लखनऊ के इतिहासकार योगेश प्रवीण ने लखनऊ का एक पुराना किस्सा सुनाया जो बेहद लोकप्रिय हो गया|

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1920 में लखनऊ में पहली बार म्यूनिसिपैलिटी के चुनाव हुए तो चौक के इलाक़े से कारपोरेटर के चुनाव के लिये लखनऊ की मशहूर तवायफ़, मौसीक़ी और गायकी की शान “दिलरुबा जान” ने पर्चा भर दिया। उनके ख़िलाफ़ कोई खड़ा ही नहीं हो रहा था।
एक मशहूर हकीम साहब – शम्सुद्दीन का चौक में दवाखाना हुआ करता था| बहुत सम्मानित और नेकनाम इन्सान थे। हकीम साहब के दोस्तों ने उन्हें चुनाव में “दिलबर जान” के ख़िलाफ़ खड़ा होने को मजबूर कर दिया।
दिलरुबा जान के चुनाव प्रचार में जबरदस्त रौनक़ रहती, सर ए शाम चौक में जलसे का आयोजन होता। उस ज़माने की मशहूर तवायफ़ें और गायिकाएं इस मुहिम में उतर पड़ीं। दिलरुबा जान के प्रचार का जादू सर चढ़कर बोलने लगा।
दिलरुबा जान के चुनाव प्रचार की सफलता के क़िस्से हकीम साहब तक पहुँचते तो वे अपने दोस्तों पर झुंझलाते कि उन्हें किस जंजाल में फँसा दिया गया है!

हकीम साहब अपने दोस्तों पर ग़ुस्सा उतारते–तुम लोगों ने तो मुझे मार ही डाला, मेरी हार तय है

लेकिन दोस्तों ने हार नहीं मानी और एक नारा दिया:

है हिदायत चौक के हर वोटर ए शौक़ीन को
दिल दें दिलबर को और वोट शम्सुद्दीन को

जवाब में दिलबर जान की तरफ़ से नारा आया,


है हिदायत चौक के हर वोटर ए शौक़ीन को
दिलबर को वोट दीजिए, नब्ज़ शम्सुद्दीन को


हकीम साहब की ख़ुशक़िस्मती कही जाए या लखनऊ के लोगों के शऊर और तहज़ीब की ग़ैरत का असर कि हकीम साहब चुनाव जीत गए।
लखनऊ की तहज़ीब के मुताबिक़ दिलबर जान हकीम साहब को मुबारकबाद देने उनके दौलतख़ाने पर हाजिर हुईं। आदाब ओ तसलीम के बाद चुनाव के नतीजे और उसकी वजह पर बात निकल पड़ी तो दिलबर जान ने कहा–
हुज़ूर, जीत हार तो लगी रहती है, हमें कोई मलाल नहीं। लेकिन मेरी हार और आपकी जीत ने एक बात साबित कर दी।” “लखनऊ में मर्द कम और मरीज़ ज़्यादा हैं!” “

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ऐसा ह्यूमर अब न फिल्मों में दिखाई देता है न साहित्य में पढने को मिलता है| भारतीय मुस्लिमों के ऊपर बनने वाली फ़िल्में तो अब नाम मात्र की रह गयी हैं| पहले भी जब भी बनीं तो वे या तो नकली सोशल ड्रामा बनीं जिनमें आम मुसलमान के जीवन की झलकियाँ दिखाई नहीं देती थीं या कुछ ऐसी फ़िल्में बनीं जो उनकी समस्याओं को ऐसे दिखाती रहीं मानों वे आम नागरिक न होकर किसी दूसरे गृह से आकार धरते पर फंस गए हैं और वे बोझिल हो गयीं| ह्यूमर के नाम शायद संजीव कुमार अभिनीत लेडीज़ टेलर ही आखिरी फिल्म होगी जिसमें मुस्लिम चरित्र आं इंसानों जैसे हैं, और जिन्हें देख दर्शक आनंदित होता है|

वर्तमान में सोशल मीडिया पर नज़र दौड़ाई जाए तो वहां उपस्थित भारतीय मुस्लिमों में अपवाद छोड़ दें तो सारे मुस्लिम स्त्री पुरुष केवल एक काम में व्यस्त रहते हैं कि हर साँस के साथ भारत की मौजूदा केंद्र सरकार का विरोध करना है| ऐसी हरकतों से उनके रोजमर्रा के जीवन में कितना रस बचा होगा? जबकि ह्र्यूमर उर्दू साहित्य के एक अभिन्न अंग रहा है|

ऐसे बासी होते जाते सामजिक परिवेश में अनुशा रिजवी एक ताजगी भरी फिल्म लेकर आयी हैं|

