थियेटर और हिंदी सिनेमा जगत के प्रसिद्द लेखक एवं निर्देशक रंजीत कपूर कुछ अरसा पहले दिल्ली आये थे तो उनसे लम्बी बातचीत हुयी, जिसमें उनकी एक फ़िल्म निर्देशक के तौर पर पहली फ़ीचर फ़िल्म – चिंटू जी, पर भी बात छिड़ी और उन्होंने इस फ़िल्म से संबंधित कई रोचक किस्से सुनाये|

एक मित्र के ऑडियो-विडियो रिकॉर्डिंग स्टूडियो के ऑफिस में भेंट हुयी थी| रंजीत जी ऑफिस में आकर कुर्सी पर बैठ कर पान खाने के लिए अपनी पान संग्रह थैली को खोलने ही लगे थे कि दीवार पर लगे टीवी पर चलते चैनल पर उनकी फ़िल्म चिंटू जी, का गीत (जिसमें दुनिया के नामी निर्देशकों Akira Kurosawa, Vitterio De Sica, Billy Wilder और अन्यों के नाम गीत के बोलों में उपयोग में लिए गए हैं) चलने लगा, ऐसे भारी संयोग कभी-कभार ही होते हैं| सभी लोग गीत को देखने लगे, रंजीत जी स्वंय भी ध्यान से गीत को देखने लगे| पान की थैली उनके हाथ में बिना खुले ही रह गयी|

गीत समाप्त हुआ तो बात इसी गीत से शुरू हुयी कि यह गीत उनके दिमाग में आया कैसे?

रंजीत जी ने थैली से एक पान निकाल कर मुंह में डाला, और अपने विशुद्ध तलफ़्फ़ुज़ वाले शब्दों में कहा,

ऋषि कपूर, के फ़िल्मी करियर को आप देखें तो उनके ऊपर एक से बढ़कर एक गीत फिल्माए गए हैं, एक तरह से वे मधुर गीतों वाली फिल्मों से ज्यादा पहचाने जाते रहे हैं, मेरी फ़िल्म में भी वे एक बड़े फ़िल्मी सितारे बने हैं, लेकिन फ़िल्मी सितारा बने होने के बावजूद उनके लिए कोई गाना नहीं था, जिसे वे परदे पर प्रस्तुत कर सकें|” (वे कुछ पल के लिए रुके)

हाँ, आपकी फ़िल्म में ऋषि कपूर का जो विशाल कट आउट लगाया गया था उसमें भी वे गिटार बजा रहे हैं|

सुनिए तो! फ़िल्म में सिचुएशन थी कि मुंबई से उनके एक निर्माता-निर्देशक की फ़िल्म की थोड़ी सी शूंटिंग बाकी है और वह इसी नाते वहां हडबहेडी गाँव में, जहां चिंटूजी आकर ठहरे हुए हैं, पहुँच जाता है, और अपनी फ़िल्म की नायिका और टीम को वहां बुला लेता है| वहां हमारे सामने दो विकल्प थे, या तो हम वहां किन्ही दृष्योंको शूट करते दिखा देते या फिर एक गीत को फिल्म लेते| हमें लगा यह एक सिचुएशन थी जहाँ ऋषि जी के लिए एक गाना रचा जा सकता था| फ़िल्म तो हमारी सेटायर है और उसमें जो एक गीत पहले सोचा गया था वह एक रोमांटिक गीत है| आपको याद है वो गीत? (उन्होंने अपनी फिल्म के बारे में हमारी मालूमात जांची)

आप “चाय के बहाने” की बात कर रहे हैं|

(हँसते हुए) हाँ वही| तो दूसरा गीत हमें कॉमिक रूप वाला रचना था, जो फ़िल्म के माहौल में सटीक लगे| एक सुबह मैं घर पर अपने पुराने कागज़ात देख रहा था तो उसमें एक फ़ाइल में मैंने अपने पसंदीदा निर्देशकों की सूची और उनके सामने उनकी बनाई अपनी पसंदीदा फिल्मों के नाम लिखे हुए थे| पर यह नहीं याद आया कि क्या यह सूची किसी नाटक के लिए बनाई थी या किसी और कारण से| मेरे दिमाग में आया कि क्यों न फ़िल्म में एक गीत के माध्यम से मैं अपने पसंदीदा निर्देशकों को अपनी ओर से ट्रिब्यूट दूं| तो ऐसे यह गीत बन गया|

उसमें जब ऋषि कपूर अपनी कुर्सी से उठकर चिल्लाते हैं -सत्यजित रे, तो गीत का माहौल अलग ही उंचाई पर पहुँच जाता है|

