मजरुह सुल्तानपुरी को 1994 में दादा साहेब फालके पुरस्कार दिया गया तो उनकी आयु उस वक्त तकरीबन 75 साल की थी और फिल्मों में गीत लिखते हुए उन्हें लगभग 50 साल हो चुके थे| इस अवसर पर दूरदर्शन को साक्षात्कार देते हुए उन्होंने कहा था कि इतने सालों से इतनी फिल्मों में गीत लिखने के बावजूद उनके पास कार नहीं है|
शाहजहाँ (1946) जैसी फ़िल्म, जिसमें के एल सहगल ने गीत गाये, से लेकर अंदाज़ (1949) जैसी सुपर हिट फिल्मों के गीत उन्होंने शुरुआत में ही लिख लिए थे| और एक सफल गीतकार के रूप में ही उनकी शुरुआत हुयी और फिल्मों से इतर भी उनकी शायरी को आदर सम्मान और पहचान मिलती रही है| शुरू में मजरुह सुल्तानपुरी ने भी फिल्मों में गीत लिखने से इनकार कर दिया था और अपने शायरी गुरु जिगर मुरादाबादी के समझाने से वे इस कर्म के आर्थिक पक्ष को समझ गए और परिवार के भरण पोषण हेतु फिल्मों में गीत लिखने लगे और प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़े रहकर एक शायर का सामाजिक दायित्व भी पूरा करते रहे|
मजरुह सुल्तानपुरी से चार साल छोटे शैलेन्द्र की फिल्मों में गीत लिखने की शुरुआत भी मजरुह जैसी ही है| मजरुह को बम्बई में एक मुशायरे में ए.आर. कारदार ने सुना और प्रभावित हुए और शैलेन्द्र को राज कपूर ने काव्य पाठ करते हुए सुना और उनके सामने अपने निर्देशन में बनने वाली पहली फ़िल्म – आग (1948) में गीत लिखने का प्रस्ताव रख दिया जिसे शैलेन्द्र ने यह कह कर ठुकरा दिया कि – उनकी कविता बिकने के लिए नहीं है|
विवाहित शैलेन्द्र को अपनी पहली संतान के जन्म से कुछ पहले धन की बेहद आवश्यकता ने फिल्मों में न लिखने के अपने हठ को त्याग कर राज कपूर के सामने अपनी आर्थिक आवश्यकता की पूर्ती हेतु बात करने के लिए ले जाकर खड़ा कर दिया|
स्वाभिमानी कवि ने अपने से एक साल से ज्यादा छोटे राज कपूर से कहा कि उन्हें पैसों की जरुरत है, अगर उनका पहले दिया गया प्रस्ताव अभी तक जीवित है तो वे उन्हें 500 रूपये दे दें, और कोई भी काम करा लें|
राज कपूर ने उन्हें उनके द्वारा माँगी आर्थिक सहायता दे दी और शैलेन्द्र ने उनकी अगली फ़िल्म बरसात (1949) के लिए दो गीत – बरसात में हमसे मिले (लता मंगेशकर), और, पतली कमर है (मुकेश, लता), लिखे, जो दोनों ही हिट हुए| और शैलेन्द्र राज कपूर के रचनात्मक फ़िल्मी संसार का अनिवार्य अंग बन गए|
राज कपूर की आर के फ़िल्म्स का अलिखित करार शैलेन्द्र, शंकर जयकिशन और हसरत जयपुरी के साथ था कि चारों को 500 रूपये प्रति माह कम्पनी की ओर से मिलेंगे और अगर आर के फिल्म्स कोई फ़िल्म नहीं बना रही तब वे अन्य फिल्मकारों की फिल्मों में काम कर सकते हैं| शंकर जयकिशन की भी शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी के साथ ऐसी समझ विकसित हो चुकी थी कि जिस फ़िल्म में भी वे संगीत प्रदान करेंगे उसके गीत इन्हीं दोनों गीतकारों से लिखवायेंगे|
1950 में 500 रुपये प्रति माह का बहुत महत्त्व था और इसके अतिरिक्त अन्य फिल्मों में लिखे जाने वाले गीतों से होने वाली आय अलग थी| सन 1966 में असमय मृत्यु हो जाने से पूर्व शैलेन्द्र ने 800 से ज्यादा फ़िल्मी गीत लिखे और वे अपने समय के सबसे मंहगे गीतकार थे|
