एक अकेली छतरी में जब आधे आधे भीग रहे थे, पंक्ति जब गुलज़ार ने रची होगी अपनी फ़िल्म इज़ाजत के एक गीत के लिए, तब बहत संभावना है इस बात की कि उनकी स्मृति में विजय आनंद की फ़िल्म काला बाज़ार का गीत – रिम झिम के तराने लेकर आई बरसात, नामक रोमांटिक गीत चल रहा होगा|

बरसात आये या बरसात की चाह उत्पन्न हो या किसी बीती बरसात की कोई स्मृति कौंध जाए तो विजय आनंददेव आनंदवहीदा रहमान, शैलेन्द्रसचिन देव बर्मनरफ़ीगीता दत्त, और सिनेमेटोग्राफर वी.रात्रा की संयुक्त रचनात्मकता से उपजा यह गीत अवश्य ही सामने आ जाता है|

भारतीय संस्कृति में और इसमें जन्में साहित्य में सावन और बरसात का बड़ा महत्त्व रहा है| हिंदी सिनेमा में बरसात को एक चरित्र बनाकर या उसकी पृष्ठभूमि में गीत को फिल्मा कर बहुत से महान गीत बने हैं| और मुंबई जिस फ़िल्म की कहानी में इसके चरित्रों की निवास स्थली हो उसमें बरसात न दिखाना एक तरह से कृत्रिमता की ओर जाना है|

विजय आनंद भी अपनी फ़िल्म – काला बाज़ार में एक रोमांटिक बरसात वाला गीत फिल्माना चाहते थे| उनकी इस फ़िल्म में कथा, पटकथा, संवाद लेखन से लेकर निर्देशन और संपादन, आदि उन्होंने स्वयं ही संभाला था और एक ऐसे गीत की पूरी सिचुएशन गढ़ कर रखी थी | शैलेन्द्र ने एक आकर्षक डुएट गीत लिख दिया था सचिन देव बर्मन दादा ने शानदार धुन रच दी थी, संगीत और गीत लिखने का क्रम इसके उलट भी हो सकता है, क्योंकि दोनों तरह से फ़िल्मी गीत बनते रहे हैं|

यह वही वक्त था जब लगभग दो सालों के लिए एस डी बर्मन और लता मंगेशकर आपसी कलाकारी मनमुटाव के कारण एक दूसरे के साथ काम नहीं कर रहे थे| पहले भी जब लता मंगेशकर से नहीं गवाते थे एस डी बर्मन तो गीता दत्त से गीत गवाते रहे थे और गुरुदत्त की फिल्मों में तो विशिष्ट रूप से गीता दत्त से गीत गवाते रहे थे| अतः गीत गवाने के लिए गीता दत्त से संपर्क किया गया| गीता दत्त नायिका वहीदा रहमान के लिए पार्श्व गायन करने के लिए तैयार नहीं हुईं| निर्देशक विजय आनंद ने स्थिति अनुसार इस गीत को लेकर पहले बनाई अपनी सारी योजना रद्द कर दी और एक सक्रिय डुएट (जिसे परदे पर देव आनंद और वहीदा रहमान) को गाना था, को एक पार्श्व गीत बना दिया गया| विजय आनंद के इस रचनात्मक निर्णय के कारण और दादा बर्मन को गीत गाने के लिए इनकार न कर सकने के कारण गीता दत्त ने भी अपने हठ से समझौता करके रफ़ी के साथ गीत गा दिया|

अब इस गीत के दो प्रारूप हो गए हैं| गीत के केवल ऑडियो संस्करण में यह लंबा गीत है और इसमें तीन पद्यांश हैं जबकि इसके वीडियो संस्करण में यह लगभग 2 ही मिनट का गीत और दो पद्यांश ही समाये हुए है|

