छूत की बीमारियाँ यों कई हैं; पर डर-जैसी कोई नहीं। इसलिए और भी अधिक, कि यह स्वयं कोई ऐसी बीमारी है भी नहीं-डर किसने नहीं जाना? – और मारती है तो स्वयं नहीं, दूसरी बीमारियों के ज़रिये। कह लीजिए कि वह बला नहीं, बलाओं की माँ है…
नहीं तो यह कैसे होता है कि जहाँ डर आता है, वहाँ तुरन्त घृणा और द्वेष, और कमीनापन आ घुसते हैं, और उनके पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन-कौन-सी दबी हुई व्याधियाँ!
वबा का पूरा थप्पड़ सरदारपुरे पर पड़ा। छूत को कोई-न-कोई वाहक लाता है; सरदारपुरे में इस छूत का लाया सर्वथा निर्दोष दीखनेवाला एक वाहक – रोज़ाना अखबार!
यों अखबार में मार-काट, दंगे-फ़साद, और भगदड़ की खबरें कई दिन से आ रही थीं, और कुछ शरणार्थी सरदारपुरे में आ भी चुके थे – दूसरे स्थानों से इधर और उधर जानेवाले काफ़िले कूच कर चुके थे। पर सरदारपुरा उस दिन तक बचा रहा था।
उस दिन अखबार में विशेष कुछ नहीं था। जाजों और मेवों के उपद्रवों की खबरें भी उस दिन कुछ विशेष न थीं – ‘पहले से चल रहे हत्या-व्यापारों का ही ताज़ा ब्यौरा था। कवेल एक नयी लाइन थी’, ‘अफ़वाह है कि जाटों के कुछ गिरोह इधर-उधर छापे मारने की तैयारियाँ कर रहे हैं।’
इन तनिक-से आधार को लेकर न जाने कहाँ से खबर उड़ी कि जाटों का एक बड़ा गिरोह हथियारों से लैस, बन्दूकों के गाजे-बाजे के साथ खुले हाथों मौत के नये खेल की पर्चियाँ लुटाता हुआ सरदारपुरे पर चढ़ा आ रहा है।
सवेरे की गाड़ी तब निकल चुकी थी। दूसरी गाड़ी रात को जाती थी; उसमें यों ही इतनी भीड़ रहती थी और आजकल तो कहने क्या… फिर भी तीसरे पहर तक स्टेशन खचाखच भर गया। लोगों के चेहरों के भावों की अनदेखी की जा सकती तो ही लगता कि किसी उर्स पर जानेवाले मुरीद इकट्ठे हैं…
गाड़ी आयी और लोग उस पर टूट पड़े। दरवाजों से, खिड़कियों से, जो जैसे घुस सका, भीतर घुसा। जो न घुस सके वे किवाड़ों पर लटक गये, छतों पर चढ़ गये या डिब्बों के बीच में धक्का सँभालनेवाली कमानियों पर काठी कसकर जम गये। जाना ही तो है, जैसे भी हुआ, और फिर कौन टिकट खरीदा है जो आराम से जाने का आग्रह हो…
गाड़ी चली गयी। कैसे चली और कैसे गयी, यह न जाने, पर जड़ धातु होने के भी लाभ हैं ही आखिर!
और उसके चले जाने पर, मेले की जूठन-से जहाँ-तहाँ पड़े रह गये कुछ एक छोटे-छोटे दल, जो किसी-न-किसी कारण उस ठेलमठेल में भाग न ले सके थे-कुछ बूढ़े, कुछ रोगी, कुछ स्त्रियाँ और तीन अधेड़ उम्र की स्त्रियों की वह टोली, जिस पर हम अपना ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं।
सकीना ने कहा, ‘‘या अल्लाह, क्या जाने क्या होगा।’’
अमिना बोली, ‘‘सुना है एक ट्रेन आने वाली है – स्पेशल। दिल्ली से सीधी पाकिस्तान जाएगी – उसमें सरकारी मुलाज़िम जा रहे हैं न? उसी में क्यों न बैठे?’’
‘‘कब जाएगी?’’
‘‘अभी घंटे-डेढ़ घंटे बाद जाएगी शायद..’’
जमीला ने कहा, ‘‘उसमें हमें बैठने देंगे? अफ़सर होंगे सब…’’
‘‘आखिर तो मुसलमान होंगे – बैठने क्यों न देंगे?’’
