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लम्हों में ज़िन्दगी – 2

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अशोकनगर के रेलवे स्टेशन की बेंच पर बैठे हुए गिरिजा कुमार माथुर साहब मुझसे अपने अतीत की स्मृतियों को साझा करने लगे|

उन्होंने बताया कि पचास के दशक में वह न्यू यॉर्क में पहली बार हिंदी प्रसारण के लिये गये. वहां पहले ही दिन उन्हें अपनी मातृभूमि और घर की इतनी याद आयी कि भावना के प्रवाह में उनकी आँखे भीग गयी और भावना के उसी आवेग में उन्होंने यह गीत लिखा…

जिस भूमि नें मुझको किया जग में उजागर

मैं पार प्रलयों के गया जिस भूमि का विश्वास पाकर

यश, मान, पद, जो क़ुछ मिला इस पर निछावर

मैं धन्य हूँ उस भूमि का टीका लगाकर

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लम्हों में ज़िन्दगी – 3

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अमरीकी प्रवास के समय ही उन्हें एक विलक्षण अनुभव हुआ. एक सुबह 0° C सर्दी में घूमते समय उन्हें सड़क पर एक सफाई कर्मी केवल कमीज पैंट पहने हुए दिखा. उसके प्रति संवेदना से भरकर उन्होंने अपना ओवरकोट उसे दे दिया. सफाई कर्मी नें उन्हें एक पल देखा और दों उंगलियों के बीच उस ओवरकोट को थाम कर उसे सड़क किनारे डस्टबिन में डाल दिया|

माथुर साहब चकित हुए और उन्हें एहसास हो गया कि यह उसके स्वाभिमान की भावना है|

उन्होंने बताया कि अमेरिका की प्रगति में में वहां के नागरिको का नागरिक-बोध, राष्ट्र के प्रति सम्मान ही उजागर हुआ।

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प्रस्तुति एवं © डॉ. गोपाल किशोर सक्सेना


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