(हँसते हैं) ऋषि जी बहुत एक्साईटेड हो गए थे इस विशेष सीन में|

आपने इस फ़िल्म से पहले थियेटर की दुनिया में जितनी संभव थी उतनी उंचाई हासिल की, हिंदी सिनेमा में भी लेखन में खूब नाम कमाया और बेहतरीन फिल्मों के सृजन में अपना योगदान दिया लेकिन पहली फ़िल्म में ऋषि कपूर को ऐसी जटिल भूमिका में, जहाँ उन्हें लगभग अपनी ही भूमिका निभानी थी, जो थोड़ी सच थोड़ी कल्पना से भरी भूमिका थी, काम करने के लिए तैयार कर लिया? कैसे आपने ऋषि कपूर को एप्रोच किया|

“यह एक बड़ी इंटेरेस्टिंग कहानी है| मेरे एक दोस्त ने मुझसे एक स्क्रिप्ट लिखाई थी, जिसे वह स्वंय निर्देशित करना चाहता था| एक दिन उसका फोन आया कि वह ऋषि कपूर से मिलने जा रहा है, फ़िल्म की बात करने, और क्या मैं साथ चल सकूँगा? मैंने कहा, चलो, चलते हैं| रास्ते में उसने कहा कि क्या ऋषि कपूर को नेरेशन देने का काम मैं कर लूँगा? मैंने कहा, अवश्य कर लूँगा|

मैंने उससे कहा कि अगर उसे कोई समस्या न हो तो उसकी फ़िल्म का नेरेशन समाप्त होने के बाद मैं ऋषि कपूर को एक आइडिया सुनना चाहूँगा|

उसने कहा,” मुझे क्या आपत्ति होगी, शौक से सुनाओ, पर पहले मेरी फ़िल्म का नेरेशन दे देना|”

किस फ़िल्म के लिए नेरेशन था यह?

फुर्सत में‘ नाम था उस फ़िल्म का|

तो आपने इस फ़िल्म के नेरेशन के बाद ऋषि कपूर को अपना आइडिया सुना दिया?

“हाँ, ‘फुर्सत में’ का नेरेशन उन्हें पसंद आया| इस नेरेशन से पहले, और बाद में हमारी और भी बातचीत हुयी| मैंने उन्हें बताया कि कैसे मिड एटीज़ में राज साहब से मेरी एक बार मुलाक़ात होते-होते रह गयी और जिसका मलाल मुझे अभी तक है| मैं अपने दो प्रिय निर्देशकों, राज कपूर और हृषिकेश मुकर्जी से मिलना चाहता था, हृषिदा से तो भेंट हुयी लेकिन राज साहब से मुलाकात न हो पायी| बहरहाल ‘फुर्सत में’ का नेरेशन देने के बाद, कुछ देर हम इधर उधर की बातें करते रहे| उन्होंने राज संतोषी की फ़िल्म – दामिनी, में काम किया था और मैंने राज संतोषी की कुछ फिल्मों में लेखन किया था| तो वह भी हम लोगों के बीच एक पुल था| मेरी लिखी कुछ फ़िल्में ऋषि जी ने देखी हुयी थीं| तो ऐसी कॉमन बातें ही होती रहीं| तब मैंने उनसे कहा कि अगर वे थक न गए हों तो एक आइडिया मैं उनसे साझा करना चाहता हूँ| वे उत्सुकता से बैठ गए| उनमें नए विचार के प्रति गज़ब की उत्सुकता थी| “

यह आइडिया चिंटूजी से संबंधित था?

हाँ, मैंने करीब दस मिनट उनको एक फ़िल्म स्टार के जीवन के इर्द गिर्द घूमती फ़िल्म के बारे में अपने विचार बताये| मेरी कहानी एक बड़े फ़िल्म स्टार के ढ़लते हुए दिनों की कहानी थी| फ़िल्मी जीवन जब ढ़लान पर आने लगता है तो फ़िल्मी सितारे अपने अहं की तुष्टि के लिए अपने पूर्व के स्टारडम को भुनाकर राजनीति में प्रवेश कर सार्वजनिक जीवन में प्रासंगिकता लाने और अपने पुराने स्टारडम जैसी ही शक्ति अपने पास बनाए रखने का प्रयास करते हैं| मैंने उन्हें एक सेटायर फ़िल्म का ढ़ांचा नेरेट किया दस मिनट में|

उनकी क्या प्रतिक्रिया थी इतना सुनकर?

“वे तो सुनते हुए भी उत्तेजित होकर बार बार अपनी पोजीशन बदल रहे थे, जिससे मुझे पता चल रहा था कि इस फ़िल्म के विचार ने उन्हें बहुत ज्यादा आकर्षित कर लिया है|”

उन्होंने तुरंत हाँ कर दिया इस फ़िल्म को करने के लिए?