फिल्मों में गीत लिखना शुरू करने से पूर्व शैलेन्द्र ने भरपूर निर्धनता देखी लेकिन फिल्मों में गीतकार के रूप में एक सफल पारी खेलने की शुरुआत से ही उनके इर्दगिर्द लक्ष्मी जी का वास भी हुआ और सरस्वती का आशीर्वाद तो उनके साथ था ही| परेल और माहिम के चॉल वाले मकानों से निकल कर शुरू में उन्होंने खार में तीन कमरों वाले मकान (पार्वती सदन) में किराए पर अपनी घर-गृहस्थी बसाई और जल्दी ही अपना दुमंजिला घर – रिमझिम, खरीद लिया,जिसमें भूतल पर पहले से एक किरायेदार रहता था और वह शैलेन्द्र परिवार के वहां आकर रहने के बाद भी रहता रहा और इस किरायदार ने शैलेन्द्र को अच्छी खासी परेशानियां दीं, जिसमें कई बार पुलिस में शिकायत करना भी शामिल है और उसके कारण शैलेन्द्र के घर पुलिस की रेड एकाधिक बार पड़ी| एक बार शराब की जब्ती के सिलसिले में और एक अन्य बार वहां किये जा रहे मर्डर के बारे में (शैलेंन्द्र के घर चलने वाली संगीत की महफ़िलों से परेशान होकर उसने शास्त्रीय कव्वालों के गायन से ऐसा अनुमान लगा लिया कि ऊपर प्रथम तल पर किसी का गला घोट कर मारा जा रहा है)|
शैलेन्द्र के पास अपनी, विदेशी मॉडल की कार हिल्मैन मिंक्स भी थी| गीत लिखने के लिए उन्होंने एक अन्य जगह किराए पर ले रखी थी| एक अन्य जगह उनकी संगीत संबंधी बैठकें हुआ करती थीं| धन की कमी शैलेन्द्र को फ़िल्मी गीत लेखन में मिली सफलता के बाद कभी नहीं रही| उनका नाम और काम दोनों सफलता के पर्याय बन चुके थे|
उस वक्त के तीनों बड़े सितारों – राज कपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार की फिल्मों के गीत वे लिख रहे थे और तीनों के लिए उन्होंने कई अमर गीत रच कर दिए| शंकर जयकिशन की जोड़ी व्यावसायिक दृष्टि से सबसे सफल जोड़ी थी 50 और 60 के दशकों में और उनकी सभी फिल्मों में शैलेन्द्र (और हसरत जयपुरी) ने ही गीत लिखे| अतः उनको मिली व्यावसायिक सफलता की उंचाई का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है|
तीसरी कसम फ़िल्म को बनाने के दौरान उनके पास एक बार नकद धन की कमी हुयी तो उनकी धर्मपत्नी ने अपनी अलमारी से अपने द्वारा एकत्रित धन शैलेन्द्र को दे दिया, और इस धन से फ़िल्म की शूटिंग का तयशुदा हिस्सा संपन्न हुआ| यह धन शैलेन्द्र की पत्नी ने उनके द्वारा लगभग प्रति दिन लेकर आये नकद रुपयों के लिफाफों से थोड़ा थोड़ा निकाल कर एकत्रित किया था|
शैलेन्द्र को अपनी कला और उसके बलबूते धनोपार्जन पर इतना ज्यादा विश्वास था कि तीसरी कसम के बॉक्स ऑफिस पर चल न पाने के कारण हुए कर्जे से भी वे विचलित नहीं थे और कहते थे कि यह कर्ज तो वे जल्दी ही गीत लिखकर ही उतार देंगे| बल्कि वे एक और फ़िल्म बनाने की योजना बनाने लगे थे|
फ़िल्म उद्योग में शैलेन्द्र की सफलता से इतना तो स्पष्ट ही है कि सरस्वती पुत्र पर लक्ष्मी भी मेहरबान थी और वे आर्थिक रूप से बहुत अच्छा समय जी रहे थे| यह कहना भी सही होगा कि अपने समकालीन सारे गीतकारों में वे संभवतः सबसे अमीर गीतकार थे, हो सकता है साहिर लुधियानवी उनके बराबरी में हों, लेकिन बाकी अन्य गीतकार आर्थिक रूप से शैलेन्द्र के मुकाबले कमतर ही थे|
