तुममें कहीं “कुछ” है

कि तुम्हें उगता सूरज, मेमने, गिलहरियाँ,

कभी-कभी का मौसम,

जंगली फूल-पत्तियां , टहनियां –

भली लगती हैं…  (रघुवीर सहाय)

इस “कुछ” को परिभाषित करना दुष्कर कार्य है| हरेक के लिए है| हमेशा रहा है|

इंटरनेट के अस्तित्व में आने, सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में जीविकोपार्जन का धमाकेदार विस्तार और युवाओं के हाथों में इंटरनेट की सुविधा आ जाने से, याहू, ऑरकुट, ब्लॉगिंग, फेसबुक, यूट्यूब और फिर ट्विटर एवं इन्स्टाग्राम आदि सोशल मीडिया के प्लेटफ़ॉर्मस पनपने से फिल्मों, और संगीत में गहरी रूचि रखने वाले लोगों के आपस में जुड़ाव होने लगे, इंटरनेट पर समूह बनने लगे जिनमें से बहुत से कालांतर में बिगड़ते और नष्ट भी होते रहे| लेकिन इन सबके अस्तित्व में आने से फिल्मों और संगीत के संबंध में तथ्य, दंतकथाएं, कपोल कल्पित कथाएं आदि के आदान प्रदान होने लगे और फिल्मों और संगीत का इतिहास बनने और एकत्रित होने लगा| इंटरनेट के आदुर्भाव और फिल्मों, फ़िल्मी संगीत, सुगम संगीत, और शास्त्रीय संगीत के संसार की और इनके बारे में ज्ञान की इंटरनेट पर उपस्थिति की इस तकरीबन ढाई दशक लम्बी यात्रा में पवन बाबू एक महत्वपूर्ण यात्री रहे हैं| ये इन क्षेत्रों से सम्बंधित हरेक मोड़ पर कुछ न कुछ करते अवश्य ही मिल जायेंगे| किसी भी क्षेत्र में एक काल में एक सामूहिक चेतना का विकास होता है| सो उस सामूहिक चेतना के एक धनी सहभागी पवन भी हैं|

मोटे तौर पर देखें तो सन 2010 के आसपास के काल में भारतीय फिल्मों, और उनके संगीत , अभिनेताओं, एवं निर्देशकों पर किताबें छपने की शुरुआत बड़े पैमाने पर हो गयी| पहले फिल्मों और फ़िल्मी संगीत पर गाहे बगाहे ही लिखा जाता था और बड़े लेखक तो लिखते ही नहीं थे| मंटो ने चूंकि फिल्मों में लेखन किया तो उन्होंने फ़िल्मी लोगों से अपने मेल मिलाप के आधार पर “मीना बाज़ार” लिखी| पर उनके बाद किसी बड़े साहित्यकार ने मुश्किल से इस क्षेत्र में हाथ आजमाया होगा|

इंटरनेट युग में बहुतों ने किताबें भी लिखीं| बहुतों ने नहीं भी लिखीं| लिख जाने वालों और न लिख पाने वालों के बीच शर्तिया एक धागे भर का अंतर आ गया होगा| पर पवन नामक एक व्यक्ति ऐसा भी है इस फिल्मों और संगीत के इतिहास के डिजिटल संसार में जो सारी उम्र एक भी किताब न लिखे तब भी उसके बारे में इस डिजिटल संसार के विचार पुख्ता ही रहते जायेंगे| फ़िल्मी संगीत, सुगम संगीत पर किताबें लिखने वाले चाहे भारत के हों, पड़ोसी देशों के, उन सबका निजी परिचय इस भारतीय संगीत पारखी रसिक पवन से अवश्य ही होगा| उन्होंने अपनी पुस्तक रचना में इनसे कुछ न कुछ अवश्य लिया होगा अगर परोक्ष रूप से न सही तो अपरोक्ष रूप से | वैसे कई सालों से वे दो तीन किताबों के बहुत हद तक पूरा कर देने की बात करते रहे हैं| लेकिन ‘ न जाने क्या हुआ जो रहस्य ने छू लिया’ की स्थिति आ जाती है और वे किताबें बाहर नहीं आतीं|

धर्मवीर भारती की एक कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं-

सीटी फिर बोली –

सुनो मेरे मन हारो मत

दूर कहीं लोग जीवित हैं

यात्राएं करते हैं, मंजिल है उनकी

जाने कहाँ कहाँ तक की यात्राएं ये करते ही रहते हैं| दूर दराज के ग्रामीण अंचल, जहां अभी भी पैदल चल कर ही पहुंचा जा सकता होगा, वहां पहुँच कर भी पवन बाबू के खींचे फोटो नेट पर अस्तित्व पाते रहते हैं|