उन्होंने कहा कि आइडिया बड़ा जबरदस्त लग रहा है| इसे प्रोड्यूस कौन करेगा? मैंने कहा कि ‘फुर्सत में’ के निर्माता ही मुझसे एक और फ़िल्म लिखवाना चाहते हैं, और वे ही इसे भी प्रोड्यूस कर देंगे| इस कहानी के साथ मेरी शर्त यही है कि इसे मैं स्वंय निर्देशित करूँगा| किसी और के निर्देशन के लिए मैंने इसे नहीं सोचा है| अभी तो यह एक कच्चा विचार है| आप बताइये आपको कैसा लगा यह विचार?

उन्होंने इस मोड़ पर आपसे हॉलीवुड की फ़िल्म – Sunset Boulevard की बात नहीं की कि एक बढ़ती उम्र की अभिनेत्री जिसका फ़िल्मी जीवन अब ढ़लान पर है, उससे प्रेरित तो नहीं है यह फ़िल्म?

न न, उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं की| मुझे नहीं लगता कि उन्होंने उस वक्त तक Sunset Boulevard देखी होगी| मैंने भी तब तक इस फ़िल्म के बारे में नहीं सुना था| चिंटूजी के प्रदर्शन के कुछ साल बाद ही मैं इसे देख पाया| लेकिन चिंटूजी और Sunset Boulevard दोनों एकदम अलग फ़िल्में हैं|

जी, बिलकुल, उनका स्वभाव और असर दोनों एकदम अलग हैं| अच्छा तो ऋषि जी ने उसी मीटिंग में आपको कह दिया कि वे इस फ़िल्म को कर रहे हैं?

आइडिया सुनकर वे कुछ देर सोचते रहे और फिर बोले, रंजीत साहब, मुझे तो लग रहा है, यह मेरी ही कहानी है| मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आपने कैसे एक फ़िल्मी सितारे के जीवन की रियेलिटी को इस अंदाज़ में सोच लिया| इसे कब बना सकते हैं?

आपने क्या कहा उनसे?

मैंने कहा उनसे कि ऋषि जी, अभी तो यह एक विचार ही है| पूरी कहानी और स्क्रिप्ट लिखनी पड़ेगी| इसमें कुछ समय तो लगेगा| मैं जाकर लिखता हूँ, जैसे ही लिखना समाप्त होगा मैं आपसे स्क्रिप्ट नेरेशन के लिए मिलता हूँ|

आप उनकी इतनी ज्यादा उत्सुकता को बिना किसी ठोस परिणाम में बदले एक वादा करके वापिस आ गए?

हाँ तब तो मैं उनसे विदा लेकर आ गया| पर अगले दिन सुबह ही निर्माता बॉबी बेदी का फोन आ गया| उन्होंने मुझसे कहा,”आप क्या सुना कर आ गए हो ऋषि जी को? वे इतना ज्यादा एक्साइटेड हैं आपके आइडिया को लेकर| कल से मुझे दो बार फोन कर चुके हैं कि अभी वाली फ़िल्म को थोड़ा बाद में बना लेंगे, पहले रंजीत साहब जो आइडिया सुना कर गए हैं, उस पर काम करते हैं| अब आप जल्दी मुझे स्क्रिप्ट दो लाकर| तो मैं उनकी डेट्स ब्लॉक करूँ|”

एक बात बताइये आपके दिमाग में पहले से ही आइडिया था इस फ़िल्म का या आपने अपने दोस्त के साथ ऋषि कपूर के घर जाते हुए रास्ते में यह ताना बाना बुना कि जब ऋषि कपूर से भेंट हो ही रही है तो एक नया आइडिया भी उन्हें सुना देने में क्या हर्ज है?

पहले मैं अधूरी बात समाप्त कर लूँ (वे एक नया पान अपने मुंह में डालते हैं)| तो मैंने बॉबी बेदी से कहा कि मुझे थोडा समय लगेगा लिखने में, उसके बाद मैं आता हूँ आपके पास| आजकल मैं थोडा घर परिवार के चक्कर में फंसा हुआ हूँ| दिमाग में थोड़ी अस्तव्यस्तता हो गयी है| दिमाग में शान्ति आ जाए तो लिखने में ज्यादा समय नहीं लगेगा| एक दो पुराने प्रोजेक्टस का काम भी रुका हुआ है, उन्हें भी पूरा करना है| उन्होंने कहा कि आप मुंबई से दूर चले जाओ, यहाँ तो कुछ न कुछ पचड़ा लगा ही रहेगा| आप अन्य सारे प्रोजेक्ट रोक कर इस पर काम शुरू कर दो, बाकी जो प्रोजेक्ट इतना समय रुके हैं, कुछ समय और सही| ऋषि जी का एक्साईटमेंट आप समझ नहीं रहे हैं| आप एक काम करो आप हिल स्टेशन चले जाओ, वहां शान्ति से लिखो बिना किसी डिस्टर्बेंस के|

आप चले गए? लेकिन एक बात बताइये, निर्माता से यह बात तो आपकी हुयी नहीं कि आप स्वंय ही इस फ़िल्म को निर्देशित करेंगे?