वे आहत हुए तीसरी कसम बनाने के दौरान अपने कथित दोस्तों, रिश्तेदारों के छल कपट से| उन्हें दिखाई दिया कि निर्माता के तौर पर हर व्यक्ति उन्हें लूटने के काम में लगा हुआ था| इस मानवीय कमजोरी से उनका दिल छलनी हुआ|
उपरोक्त में से कुछ बातें शैलेन्द्र की बेटी अमला शैलेन्द्र मजुमदार की पुस्तक Shailendra A love Lyric in Print :A Daughter Remembers में दर्ज मिलती हैं|
इस पुस्तक और शैलेन्द्र परिवार के सदस्यों के पिछले कुछ सालों के वक्तव्यों से शैलेन्द्र और उनकी असामायिक मृत्यु और तीसरी कसम के बीच के संबंध के इर्द गिर्द छाये भ्रम के बादल कुछ छंटे हैं| ऐसा नहीं कि केवल आम सिने-प्रेमी ही इन भ्रमों से घिरा हुआ था| कुछ अरसा पहले गीतकार, लेखक जावेद अख्तर ने भी तीसरी कसम के बाद शैलेन्द्र के ऊपर चढ़े कर्जे और उनकी मृत्यु के बाद शैलेन्द्र परिवार के बाबत यह कहा था कि राज कपूर ने भी शैलेन्द्र परिवार का साथ छोड़ दिया और उनकी कोई सहायता न की|
ऋषि कपूर ने जावेद अख्तर के इस आरोप का संज्ञान लिया और पुराने दौर के ऐसे लोगों से बात की जिन्होंने वह दौर देखा था, उन्होंने आर के फिल्म्स के पुराने कर्मचारियों से भी बातचीत की और उसके बाद खुलासा किया कि जावेद अख्तर का दावा गलत है, राज कपूर ने शैलेन्द्र परिवार के ऊपर चढ़ा सारा कर्ज चुकाया| उन्होंने जावेद अख्तर से मांग की कि उन्हें माफी मांगनी चाहिए|
शैलेन्द्र की बेटी अमला शैलेन्द्र भी पुस्तक में इस बात का जिक्र करती हैं कि राज कपूर ने शैलेन्द्र परिवार की बहुत सहायता की| शैलेन्द्र की मृत्यु होते ही तीसरी कसम के लिए उन्हें पैसा देने वाले लोग शैलेन्द्र परिवार से धन उगाही के प्रयास करने लगे और कोर्ट भी चले गए| राज कपूर ने बड़ी तेजी से कदम उठाते हुए शैलेन्द्र के घर को गायक मुकेश के पास कानूनी रूप से गिरवी रखवा दिया, जिससे कोई भी महाजन घर की नीलामी का आदेश कोर्ट से न ले आये| जब दो-तीन साल बाद सारे कर्जे चुका दिए गए, तब मुकेश ने शैलेन्द्र परिवार को घर के कागजात लौटा दिए|
इस किताब से यह जानकारी भी मिलती है कि शैलेन्द्र को उनके ही रिश्तेदार, विशेषकर उनके साले ने आर्थिक हानि पहुंचाई और इस बात ने शैलेन्द्र का दिल ज्यादा तोडा|
इस किताब से इन सब बातों की जानकारी मिलने से यह भाव तो पाठक के मन में उभरता ही है कि शैलेन्द्र परिवार इन बातों को 70 के दशक में ही जगजाहिर कर देता तो तीसरी कसम और शैलेन्द्र की मृत्यु के इर्द गिर्द रहस्य और भ्रम के बादल न छाते| आखिर शैली शैलेन्द्र पूर्णतया वयस्क थे और फ़िल्मी दुनिया में एक गीतकार के रूप में सक्रिय थे| वे ऐसी किताब 70 के दशक में ही लिख सकते थे|
शैलेन्द्र परिवार की इस बाबत उदासीनता या रिकार्ड्स को समय पर सही न करने की देरी ने शैलेन्द्र और उनके मृत्यु और उनके बड़े स्वप्न- तीसरी कसम, के इर्द गिर्द भ्रांतियां फैलाने में अनचाहे ही सहायता की| बल्कि इस देरी ने शैलेन्द्र को भी भ्रम के बादलों में ढक दिया| उनके गहरे प्रशंसक भी आहत रहे|
खैर देर आये दुरुस्त आये, शैलेन्द्र की बेटी अमला शैलेन्द्र की किताब से कई तथ्य लोगों के सामने आ गए हैं|
…[राकेश]
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