इसे आम मुसलमान की प्रत्रिनिधि फिल्म तो नहीं कहा जा सकता लेकिन यह मुस्लिम चरित्रों को आम भारतीय के रूप में प्रस्तुत करने में तो कामयाब रही ही है|

परदे पर नज़र आने वाले चरित्रों में एक (पूरब कोहली) ही ऐसे हिन्दू हैं जो मुख्या घटना स्थल पर नज़र आते हैं बाकी सभी चरित्र मुस्लिम हैं और उनमें भी एक को छोड़कर सभी स्त्रियाँ हैं और दो या तीन बुजुर्ग स्त्रियों को छोड़कर एक भी वर्तमान में अपने पहले पति के साथ नहीं है| वे सब या तो तलाक ले/दे चुकी हैं या इस प्रक्रिया से गुज़र रही हैं| ये सभी मुस्लिम चरित्र दिल्ली के जंगपुरा या निजामुद्दीन में रहने वाले रईस मुस्लिम परिवारों के सदस्य हैं| यहाँ एक लड़की अपनी माँ के बैंक एकाउंट से चैक द्वारा 25 लाख रूपये निकल लेती है और यह एक मामूली बात समझी जा रही है| चैक पर हस्ताक्षर भी लड़की ने अपनी माँ से नहीं बल्कि अपनी बड़ी बहन से करवाए हैं अतः यह भी धोखाधड़ी का मामला है|

सारी युवा स्त्रियाँ निजी जीवन में किसी न किसी समस्या से गुजर रही हैं, और जीवनसाथी संबंधी समस्या सभी की एक जैसी है|

फिल्म का स्वरूप अमेरिकी टेलीविज़न के प्रसिद्द धारावाहिक – Friends, की तर्ज पर रखा गया है जहाँ एक इनडोर स्थल पर चरित्र बाहर से आते जाते हैं और समस्याओं और ह्यूमर के समावेश से दर्शकों को आनंद देते जाते हैं|

अभिनय का अनुभव वास्तव में ही एक महत्वपूर्ण तत्व होता है| चुलबुलेपन को परदे पर दिखाने में फरीदा जलाल सदा ही श्रेष्ठ रही हैं और यह परंपरा उन्होंने बड़ी उम्र में भी कायम रखी है| फिल्म में सबसे वरिष्ठ वे ही हैं और अभिनय के प्रदर्शन में भी वे इस वरिष्ठता को कायम रखती हैं| उनके परदे पर आने के बाद फ़िल्म की मुख्य अदाकारा वही हो जाती हैं| उनकी उपस्थिति मात्र ही फिल्म का दर्जा ऊँचा उठा देती है और उनका एक संवाद – अरे कम से कम रिश्वत को तो सेकुलर रहने देते, एकदम मारक व्यंग्य बन जाता है|

मुआ, कमबख्तों जैसे शब्द उनके मुंह से ऐसे लगते हैं मानो इस्मत चुगताई द्वारा लिखी गयी कहानियों की बुजुर्ग स्त्रियों में से कोई एक सिनेमा के परदे पर आ गयी हो|

उनकी परदे पर जैसी जुगल बंदी डॉली अह्लूवालिया, शीबा चड्ढा, और नताशा रस्तोगी से बैठती है वह इस्मत चुगताई की कहानियों जैसी ही आनंददायक है|

उनसे अगली पीढ़ी के किरदारों में कृतिका कामरा, श्रेया धन्वंथरी, पूरब कोहली, और जूही बब्बर सोनी बेहतर अभिनय प्रदर्शन कर फिल्म को अच्चा बनाए रखते हैं| उनसे युवतर पीढ़ी में जोयिता दत्ता, अनुष्का बनर्जी, और निशंक वर्मा, आजकल की युवा अपीधि का प्रतिनिधित्व असरदार ढंग से करते हैं|

शुरू के 10-12 मिनट तक फिल्म दर्शक के धैर्य का इम्तिहान लेती है लेकिन उसके बाद फिल्म सही गति पकड़ लेती है| हाँलांकि इतने सारे चरित्र आपस में किन रिश्तेदारियों से बंधे हैं इसकी सही जानकारी के लिए दर्शक को दिमाग लगाना पड़ सकता है|

काश कि अनुशा रिजवी इसे बीवी नातियों वाली की तरह एक धारावाहिक के रूप में ही बनातीं तो यह भारत में तहलका मचाने लायक सामग्री थी| यह समूचे देश का दिल लूटने वाली सामग्री बन सकती थी और वर्तमान में दिलों के मध्य दूरियों के माहौल में दिलों को जोड़ने वाली दवा भी|

…[राकेश]


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