पीयूष गुप्ता द्वारा निर्देशित फ़िल्म – तरला, जो कला की, विशेषज्ञ , कलाकार एवं वैज्ञानिक तरला दलाल की बायोपिक है और “स्त्री विमर्श” को आधुनिक काल में केंद्र में रखती है| भारत में स्त्री विमर्श और स्त्री प्रगति पर बनी एक सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म स्त्री के घर से बाहर का काम करने के कारण उसके घरेलू जीवन पर पड़ने वाले असर को माइक्रोस्कोपिक अन्वेषण के जरिये विस्तार से दिखाती है|

तरला हर उस एक लडकी जैसी है जो जीवन में अपने दम पर कुछ करना चाहती थी और यह फ़िल्म उसके विवाह से ठीक पहले से शुरू हुयी कहानी है|

“शादी कर लो, फिर पति के साथ रहकर जो करना है करती रहना” के अस्त्र के समक्ष, अपने माता पिता की परेशानियां देख समझ रही लडकी जीवन के इस पड़ाव से समझौता करके विवाह रुपी अनजान पथ पर पांव रख देती है| और जल्दी ही घर गृहस्थी में रम कर अपने कुछ करने के सपने को भूल सी जाती है जब तक कि उसके व्यंजन कला के गुणों से कुछ सीखने आई एक अविवाहित लडकी उसे यह कह कर चेताती नहीं कि अगर उसका विवाह हो गया और वह अपने सपनों के मुताबिक़ एक जर्नलिस्ट नहीं बन पाई तो वह भी तरला की तरह एक घरेलू स्त्री बन कर रह जायेगी|

यह उस समय की सामाजिक कथा है जब कुकिंग की कला सीखना लड़कियों के लिए अति आवश्यक माना जाता था ताकि उनका विवाह हो सके और वे अपनी गृहस्थी जमा सकें| घर परिवारों में एक से बढ़कर एक कुकिंग एक्सपर्ट स्त्रियाँ देश के कोने कोने में हर काल में मिलती रही हैं और उनकी विशेषज्ञता की तारीफ उन्हें जानने वाले एक छोटे से दायरे में सीमित रही है|

असली तरला दलाल से दूरदर्शन के सुरभि कार्यक्रम के संयोजक सिद्धार्थ काक ने पूछा था, जिसे फ़िल्म में दिखाया गया है,” बड़े बड़े फाइव स्टार होटलों में या अन्ज जगहों पर प्रसिद्द शैफ पुरुष ही क्यों होते हैं?

तरला दलाल ने बदलते समय आधारित एक जवाब उन्हें दिया लेकिन इसका एक पक्ष यह भी है कि ये प्रसिद्द पुरुष शैफ भी सारी उम्र अपनी माँ, दादी, नानी, मौसी, और बुआ आदि इत्यादि के द्वारा उन्हें बचपन में खिलाये गए स्वादिष्ट व्यंजनों को खाने के बाद मिले तृप्ति के अहसास की पुनरावृत्ति ही सारी उम्र चाहते रहते हैं|

विशिष्ट व्यंजन बनाना तरला की विशेषज्ञता है, वह इस क्षेत्र की वैज्ञानिक है, मांस बनाने और खाने से परहेज करने वाली तरला, मांस के प्रसिद्द व्यंजनों को बनाने की विधियों को शाकाहारी व्यंजन बनाने में परिवर्तित करके अपने मांसाहारी पति, पड़ोसन एवं अन्य लोगों को मांसाहार जैसी तृप्ति शाकाहारी व्यंजनों से दिलवा देती है|

आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है, इस एक उक्ति को तरला के जीवन में कई बार फलीभूत होते देखा जा सकता है|

उसकी कुकिंग रेसिपी बुक को रुढ़िवादी परंपरागत प्रकाशक छापने से इनकार कर देते हैं तो तरला का पति प्रकाशक बन जाता है|

पुस्तक केवल कुछ हजार पाठकों तक ही पहुंचेगी तो टीवी के माध्यम से कुकिंग शो के द्वारा देश के करोड़ों स्त्री पुरुषों तक पहुँचने का मार्ग जन्म ले लेता है और चूंकि जो लोग इस टीवी कार्यक्रम के व्यापार में लगे हुए हैं उन्हें ऐसे शोज़ चाहियें जो ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को प्रभावित कर सकें तो वे खुद तरला के गुणों के कारण उस तक पहुँचते हैं|

एक साधे सब सधे” की उक्ति भी तरला दलाल के जीवन पर लागू होती है| उसकी एक प्रतिभा है और उसमें वह गजब की पारंगत है अतः जीवन में उसके पास सभी कुछ इस एक गुण में कुशलता प्राप्त करने से आ जाता है|

फ़िल्म की जान इसके द्वारा अपने विषय अर्थात तरला दलाल के जीवन, में गहराई से उतरने में बसती है|

तरला का पति एक निजी टेक्सटाइल कम्पनी में इंजिनियर है, उनके तीन बच्चे हैं| पति को विवाह के बाद से और तीनों बच्चों को जन्म से ही तरला द्वारा प्रेम और अपने विशिष्ट गुणों से बनये खाने को खाने की आदत है| किसी भी व्यक्ति को एक विशेष सुविधा देकर उसे उसके जीवन से हटा लिया जाये तो उसे इस भाव के कारण बहुत बड़ी मानसिक व्याधि का सामना करना पड़ता है और अगर बात भोजन जैसी अति आवश्यक सामग्री की हो तो शारीरिक स्तर पर भी यह अभाव आक्रमण करेगा ही|