गीत की पृष्ठभूमि :-

अलका (वहीदा रहमान) का प्रेमी नन्द कुमार (विजय आनंद) है, और विजय आनंद उस जमाने के हिसाब से एक प्रोग्रेसिव समीकरण गढ़ते हैं| रघुवीर (देव आनंद) सिनेमा के टिकट ब्लैक करने वाला एक गैंग चलाता है और अलका को देखकर वह उस पर मोहित हो जाता है| अलका को ब्लैक मार्केटिंग के इस धंधे से सख्त नफरत है और यह देखकर रघुवीर इस काम को छोड़ देता है| नन्द कुमार स्कॉलरशिप लेकर विलायत चला जाता है और रघुवीर अवसर रचता रहता है अलका के नजदीक जाने के| धीरे धीरे नन्द की चिट्ठियाँ आनी भी बंद हो जाती हैं और अकेली अलका और रघुवीर में मित्रता हो जाती है, वह उसके टिकट ब्लैक करने के भूतकाल को नहीं जानती| अलका मानसिक रूप से दोराहे पर है एक तरह रघुवीर उसके दिल में जगह बनाता जा रहा है दूसरे उसे यह भी लगता है कि उसे नन्द कुमार का इंतज़ार करना चाहिए| उसके माता पिता का दबाव भी है कि नन्द कुमार ने कोई संपर्क नहीं रखा है अतः उसे अब स्वतंत्र रूप से सोचकर विवाह कर लेना चाहिए| इस सारी अवधि में अलका और रघुवीर की कई सारी साझी स्मृतियाँ भी एकत्रित हो चुकी हैं और होती जा रही हैं|

अलका के दो दिशाओं से खींचे जाने के दौरान ही एक दिन ऐसा आता है कि जब रघुवीर भी बस स्टॉप पर खड़ा है और अलका भी| दोनों एक दूसरे की वहां उपस्थिति से अनजान हैं| और सहसा बारिश शुरू हो जाती है|

एक टैक्सी आकर रुकती है तो दोनों अपनी अपनी क्यू से निकल कर टैक्सी की ओर लपकते हैं लेकिन एक दूसरे को देखकर अचंभित हो जाते हैं और उनके इस् ठिठकने के कारण एक वृद्ध महिला उनके बीच से निकल कर टैक्सी में बैठ जाती हैं और टैक्सी चली जाती है|

अलका के पास छाता है लेकिन टैक्सी में बैठने की प्रक्रिया के कारन वह उसे बंद कर चुकी होती है और उसे लगातार भीगता देख रघुवीर उसे चेताता है कि छाता खोल लो वर्ना सर्दी लग जाएगी|

अलका उसे प्रस्ताव देती है कि टैक्सी स्टैंड तक उसके छाते में चलते हैं और दोनों एक ही छतरी के नीचे टैक्सी स्टैंड की ओर पैदल चलने लगते हैं|

युवा दिलों के लिये इससे रोमांटिक दृश्य नहीं हो सकता| नायक नायिका संग जिस नजदीकी की चाह रखता होगा वैसी एक छाते की चलायमान छत की साझीदारी से बढ़कर कभी नहीं मिल सकती| नायिका नायक को अपनी छतरी में अपने साथ चलने का निमंत्रण दे रही है अतः मानसिक रूप से उसके साथ के प्रति वह सहज हो चुकी है और अब संभवतः वह उसके साथ प्रेम मार्ग पर आगे बढ़ सकती है|

टैक्सी स्टैंड पर जाकर वे एक भी टैक्सी वहां नहीं पाते और नायक के लिए तो बेहतर है कि छाते के नीचे नायिका संग और कुछ समय व्यतीत करे तो वह कहता है

मालूम होता है किस्मत में पैदल चलना ही लिखा है

नायिका थोड़ी परेशान है लेकिन नायक के साथ होने के कारण आश्वस्त भी है| वह पूछती है,

“कहाँ रहते हो तुम?”

नायक –

“तुम्हारे घर के पास”|

नायिका की बड़ी आँखें विस्मय से और बड़ी हो जाती हैं कि नायक को उसके घर का पता मालूम है| नायक उसके आँखों में उपजे सवाल और हल्की नाराजगी को देखकर शरारत से कंधे उचका देता है और कहता है,

” चलो”|

विजय आनंद ने जैसा वादा गीता दत्त को दिया था कि यह डुएट पार्श्व में चलेगा, इसे नायक नायिका परदे पर गायेंगे नहीं, उस वादे को पूरा करते हुए विजय आनंद इस गीत को नायक नायिका की साझी समृतियों का पुंज बनाकर प्रस्तुत करते हैं और दोनों बारी बारी से एक दूसरे से जुडी अपनी अपनी यादों को अपने मन में पुनः घटता हुआ देखते हैं|

