किसी दार्शनिक ने कहा है — ‘यह मत देखो कि ज़िन्दगी में कितने लम्हे हैंयह देखो कि लम्हों में कितनी ज़िन्दगी है |

पचास बरस पहले मुझे माथुर साहब से मिलने का सौभाग्य निरंतर मिलता रहा. और उन से हमारे बहुत आत्मीय पारिवारिक संबंध रहे| मैं उनके काव्य पर शोध कर रहा था, इसलिये उनके सानिध्य में ‘लम्हों में ज़िन्दगी‘ का जो अहम हिस्सा गुज़रा वह यादों के सरमाया समेत प्रस्तुत हैं.

———————–

लम्हों में ज़िन्दगी – 1 > गिरिजा कुमार माथुर और जोश मलीहाबादी

———————–

आकाशवाणी दिल्ली और लखनऊ में केंद्र निदेशक रहते समय गिरिजा कुमार माथुर की अनेक सुविख्यात शायरो से मित्रता हुई. इनमें जोश मलीहाबादी, अली सरदार जाफरी और मजाज़ से गहरी दोस्ती रही. उनके सृजन पर कुछ सीमा तक टाइम स्पेस को लेकर ग़ालिब का प्रभाव भी रहा. उनके काव्य संग्रह में ग़ालिब पर केंद्रित कविता “आने वाले अंदलीवो के लिये” बेहद महत्वपूर्ण है.

माथुर साहब उर्दू के प्रख्यात शायर अली सरदार जाफरी से बहुत प्रभावित थे। उनसे उर्दू शायरी की रिवायत पर लम्बी चर्चा होती थी। जाफरी साहब को वह उर्दू अदब का अधिकारी विद्वान मानते थे। उनके शेरो के कुछ अंश (माथुर साहब के पसंदीदा) इस प्रकार है….

इंक़लाब आएगा रफ़्तार से मायूस न हो

बहुत आहिस्ता नहीं है जो बहुत तेज़ नहीं

पुराने साल की ठिठुरी हुई परछाइयाँ सिमटीं

नए दिन का नया सूरज उफ़ुक़ पर उठता आता है

ये किस ने फ़ोन पे दी साल-ए-नौ की तहनियत मुझ को

तमन्ना रक़्स करती है तख़य्युल गुनगुनाता है

जोश मलीहाबादी से माथुर साहब की बहुत गहरी मित्रता रही। जोश साहब अक्सर आकाशवाणी केंद्र दिल्ली जाकर उनसे मिलते और हिंदी व उर्दू को लेकर दोनों में लम्बी बहस चलती। जोश साहब के मत में हिंदी में उर्दू जैसी नज़्मे नहीं लिखी जा सकती। माथुर साहब इसे चुनौती मानते और उर्दू नज़्म की तर्ज़ पर गीत लिखने का यत्न भी करते।

(अनकही बात)

बोलते में मुस्कराहट की कनी

रह गयी गड़ कर नहीं निकली अनी

याद यह क्षण रहे चाहे दूर से

दूर ही से सही आये रोशनी

इस गीतनुमा नज़्म को सुन कर जोश साहब मुतासिर हुए।

माथुर साहब को जोश साहब की यह नज़्म जो उर्दू अदब का उद्गम है, बहुत पसंद थी…..

दरिया का मोड़ नग़्मा-ए-शीरीं का ज़ेर-ओ-बम

चादर शब-ए-नुजूम की शबनम का रख़्त-ए-नम

तितली का नाज़-ए-रक़्स ग़ज़ाला का हुस्न-ए-रम

मोती की आब गुल की महक माह-ए-नौ का ख़म

इन सब के इम्तिज़ाज से पैदा हुई है तू

कितने हसीं उफ़ुक़ से हुवैदा हुई है तू….”

मजाज़ से मित्रता के प्रसंगो को भी माथुर साहब ने ज़ाहिर किया. मज़ाज़ की नज़्म और गज़ले उन्हें बहुत पसंद थी. ख़ासतौर पर वह इस नज़्म “ए गमें दिल क्या करू, ए वहशते दिल क्या करू ” को अक्सर गुनगुनाते रहते थे|

© डॉ. गोपाल किशोर सक्सेना


Discover more from Cine Manthan

Subscribe to get the latest posts sent to your email.