बाहर के जीवन में तरला की जितनी व्यस्तता बढ़ेगी और जितनी इस कारन उसकी प्रसिद्धि बढ़ेगी उस तुलना में उसके पति का कद अपने आप छोटा होता जाएगा और पुरुष प्रधान समाज में इस स्थिति को संभालना हरेक पक्ष – प्रसिद्धि और सफलता पाती जा रही पत्नी, उसे ऐसा प्राप्त करता देख रहे पति, पति के परिवार वालों, पति-पत्नी के सामाजिक परिचितों, सभी के लिए मुश्किल होगा ही होगा| फ़िल्म इस बेहद महत्वपूर्ण पहलू को बड़े अच्छे ढंग से दिखाती है और इसकी गहराई में भी जाती है|

फ़िल्म का यह पक्ष देश के सारे कामकाजी स्त्री पुरुषों के लिए देखना और समझना अति आवश्यक है और यहीं ऐसे ही मोड़ों पर आकर तरला एक फ़िल्म से बहुत बड़ी उपस्थिति बन जाती है|

जो ऐसी स्थिति में सही है और होना चाहिए वही फ़िल्म दिखाकर इस समस्या का पटाक्षेप करती है और विषय को प्रगतिवाद की राह पर आगे बढ़ा देती है|

तरला की भूमिका में हुमा कुरैशी बहुत शानदार हैं, अगर उनके मुंह में नकली दांत न लगाए जाते तो उनकी भूमिका और उसमें उनकी अदाकारी और ज्यादा निखर कर सामने आती| तरला की जीवन्तता, प्रतिभा और संघर्ष करने के गुण और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता एवं असमंजस में पड़ने पर स्वयं से ही झगडा करने की प्रवृत्ति और कठिन समस्याओं को पति एवं अपनी मित्र संग साझा करने की उदारमना प्रवृत्ति को हुमा कुरैशी ने गहराई से दर्शाया है| पत्नी, माँ और एक गुणी स्त्री के तीनों रूपों को वे प्रभावशाली ढंग से निभाती हैं और महत्वपूर्ण मोड़ों पर तीनों का संगम करके ही जीवन में आगे बढ़ती हैं|

तरला के पति नलिन की भूमिका में शरीब हाशमी बहुत प्रभावशाली अभिनय का प्रदर्शन कर गए हैं| वे ऐसे पुरुष की ज़िंदगी में आये उतार चढ़ावों को उसकी मानसिकता को बखूबी प्रदर्शित कर पाए हैं, जो पत्नी की प्रगति भी चाहता है लेकिन कभी कभी सामाजिक दबाव में मात्र एक पुरुषवादी दृष्टिकोण में भी फंस जाता है| और उसका सहयोग ऐसा हो जाता है कि जैसे एहसान कर रहा हो| वह घर पर पत्नी की अनुपस्थिति में वैसा माहौल बच्चों को नहीं दे पाता जैसा नौकरी पर जाने पर उसकी अनुपस्थिति में तरला दिया करती थी| उसकी अकुशलता का खामियाजा तरला के ऊपर मानसिक दबाव के रूप में पढता है और वह ही उसे दोषी नहीं सझता बल्कि तरला खुद भी अपने आप को दोषी समझने लगती है|

एक वृत्त में जीते समय अलग विचार दिमाग में आना मुश्किल हो जाता है| नलिन के लिए भी आँख खोलने वाले विचार ऐसे बाहरी लोगों से मिलते हैं जिनके सामने वह विनीत भाव से खड़ा है अपने इए कुछ मांगने के लिए, जब वे उसकी और तरला की तारीफ़ करते हैं तब उसे तरला की महत्ता का अहसास होता है| वास्तव में जिसका ह्रदय परिवर्तित हुआ हो ऐसे पति के उन क्षणों को जब वह अपने गलत व्यवहार को पत्नी के समक्ष स्वीकार कर रह है, शरीब हाशमी ने बहुत गहराई से प्रदर्शित किया है|

तरला की बड़ी उम्र की पड़ोसन मित्र के रूप में भारती आचरेकर बहुत सटीक हैं| उनकी निगाह में तरला द्वारा कुकिंग के द्वारा थोड़ी बहुत उपलब्धि पाना ही बहुत बड़ी बात है| वे इससे ज्यादा का सपना नहीं देख सकतीं| वे एक घरेलू स्त्री हैं जो अपनी घर की सीमाओं में सैटल हो चुकी हैं अतः उनकी उदारता एक सीमा के भीतर ही वास करती है| वे पारिवारिक गठन को एक बंधी बंधाई परिभाषा के अंतर्गत ही देख समझ सकती हैं और ऐसी थोड़ी उदार और थोड़ी संकुचित पड़ोसन के रूप में वे बहुत प्रभाशाली हैं|

अगर हिंदी फ़िल्म में आधुनिक काल में एक स्त्री प्रतिनिधि चरित्र उभारना हो तो तरला का चरित्र वैसे गुणों को समाहित करने वाला चरित्र है| हुमा कुरैशी के पास बड़ा स्टारडम नहीं है इसलिए इस फ़िल्म की बहुत चर्चा न हुयी न होगी लेकिन स्त्री दर्शकों को इस फ़िल्म को जीवित रखना ही चाहिए देश में लड़कियों को प्रगति के मार्ग पर संतुलित तरीके से सधे क़दमों से चलने के लिए प्रेरित करने के लिए| फ़िल्म कामकाजी दंपति को अपने पारिवारिक और कामकाजी जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए भी एक गाइड सरीखी है|

Tarla एक गुणी स्त्री की पर्वताकार प्रतिभा की जीत की यात्रा है|


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