‘‘हाँ, आखिर तो अपने भाई हैं।’’
धीरे-धीरे एक तन्द्रा छा गयी स्टेशन पर। अमिना, जमीला और सकीना चुपचाप बैठी हुई अपनी-अपनी बातें सोच रही थीं। उनमें एक बुनियादी समानता भी थी और सतह पर गहरे और हल्के रंगों की अलग-थलक छटा भी… तीनों के स्वामी बाहर थे – दो के फ़ौज में थे और वहीं फ्रंटियर में नौकरी पर थे – उन्होंने कुछ समय बाद आकर पत्नियों को लिवा ले जाने की बात लिखी थी; सकीना का पति कराची के बन्दरगाह में काम करता था और पत्र वैसे ही कम लिखता था, फिर इधर की गड़बड़ी में तो लिखता भी तो मिलने का क्या भरोसा! सकीना कुछ दिन के लिए मायके आयी थी सो उसे इतनी देर हो गयी थी, उसकी लड़की कराची में ननद के पास ही थी। अमिना के दो बच्चे होकर मर गये थे; जमीला का खाविन्द शादी के बाद से ही विदेशों में पलटन के साथ-साथ घूम रहा था और उसे घर पर आये ही चार बरस हो गये थे। अब… तीनों के जीवन उनके पतियों पर केन्द्रित थे, सन्तान पर नहीं, और इस गड़बड़ के जमाने में तो और भी अधिक… न जाने कब क्या हो – और अभी तो उन्हें दुनिया देखनी बाक़ी ही है, अभी उन्होंने देखा ही क्या है? सरदारपुरे में देखने को है भी क्या-यहाँ की खूबी यही थी कि हमेशा अमन रहता और चैन से कट जाती थी, सौ अब वह भी नहीं, न जाने कब क्या हो… अब तो खुदा यहाँ से सही-सलामत निकाल ले सही…
स्टेशन पर कुछ चलह-पहल हुई, और थोड़ी देर बाद गड़गड़ाती हुई ट्रेन आकर रुक गयी।
अमिना, सकीना और जमीला के पास सामान विशेष नहीं था, एक-एक छोटा ट्रंक एक-एक पोटली। जो कुछ गहना-छल्ला था, वह ट्रंक में अँट ही सकता था, और कपड़े-लतर का क्या है-फिर हो जाएँगे। और राशन के ज़माने में ऐसा बचा ही क्या है जिसकी माया हो।
ज़मीला ने कहा, ‘‘वह उधर ज़नाना है!’’ – और तीनों उसी ओर लपकीं।
ज़नाना तो था, पर सेकंड क्लास का। चारों बर्थों पर बिस्तर बिछे थे, नीचे की सीटों पर चार स्त्रियाँ थीं, दो की गोद में बच्चे थे। एक ने डपटकर कहा, ‘‘हटो, यहाँ जगह नहीं है।’’
अमिना आगे थी, झिड़की से कुछ सहम गयी। फिर कुछ साहस बटोरकर चढ़ने लगी और बोली, ‘‘बहिन, हम नीचे ही बैठ जाएँगे – मुसीबत में हैं…’’
‘‘मुसीबत का हमने ठेका लिया है? जाओ, आगे देखो…’’
जमीला ने कहा, ‘‘इतनी तेज़ क्यों होती हो बहिन? आखिर हमें भी तो जाना है।’’
‘‘जाना है तो जाओ, थर्ड में जगह देखो। बड़ी आयी हमें सिखानेवाली!’’ और कहनेवाली ने बच्चे को सीट पर धम्म से बिठाकर, उठकर भीतर की चिटकनी भी चढ़ा दी।
जमीला को बुरा लगा। बोली, ‘‘इतना गुमान ठीक नहीं है, बहिन! हम भी तो मुसलमान हैं…’’
इस पर गाड़ी के भीतर की चारों सवारियों ने गरम होकर एक साथ बोलना शुरू कर दिया। उससे अभिप्राय कुछ अधिक स्पष्ट हुआ हो सो तो नहीं, पर इतना जमीला की समझ में आया कि वह बढ़-बढ़कर बात न करे, नहीं तो गार्ड को बुला लिया जाएगा।
सकीना ने कहा, ‘‘तो बुला लो न गार्ड को। आखिर हमें भी कहीं बिठाएँगे।’’
‘‘जरूर बिठाएँगे, जाके कहो न! कह दिया कि यह स्पेशल है स्पेशल, ऐरे-ग़ैरों के लिए नहीं है, पर कम्बख्त क्या खोपड़ी है कि…’’ एकाएक बाहर झाँककर बग़ल के डिब्बे की ओर मुड़कर, ‘‘भैया! ओ अमजद भैया! देखो ज़रा, इन लोगों ने परेशान कर रखा है…’’
‘अमजद भैया’ चौड़ी धारी के रात के कपड़ों में लपकते हुए आये। चेहरे पर बरसों की अफ़सरी की चिकनी पपड़ी, आते ही दरवाज़े से अमिना को ठेलते हुए बोले, ‘‘क्या है?’’
