कुछ कहानियां पाठक को सन्नाटे के बियाबान में ले जाकर छोड़ देती हैं, जहाँ से उसे अपनी क्षमता के अनुसार इसके प्रभाव से बाहर आने में सफलता मिल पाती है| हिंसा के बारे में हरेक के किसी न किसी किस्म के विचार होते ही हैं और भारत जैसे विभिन्न वर्गों में बंटे विशाल देश में तो सामाजिक हिंसा के बारे में भी विचार बन ही जाते हैं क्योंकि किन्हीं वर्गों के बीच वैचारिक और हिंसक संघर्ष उपस्थित रहे ही जाते हैं| वर्गीय विभिन्नताओं के कारण लोगों में परस्पर पूर्वाग्रहों का घर बना कर बसे रहना एक आम प्रवृत्ति हो जाती है| और लोग एक ही भाव को लेकर कई कई चेहरे वाले हो जातेहैं, हिंसा मानव मात्र या जीव के विरुद्ध न होकर टुकड़ों में बाँट जाती है, अगर यह ऐसों के विरुद्ध हो रही है जो उन्हें पसंद नहीं हैं तो ऐसी हिंसा की ख़बरों से उन्हें असर पड़ना बंद हो जाता है| ऐसे में कोई छोटी सी चिंगारी भी उनके भीतर हिंसा की आग भड़काने के लिए पर्याप्त हो जाती है|

प्रसिद्द कथाकार, कवि और संपादक श्री कृष्ण बिहारी जी की कहानी “एक सिरे से दूसरे सिरे तक” भारत की एक प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा किये जाने के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों की विभीषिका पर आधारित है| यह कहानी इतनी ज्यादा वास्तविक है कि इसे पढ़ते हुये पाठक 1984 के उन्हीं दिनों में पहुँच कर दर्शक की भूमिका में पहुँच जाता है| वह कथा के नायक के साथ उसके साए की भांति हो लेता है और सब कुछ अपनी आँखों से देखना शुरू कर देता है, नायक के दंगाइयों से भिड़ जाने के दुस्साहस पर उसे रोमांच भी हो आता है औरउसके लिए भय भी जन्मता है| वह देखता है कैसे भले लोग अंधे युग में स्वतः ही अल्पसंख्यक बन जाते हैं और माहौल हिंसक लोगों के हवाले हो जाता है|

नायक द्वारा अपने छोटे भाई को दंगाई और कातिल होने से बचाने के लिए उसे माँ की गाली देकर डांट- डपट कर घर वापिस करने के सीमाओं से परे जाकर उठाये कदम के पीछे के मानसिक दबाव और तनाव को वह समझता है,ऐसा एक्सट्रीम कदम एक घनघोर मानवतावादी ही उठा सकता है| दंगाइयों के पागलपन के बीच ऐसे दीवाने भी होते ही हैं जो अपनी जान की बाजी लगाकर अपने मित्रों, परिचितों और अपरिचितों को बचाते हैं|

सन 1984 के नवम्बर माह के शुरुआती तीन दिन अत्याधिक हिंसा से भरे हुए थे, यह लोमहर्षक कहानी उस हिंसा की पृष्ठभूमि पा आधारित ऐसी कहानी बन जातीहै जो पाठक के भीतर इस हिंसा रुपी कांटे से ही हिंसा को असरहीन बनाती है, उसे हिंसा की व्यर्थता बताती है, उसे समझाती है कि हिंसा किस तरह एक बेहद असभ्य और अमानवीय प्रवृत्ति है|


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