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लम्हों में ज़िन्दगी – 6

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सेवानिवृत्ति के बाद माथुर साहब अधिक समय तक अशोकनगर आते रहे. एक बार बसंत पंचमी के दिन वह वही थे. उन्हें स्मरण हुआ कि बसंत पंचमी के दिन तो महाप्राण निराला का जन्मदिन मनाया जाता है. जब हम अशोकनगर रेलवे स्टेशन की बेंच पर बैठे, तब वह अन्यमनस्क थे और धीमें धीमें “सखि बसंत आया” और “अभी ना होगा मेरा अंत अभी अभी ही तो आया है मेरे वन में मृदुल वसंत” गुनगुनाते रहे| फिर प्रकृतिस्थ होने पर पहली बार निराला जी से अपने मित्र राम विलास शर्मा के साथ मिलने का प्रसंग सुनाया.

मिलने पर निराला जी ने पहला सवाल किया — “कसरत करते हो?”

माथुर साहब: “हाँ

निराला जी: “पंजा लड़ाते हो?”

माथुर साहब: “जी हाँ

निराला जी: “अगर कसरत करते हो, पंजा लड़ाते हो तो अच्छे कवि बनोगे

माथुर साहब: “आदरणीय, कसरत करने और पंजा लड़ाने का काव्य सृजन से क्या तात्पर्य?”

निराला जी (ठहाका लगाते हुए):- “जिसका शरीर ही स्वस्थ और सुगठित नहीं, वह क्या ज़िन्दगी जियेगा, क्या खाक कविता लिखेगा”

यह उनका विलक्षण और “निराला” लॉजिक था

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अशोकनगर रेलवे स्टेशन पर वह आखिरी बेंच आज भी दिख जाती हैं और मैं उस बेंच पर बैठ कर “उन लम्हो में ज़िन्दगी की तलाश करता हूँ… और उनको याद करते हुए यह अदीम हाशमी का यह शेर मेरे ज़ेहन में सरगोशी करने लगता हैं….

वो तो खुशबु की तरह फैला था मेरे चार-सू..

मैं उसे महसूस कर सकता था, छू सकता न था

प्रस्तुति एवं © डॉ. गोपाल किशोर सक्सेना


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