जनाब का फोन मिलाइए, श्री चार सौ बीस से झाँक कर मन्ना डे आपका मन तब तक बहलाएँगे जब तक कि ये आपकी कॉल रिसीव न कर लें| जीवन पर कुछ बंदिशों के आक्रमण के कारण लगभग 3 साल से ऐसा मौका लगा नहीं फोन करने का (फोन पर बात अवश्य हुयी कुछ बार) पर अब भी शायद उनके मोबाइल पर “दिल का हाल सुने दिलवाला” बजता ही होगा|

कई किस्म के चुनौती भरे तकनीकी कामों में इनका मन लगता है| नौकरी जो एक बार छोड़ी तो फिर उस तरह मुंह न किया| व्यापार, स्व: रोज़गार में रत लोगों, खासकर जो नौकरी की प्रष्ठ्भूमि से आये हों, तनाव घेर ही लेते हैं, फ्रीलांसिंग जीवन के समुद्र में अपनी तरह के ज्वार भाटे आकर इंसान के भावनात्मक पहलू को प्रभावित करते हैं पर ये अपवाद को छोड़ सदैव प्रसन्नचित ही नज़र आयेंगे आपको| खुशमिजाजी इतनी कि बहुत से इन्हें इसलिए फोन मिलाते होंगे या मिलने चले जाते होंगे कि चलो खुशी की अपनी बैटरी चार्ज कर आयें| अधिकतर तो यही माना जाता है कि स्वस्थ रहना है तो प्रसन्न रहो, या प्रसन्न रहो तो स्वस्थ रहोगे|

असली चाँद में भी जैसे दाग से दिखाई देते हैं वैसे ही सभी की खुशी के चाँद में भी आते ही होंगे, आते ही हैं|

पवन बाबू कभी कभार ही व्हाट्स अप, सोशल मीडिया, ब्लॉग आदि पर तर्क शास्त्र पर आधारित शास्त्रार्थ में प्रवेश करते हैं| बिलकुल विपरीत टिप्पणी भी उनके लिखे विषय पर कर दो, तो सौ में से 5-6 बार से ज्यादा वे मुश्किल से उस तर्क पर और तर्क करेंगे| जीवन में एक पड़ाव पर ऐसा अवसर आया जब लोग कुछ कारणों से लोग व्यक्ति विशेष के प्रति अपने रुख को बदल लेते हैं यह सोचकर कि ऐसा करना उस व्यक्ति के लिए ज्यादा अच्छा होगा इन परिस्थितियों में| पर एक घटना एक बदलाव क्यों ऐसे महत्वपूर्ण हो जाएँ कि उससे स्वभाव बदल दिए जाएँ, अपने भी और अपने साथ संबध के भी? जैसा है वैसा है के आधार पर ही जीवन चलना चाहिए|

प्रसन्नता के चाँद पर आक्रमण करते दागों को अपने दृढ निश्चय, अनुशासन, जिन्दादिली और मेहनत से हटा देने वालों में पवन ने अपना नाम सम्मिलित किया|

इंटरनेट पर गुलज़ार संसार के एक सबसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षर पवन हैं| यह कहना कतई भी अतिशयोक्ति नहीं कि पवन की उपस्थति गुलज़ार डिजिटल संसार में न होती तो गुलज़ार के आम प्रशंसक गुलज़ार से इस तरह नज़दीकी से न जुड़ पाते| पहले गुलज़ार ऑनलाइन वेबसाईट फिर G-मित्र समूह द्वारा आम प्रशंसक गुलज़ार साब से जुड़ ही रहते हैं| इन सबकी अनुपस्थिति में गुलज़ार साब की पुस्तकों के विमोचन या साहित्यिक समारोहों में ही आम प्रशंसक उनसे मिल पाते| और भी सितारे लेखक कवि हैं जो ऐसे समारोहों में प्रशंसकों द्वारा देखे जाते हैं, सुने जाते हैं और कुछ ऐसी जगहों पर लोग उनसे मिल भी पाते हैं लेकिन वे सितारे लेखक, कवि इतने सँवारे हुए तरीके से, तरतीब से अपने प्रशंसकों से जुड़े नहीं रहते हैं जैसे गुलज़ार साब जबकि उनकी छवि एक मिलनसार रचनाकार की तो बिलकुल भी नहीं रही है| यह सब डिजिटल संसार के कारण संभव हुआ है और इसमें 90% योगदान पवन का ही है, बाकी सब तो लाभार्थी ही हैं|

