आधे घंटे तक एक रंग में दर्शक के सामने आकर उन्हें एक दिशा में चलने के लिए राजी करता है और दर्शक को वही रास्ता सही दिखाई देता है लेकिन घटनाएं ऐसे मोड़ पर करवट ले लेती हैं कि वही चरित्र अब दूसरे ही रंग में रंगा दिखाई देने लगता है और वह एक संदिग्ध चरित्र नज़र आने लगता है|
एक खून होता है और मौजूद सुबूतों के आधार पर उस पर मुकदमा चलता भी है|
ज़िंदगी में इत्तेफाक भी हुआ ही करते हैं| लगातार ढलाई पर फिसलती जा रही ज़िंदगी की गाडी किसी इत्तेफाक से ऊपर की ओर चढ़ाई चढ़ने लग जाती है और लगातार आसमान में उड़ रही ज़िंदगी की पतंग की डोर किसी इत्तेफाक से कट जाती है और ज़िंदगी कटी पतंग और शाख से टूटे सूखे पत्ते की तरह दिशाहीन भटकने लग जाती है|
मुलजिम कानूनी गिरफ्त से भागकर एक घर में शरण ले ले तो यह एक इत्तेफाक ही है, और उस बड़े से घर में एक अकेली स्त्री ही उपस्थित है यह भी महज एक इत्तेफाक ही है| क़ानून से भागा पुरुष एक अकेली स्त्री को अपने नियंत्रण में कर ही लेगा इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं होगी| स्त्री की असहायता से दर्शक चाहेंगे कि जल्दी कुछ हो जिससे परदे पर सब कुछ सामन्य हो जाए| कानूनी पकड़ से भागे पुरुष ने खून किया या नहीं यह पता लगे और वह किसे और कब इस स्त्री को मुक्त कर देगा यह देखने को मिले|
अब घटनाओं का केंद्र यह घर है| पूरी रात काटनी है युवक को, और उस अजनबी जो अपराधी घोषित हो चुका है, के साथ, शहर से बाहर गए पति की अनुपस्थिति में अकेली रह गयी युवती को| पुरुष को दर्शक नायक के रूप में फिल्मों में देखते रहे हैं तो उनकी भावनाएं रहती हैं कि हो न हो यह बेचारा परिस्थितियों का शिकार हुआ है और जल्द इसके साथ इन्साफ होगा| शायद इसे फंसाया गया है|
स्त्री को दर्शक अभी तक घरेलू किस्म के नायिकाओं और सह नायिकाओं वाली भूमिकाओं में फिल्मों में देखते आये हैं| उसके मुखड़े पर सरल, स्मित और सीधे पन के भाव रहते हैं| ये बेचारी एक अकेली स्त्री कैसे एक अजनबी अपराधी के साथ पूरी रात का समय काट पायेगी? दोनों परिस्थितियों के शिकार लगते हैं| जैसे जैसे रात आगे बढ़ती है उन दोनों चरित्रों में परस्पर बढ़ती नजदीकी दर्शक को स्वाभाविक और मानवीय लगती है|
पर ऐसे आकर्षण के वशीभूत होकर तो कोई थ्रिलर कैसे आगे बढेगा? हर सामान्य 15 मिनटों के बाद फ़िल्म में कुछ धमाके दार न घटे तो दर्शक उत्तेजना से कैसे भरेंगे|
सो एक और अपराध कहीं घटता है और असल अपराधियों के लिए सबसे आसान है पुलिस की गिरफ्त से फरार व्यक्ति के ऊपर इस दूसरे अपराध की जिम्मेदारी को डाल देना|
अपनी ज़िंदगी की सबसे कठिन रात में तमाम मुश्किलों से घिरे पुरुष को अपने विरुद्ध खड़े हो गए या खड़े किये गए वातावरण से अकेले लड़ना है|
पेचीदा गुत्थियाँ उसे खुद ही सुलझानी हैं क्योंकि बाकी सब तो उसके विरुद्ध हैं हीं|
स्लिप ऑफ़ टंग एक बड़ी मुसीबत बन सकती है| ज़रा सी लापरवाही अपराधियों के लिए क़ानून का शिकंजा उनके ऊपर कस देती है|
अपराधियों की सावधानी पूर्वक बुनी योजना के तार भी जीवन में इत्तेफाक से घटी छोटी सी घटना भी छिन्न भिन्न कर सकती है|
बड़ी मुसीबत में भी अगर धैर्य से, पूरे होश में दिमाग को सुचारू रूप से उपयोग में लाकर व्यक्ति अपने जीवन की दिशा को बदल सकता है| और जो तंत्र अभी विरोध में खडा दिखाई देता है वही साथ में आता नजर आने लगता है|
इस कसे हुए थ्रिलर में अभिनय से भी बड़ा कथानक दिखाई देता है और वह काम कर जाता है|
मुख्यतः एक ही रात की कथा के तौर पर इत्तेफाक एक आकर्षक थ्रिलर रहा है| पहली पहली बार इसके दर्शन कर पाने वाले दर्शकों में कम ही होंगे जिन्हें ये पसंद न आये|
बड़ी समस्याओं से घिरे चित्रकार के रूप में राजेश खन्ना और रहस्यमयी नायिका के रूप में नंदा के अपने अपने व्यक्तित्व उन्हें मिले चरित्रों पर सटीक बैठते हैं| नंदा ने इससे पहले सरल नायिका या सह नायिकाओं की भूमिकाएं ही निभाई थीं अतः इस ग्लैमर से भरपूर चरित्र में उनकी उपस्थिति दर्शकों के दिमाग से खेलती है और उन्हें पहले से कुछ सोचकर फ़िल्म के बहते कथानक से आगे निकलने नहीं देती|
…[राकेश]
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