‘‘देखो न, इनने तंग कर रखा है। कह दिया जगह नहीं है, पर यहीं घुसने पर तुली हुई हैं। कहा कि स्पेशल है, सेकंड है, पर सुनें तब न। और यह अगली तो…’’
‘‘क्यों जी, तुम लोग जाती क्यों नहीं? यहाँ जगह नहीं मिल सकती। कुछ अपनी हैसियत भी तो देखनी चाहिए-’’
जमीला ने कहा, ‘‘क्यों हमारी हैसियत को क्या हुआ है? हमारे घर के ईमान की कमाई खाते हैं। हम मुसलमान हैं, पाकिस्तान जाना चाहते हैं। और…’’
‘‘और टिकट?’’
‘‘और मामूली ट्रेन में क्यों नहीं जाती?’’
अमिना ने कहा, ‘‘मुसीबत के वक्त मदद न करे, तो कम से कम और तो न सताएँ! हमें स्पेशल ट्रेन से क्या मतलब? – हम तो यहाँ से जाना चाहते हैं जैसे भी हो। इस्लाम में तो सब बराबर हैं। इतना ग़रूर – या अल्लाह!’’
‘‘अच्छा, रहने दे। बराबरी करने चली है। मेरी जूतियों की बराबरी की है तैने?’’
किवाड़ की एक तरफ का हैंडल पकड़कर जमीला चढ़ी कि भीतर से हाथ डाल कर चिकटनी खोले, दूसरी तरफ़ का हैंडल पकड़कर अमजद मियाँ चढ़े कि उसे ठेल दें। जिधर जमीला थी, उधर ही सकीना ने भी हैंडल पकड़ा था।
भीतर से आवाज़ आयी, ‘‘खबरदार हाथ बढ़ाया तो बेशर्मो! हया-शर्म छू नहीं गयी इन निगोड़ियों को…
सकीना ने तड़पकर कहा, ‘‘कुछ तो खुदा का खौफ़ करो! हम ग़रीब सही, पर कोई गुनाह तो नहीं किया…’’
‘‘बड़ी पाक़-दामन बनती हो! अरे, हिन्दुओं के बीच में रहीं, और अब उनके बीच से भागकर जा रही हो, आखिर कैसे? उन्होंने क्या यों ही छोड़ दिया होगा? सौ-सौ हिन्दुओं से ऐसी-तैसी कराके पल्ला झाड़ के चली आयी पाक़दामानी का दम भरने…’’
जमीला ने हैंडल ऐसे छोड़ दिया मानो गरम लोहा हो! सकीना से बोली, ‘‘छोड़ो बहिन, हटो पीछे यहाँ से!’’
सकीना ने उतरकर माथा पकड़कर कहा, ‘‘या अल्लाह!’’
गाड़ी चल दी। अमजद मियाँ लपककर अपने डिब्बे में चढ़ गये।
जमीला थोड़ी देर सन्न-सी खड़ी रही। फिर उसने कुछ बोलना चाहा, आवाज़ न निकली। तब उसने ओंठ गोल करके ट्रेन की ओर कहा, ‘‘थूः!’’ और क्षण-भर बाद फिर, ‘‘थूः!’’
आमिना ने बड़ी लम्बी साँस लेकर कहा, ‘‘गयी पाकिस्तान स्पेशल। या परवरदिगार!’’
(अज्ञेय , इलाहाबाद, 1947)
Discover more from Cine Manthan
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

October 27, 2023 at 12:54 PM
kya KAHANI likhi hai agyaye ne. is par to picture banani chahiye
LikeLike