निर्देशन वाली बात हमारी पहले भी हो चुकी थी अतः वह कोई समस्या नहीं थी| फिर जब ऋषि जी से ही सीधे यह बात हो गयी थी तो निर्माता वाला एंगल तो आसान था| पहले कई बार कई निर्माताओं के साथ योजनायें बनीं पर किसी न किसी कारण से फ़िल्म निर्देशन का काम टलता रहा| ज्यादातर तो अपने थियेटर के काम के कारण| पहला प्रेम तो मेरा नाटकों को लिखना और निर्देशित करना ही रहा है|

वह तो आपके साथ आज भी है| आज भी आप फ़िल्म के रास्ते न जाकर नाटक की ओर मुड़ जाते हैं|

नाटक करने में क्रिएटिविटी का एक अल्टीमेट जॉय मिलता है न, परम आनंद, वैसा टुकड़े टुकड़े बनाने वाली फ़िल्म में नहीं मिलता| खैर, इस प्रोसेस पर बाद में बात करेंगे|

ओके| तो आप स्क्रिप्ट लिखने चले गए हिल स्टेशन|

हाँ, मुझ पर इतना दबाव बना कि मैं एकांत में लिखने के लिए चला गया, बल्कि मुझे भेज दिया गया|

एक निजी सी बात पूछ सकते हैं यहाँ?

पूछिए!

आपने निर्माता बॉबी बेदी से कहा था कि आप उस दौरान घर परिवार के कुछ मसलों से घिरे हुये थे और पहले उन्हें सुलझाना चाहते थे लेकिन आपको फ़िल्म लिखने घर और शहर से दूर जाना पड़ा एकांतवास में लिखने के लिए| लेकिन पीछे आपके घर परिवार की समस्याएं तो वैसी की वैसी ही बनी रहीं न| तो क्या सृजन के ऐसे मोड़ों पर अक्सर ही घर परिवार के वास्तविक मुद्दे टलते जाते हैं? क्या इनका बोझ बाद में दुगना तिगुना बनकर सामने नहीं आता|

(हँसते हुए) कई बार समय अपने आप भी बहुत कुछ सुलझा देता है| लेकिन मज़ाक से अलग, यह बात तो है कि सृजनात्मक क्षेत्र में, चाहे वह लेखन हो, पेंटिंग हो, मूर्ति बनाना हो, नाटक करना या फ़िल्म बनाना हो, इन सबके लिए निजी समस्याओं को जबरदस्ती पीछे रखकर अन्दर रचनात्मक ऊर्जा लाकर ही कुछ रचा जा सकता है| आपकी बात सही है, लेकिन मैं अपने जीवन के अनुभव से ही बताऊँ कि जो रचा जाना है उसे रचना ही पड़ता है कलाकार को| वह कर लेता है|

आपका तो बचपन से इस मुद्दे से सामना हुआ होगा, जब आपके पिता थियेटर कम्पनी को देश भर में घुमाते रहते होंगे| पर वह विषयांतर हो जायेगा, पर इस मुद्दे पर बात ड्यू रहेगी|

अरे, यह तो मेरी जीवनी लिखने का आधार हो जाएगा| (हँसते हैं), इससे पहले कि वो बात रह जाए, आपने जो पहले पूछा था कि इस फ़िल्म का आइडिया जो ऋषि कपूर को सुनाया था, वह पहले से दिमाग में था, या उनसे मिलने जाते हुए तभी गढ़ा था| तो मैं कुछ दिनों से ऐसे एक आइडिया पर सोचता रहा था| एक फ़िल्म स्टार के स्टारडम नीचे खिसकने के दौर में उसकी चिंताओं और उनके कारण वह क्या क्या करता है, इसका एक मोटा मोटा खाँचा मेरे दिमाग में बन रहा था| ऋषि जी को नेरेशन देते हुए कुछ उसमें और जुड़ता चला गया, और जब स्क्रिप्ट तैयार हुयी तो उसमें बहुत कुछ और जुड़ गया था|

इस फ़िल्म के आइडिया संबंधी अपने विचारों को क्या आप थोड़ा विस्तार से बता सकते हैं?

—ज़ारी—

© RanjitKapoor & Cinemanthan

फ़िल्म चिंटूजी पर लेख –Chintu Ji (2009) : आधी हक़ीक़त आधा फ़साना https://cinemanthan.com/2020/09/04/chintu-ji-2009/


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