किसी एक क्षेत्र में जानकारी और ज्ञान के एक पड़ाव से आगे जाने पर प्राइमरी स्तर के नवागंतुकों संग बैठकी इतनी आसान नहीं रह जाती लेकिन इस शख्स की रेंज बहुत बड़ी है, शुरुआत वाले, माध्यमिक स्तर वाले और उच्च स्तर पाए सभी लोगों के अखाड़े में ये सहजता से चहलकदमी करते हैं| इनकी यह क्षमता सीख देने वाली है| अपनी विस्तृत रेंज के कारण जो बड़ा कारवाँ लेकर ये चलते हैं वह गीत-संगीत और फ़िल्म के क्षेत्रों की बड़ी सेवा सरीखी है क्योंकि नए कुछ सीखते जाते हैं, थोडा सीखे और गहरे में तैरने लगते हैं| विशेषज्ञ स्तर के व्यक्ति को इनकी विशाल नेट्वर्किंग से सटीक कनेक्शन मिल जाते हैं जो उनके रचनाकर्म में उनकी सहायता कर सके|

कहीं इनकी सहजता की धार कुंद भी पड़ती है? बिलकुल पड़ती है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि प्राकृतिक रूप से ऐसा होता है या सप्रयास ये ऐसा करते हैं| राजनीतिक चर्चा में पक्ष लेकर बात करते बहुत कम अवसर पर पायेंगे इन्हें| ये ऐसे ही बच जाते हैं जैसे फ़िल्मी सितारे और खिलाड़ी आदि बचे रहते हैं| ऐसे अवसरों पर ये गीतों या फ़िल्मी दृश्यों की आड़ ले लेते हैं| वहां ये न काहू से दोस्ती न काहू से बैर के सिद्धांत का पालन करते दिखाई देते हैं|

दूसरा कुंद धार का क्षेत्र दिखाई देता है सौंदर्यशास्त्र का या श्रृंगार रस का| ये गीत संगीत, फ़िल्म, साहित्य आदि सभी पर अपनी लेखनी का कमाल दिखाते ही रहते हैं लेकिन उसमें उपरोक्त क्षेत्रों का उल्लेख नगण्य के आसपास ही मिलेगा|

कुछ दिन पहले एक रोचक घटना घटी| एक सज्जन का फोन आया| अध्यापन से होते हुए अब अपने संस्थान के प्रमुख हैं| किसी सांस्कृतिक समारोह में उन्होंने कोई कविता पढ़ दी यह कह कर कि गुलज़ार साब की कविता यहाँ सटीक बैठती है| उनके कविता पढने के बाद चायपानी के समय बहुतों के सामने किसी ने उन्हें टोक दिया कि सर आपने जो कविता पढ़ी वो गुलज़ार की नहीं है| सज्जन ने कहा अरे बिलकुल है, उन्होंने इंटरनेट पर पढी थी| टोकने वाले व्यक्ति ने कहा कि उसने भी इसे पढ़ा है और उस पर #NotByGulzar की सील लगी थी|

सज्जन ने कहा, “नॉट बाई गुलज़ार” की सील? वो क्या बला है?

उनकी काव्य धारा में अवरोधक लगाने वाले व्यक्ति ने कहा कि सर इंटरनेट पर गुलज़ार के नाम से जो उनके द्वारा कभी भी न लिखी गई शेरो शायरी चलती है उसे लोगों के सामने स्पष्ट करने के लिए नकली शायरी पर “नॉट बाई गुलज़ार” की डिजिटल छाप लगा दी जाती है|

सज्जन थोडा असहज हो गए, उन्हें लगा कि बेइज्जती हो गयी है| उन्होंने पूछा, गुलज़ार साहब का स्टाफ करता है इस काम को?

नहीं सर, एक पवन झा हैं, उन्होंने इस कार्य को शुरू किया है|

गुलज़ार साब के कार्यों में रूचि को जानते हुए इस बात के बाबत उन्होंने फोन करके पूछा,”मित्र, तुम जानते हो किन्हीं पवन झा को, और उनके “नॉट बाई गुलज़ार” वाली बात को| क्या यह सच है?

“हाँ जानता, पहचानता तो हूँ| नेट पर बड़े-बड़े लोग ऐसी गलतियां कर जाते हैं| अमिताभ बच्चन ने तो अपने पिता के नाम से डॉ बच्चन द्वारा कभी न लिखी कविता ट्विटर और फेसबुक पर अपने आधिकारिक हेंडल से पोस्ट कर दी|”

अमिताभ बच्चन के इस उदाहरण से थोड़ा सहज हुए, बोले,”हाँ अब कहाँ तक इस बात का ध्यान रखें कि असली है या नकली है| पर बड़ी असहज स्थिति हो गयी| हमने एक शायरी गुलज़ार के नाम से सुना दी एक सबोर्डिनेट ने हमें बहुतों के सामने कह दिया कि गुलज़ार की शायरी नहीं है| | ये पवन झा दोस्त हैं तुम्हारे?