रिमझिम बरसती बरस्सात में मैरिन ड्राइव पर फुटपाथ पर एक छाते के नीचे चले नायक नायिका को दिखाकर और समुद्र की लहरों के थपेड़ों को दिखाकर गीत आरम्भ होता है जिसमें नायक के मन के उदगार से अगर पहली पंक्ति शुरू होती है तो दूसरी पंक्ति नायिका के दिल की बात बयान करती है| दोनों चरित्रों की भावनाओं का आधा आधा निवेश है इस गीत में| इतने मधुर गीत को देव साब परदे पर सक्रिय होकर प्रस्तुत न करें इस बात के लिए उन्हें राजी करना विजय आनंद के लिए बड़ा भारी काम रहा होगा| ऐसे गीत में परदे पर देव साब पैसिव रह ही नहीं सकते लेकिन विजय आनंद इस कठिन टास्क को भी पूरा करते हैं और देव साब को यादों में खोये उनके चरित्र रघुवीर के सांचे में ढाल देते हैं|

रिमझिम के तराने लेके आई बरसात

याद आए किसी से वो पहली मुलाक़ात

भीगे तन-मन, पड़े रस की फुहार

प्यार का संदेसा लाई बरखा, बहार

मैं ना बोलूँ…

मैं ना बोलूँ, आँखें करें अखियों से बात

रिमझिम के तराने लेके आई बरसात

सुन के मतवाले काले बादलों का शोर

रूम-झूम, घूम-घूम, नाचे मन का मोर

सपनों का साथी चल रहा है मेरे साथ

रिमझिम के तराने लेके आई बरसात

गीत से पहले क्या दृश्य हों (जिनका जिक्र ऊपर हुआ) और गीत समाप्त होने के बाद कहानी आगे प्राकृतिक रूप से बढे, इसके लिए कैसे शानदार दृश्य रखे जाएँ इसकी समझ विजय आनंद में कूट कूट कर भरी थी|

गीत समाप्त होते ही नायक नायिका रघुवीर के घर के सामने पहुँच जाते हैं|

नायक एक इमारत की ओर हाथ उठाकर कहता है

मैं यहाँ रहता हूँ

नायिका साझेदारी भरी यात्रा के प्रभाव से बाहर आकर चेहरे पर एक जबरन लायी गयी हंसी बिखेरती कहती है

अब मैं चलूँ

नायक इसरार करता पूछता है|

अन्दर नहीं चलोगी?

इस निमंत्रण से अचरज, और भ्रम में पड़ गयी नायिका जाना भी चाहती है लेकिन स्त्री होने की सहज प्रकृति को तिलांजली भी नहीं दे सकती| वह संकोच से भरे स्वर में कहती है,

मुझे देर हो जायेगी

उसकी आँखें और बोलो में सामंजस्य नहीं है| यह आकर्षण और व्यावहारिकता के मिश्रण का क्षण है जिसे विजय आनंद एक बिना रुकावट वाले एकरूपी सीक्केंस के रूप में फिल्माते हैं|

नायक उसे आश्वस्त करते कहता है इस भाव से कि मुझे ऐसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखकर मुझ पर लांछन मत लगाओ

मैं अकेला नहीं रहता, मेरी माँ है, बहन है |

और जो हंसी नायिका के चेहरे पर खिलती है, जहां उसकी हंसी उसकी आँखों तक पहुँचती है और ओठों की हरकत उसके कानों तक, तो सौ में से सौ दर्शक इस क्षण उसके साथ हंस न पड़ें तो विजय आनंद एक साधारण निर्देशक ही सिद्ध हो जाएँ!

यह सारा सीक्वेंस सिनेमा के परदे पर साहित्य रचने जैसा उत्कृष्ट है|

वर्तमान में तो नायक नायिका खामोशी से पैदल चल रहे हैं लेकिन उनके अन्दर उनकी संयुक्त स्मृतियों की झांकी चल रही है| वर्तमान के साथ का, इतनी नजदीकी की भी स्मृति उनके स्मृति कोष में संचित होती जा रही होगी और उसी समय वे भूतकाल में घटे की यादों के साथ भी उपस्थित हैं|

जो पद्यांश गीत के वीडियो संस्करण में नहीं है वह नीचे दिया है

जब मिलते हो तुम क्यूँ छिड़ते हैं दिल के तार?

मिलने को तुमसे मैं क्यूँ था बेक़रार?

रह जाती है…

क्यूँ होंठों तक आके दिल की बात?

रिमझिम के तराने लेके आई बरसात

याद आए किसी से वो पहली मुलाक़ात

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…[राकेश]


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