लगा पता नहीं वे क्या कहने को बोलें तो उनसे कहा,” जानता तो हूँ उनको कई सालों से, प्रत्यक्ष मुलाक़ात 2-3 बार हुयी है|”

“दो तीन मुलाकात में तो तुमसे कैसे दोस्ती हो पायेगी किसी की, या तुम्हारी किसी से| पर यार फजीहत हो गयी सबके सामने|”

“छोड़ो, ऐसा तो इंटरनेट युग में होता ही रहता है| अबकी बार ग़ालिब की शायरी पढ़ देना”

आप बहुत समय से कुछ ढूंढ रहे हों और यूट्यूब पर आपको वह मिल जाये तो सौ में से पचास-साठ बार वह क्लिप पवन द्वारा अपलोड किया गया होगा| पूरी न हो सकने वाली फिल्मों के गीत, बंद हो जाने वाली फिल्मों के गीत, फ़िल्म से निकाले पर रिकार्ड हुए गीत, इन सबकी सूचना ही पवन के पास नहीं मिलेगी वरन ज्यादातर केस में तो ऐसे गीत भी मिल जायेंगे| गीत, संगीत और फ़िल्म आधारित क्विज में चार पांच ही और लोग हैं जो पवन के साथ कदम ताल करते हैं|

खाली गुलज़ार ही नहीं, सलिल चौधरी, पंचम, किशोर, एस डी बर्मन, के साथ अन्य बहुत सारे कलाकार हैं जिनके रचना क्षेत्रों में पवन की गहन जानकारी का विस्तृत क्षेत्र फैला हुआ है|

खाने के शौक़ीन हैं और अच्छे बड़े शौक़ीन हैं| और एक दफा उनके जॉयपुर जयपुर नगरी में उनसे जो मिलना हुआ तो रेलवे स्टेशन से जाते हुए पहले एक प्रसिद्द रावत कचौड़ी या मिष्ठान भण्डार नामक दूकान पर मिर्चों से भरे खाद्य पदार्थों के हवाले कर दिया और मिर्च का भारी भरकम असर देख कुछ मीठा पेय भी ले आये कि मिर्च को काटेगी| रास्ते में एक और प्रसिद्द कुल्हड में मिलने वाली लस्सी से मिर्च की तानाशाही कम करवाई| कार उन्होंने अपनी पेंट होने के लिए दी होगी गैराज में पर गैराज मालिक ने समय की पाबंदी से मुंह फेरा होगा तो बीच में दो चार दिनों के लिए अपनी चहेती कार को प्राइमर लगी रंगत में ही ले आये| तब लगा था कि ये ‘चलती का नाम गाड़ी‘ की गाड़ी वाली भावना को वास्तव में जी रहे हैं|

संगीत समीक्षक, समालोचक, इतिहासकार, और संग्राहक कुछ भी पवन को कहते रहो पर ये सब कार्य पवन एक रसिक की भांति, अंदुरनी आनंद लेते हुए ही करते हैं, वर्ना इतने सालों ऐसा काम करना मुश्किल हो जाता है| एक गंभीरता व्यक्ति और उसके रचनाकर्म पर छा ही जाती है|

इस कार्य की भी सनद रहनी चाहिए कि इन रचनात्मक क्षेत्रों में ऐसा महत्वपूर्ण कार्य करने वाले कर्मठ योद्धा भी लगे रहे हैं|

अगर भारतीय फिल्मों और संगीत के क्षेत्र में किसी की रूचि है तो उसे ज़रा गौर से देखना है कि डिजिटल माध्यम से वह इन क्षेत्रों में असाधारण योगदान देते रहने वाले पवन झा से अवश्य ही जुड़ा हुआ होगा, और कभी न कभी उसके रास्ते पवन से अवश्य ही टकराए होंगे| अगर किसी के रास्ते अभी तक नहीं टकराए हैं तो उसे पवन की राह खोजकर भिड़ ही जाना चाहिए | कुछ न कुछ अच्छा ही उसे प्राप्त होगा|

पवन की सक्रिय उपस्थिति से गीत-संगीत, सिनेमा, आदि क्षेत्रों के अध्ययन में एक अच्छे वातावरण का विकास होता आया है|

              …[राकेश]

          


Discover more from Cine Manthan

Subscribe to get the latest posts sent to your email.