इंसान के लिए हँसना तो बहुत जरुरी है| यह अच्छे स्वास्थ्य, मानसिक एवं शारीरिक, का द्योतक भी है और हंसने से व्यक्ति का मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता भी है|

जैसे पौ फट रही हो जंगल में

यूँ कोई मुस्कुराए जाता है

दिल खोलकर, दुनियादारी भूलकर हँसना भी ध्यान जैसा ही है, ऐसा करते ही मनुष्य कालातीत अवस्था में, दीन दुनिया से निरपेक्ष अवस्था में पहुँच जाता है| हंसी में वह खुद भी नहीं रहता बस हंसने के भाव का अस्तित्व ही उपस्थित रहता है|

हास्य (अच्छा हास्य) सिनेमा बनाना कठिन काम है| लेखक, संवाद लेखक, निर्देशक से लेकर अभिनेता के लिए यह एक कठिन विधा सिद्ध होती है| अभिनेता के लिए तो खास तौर पर अगर उसकी टाइमिंग सही नहीं है तो वह उच्च कोटि के हास्य से भरे दृश्य और संवादों को असरहीन बना सकता है|

हास्य अभिनेता महमूद ने जब निर्माता के रूप में पड़ोसन का निर्माण शुरू किया और ज्योति स्वरूप को उसका निर्देशन सौंपा तो उसमें सुनील दत्त और सायरा बानू के अलावा तीन मुख्य भूमिकाओं में एक में स्वंय को, एक में ओम प्रकाश को और एक में किशोर कुमार को साइन किया|

ऐसा कहा जाता है कि सेट पर पहले ही दिन जब महमूद और सुनील दत्त ने किशोर कुमार का गेट अप, और उनका अभिनय प्रदर्शन देखा तो वे भौचक्के से रह गए और शूटिंग हफ्ते दस दिन के लिए रोक दी गयी| दोनों वापिस आये सेट पर तो महमूद ने गंजे सिर वाले दक्षिण भारतीय व्यक्ति के गेट अप में नज़र आये और सुनील दत्त भी अपने चरित्र को नए रूप रंग में ढाल कर सेट पर आये थे|

इस दंतकथा में सच्चाई हो न हो लेकिन इस फ़िल्म में किशोर कुमार के अभिनय को देखने के बाद यह घटना एकदम सच्ची ही लगती है|

ओम प्रकाशमहमूदमुकरीकेश्टो मुखर्जीसुन्दर और आगा जैसे ख्याति प्राप्त हास्य कलाकार फ़िल्म में हों, नायिका आठवीं कक्षा पास करने के चौथे प्रयास में लगी हो, 26 वर्षीय अविवाहित नायक का पचास वर्षीय मामा अपनी पत्नी से अलग रहता हो और अब पुनः विवाह के फेर में हो, राजेन्द्र कृष्ण के लिखी गीतों पर बनी राहुल देव बर्मन की शानदार धुनों को लता मंगेशकरकिशोर कुमार आशा भोसले और मन्ना डे की गायिकी मिली हो और ऐसे में फ़िल्म के सारे बेहतरीन गुणों के बीच भी किशोर कुमारसुनील दत्त और महमूद के मुकाबले कम समय की भूमिका में अलग से चमक जाएँ तो किशोर कुमार ने निस्संदेह पड़ोसन में कुछ अद्भुत करतब दिखाए होंगे|

फ़िल्म का नायक भोला (सुनील दत्त) ही विद्यापति (किशोर कुमार) को गुरु नहीं कहता बल्कि वे अभिनय में भी फ़िल्म में सभी के गुरु ही नज़र आते हैं| जो भाव भंगिमाएं किशोर कुमार ने फ़िल्म में अपनाई हैं वे कोई लेखक उन्हें लिखकर नहीं दे सकता और न कोई निर्देशक ही उन्हें बता सकता है कि ऐसे करो वैसे करो| यह तो किशोर कुमार की अपने ही उन्मुक्त अंदाज़ का कमाल था कि फ़िल्म में वे धुरी बन गए और बाकी चरित्र भी स्वतः ही उन्हें हास्य रचने में समर्थन देने लगे|

उन दिनों महमूद की तूती बोलती थी परदे पर हास्य रचने में| वे अपनी अन्य फिल्मों से अलग एक दक्षिण भारतीय संगीतकार के चरित्र में अभिनय कर रहे थे, उनके दृश्य बेहद नाटकीय थे|

नायिका के पिता (आगा) के पास – जब जब जो जो होना है, तब तब सो सो होता है, जैसे संवाद थे जिन्हें वे गाहे बगाहे दुहराते रहते हैं|

ओम प्रकाश के पास भी अन्य चुटीले संवादों के अतिरिक्त एक तकिया कलाम भी था – हम भी अजीब हैं|

किशोर कुमार जिस फ्रेम से फ़िल्म में अवतरित होते हैं उसी से छा जाते हैं| वे किस उच्च स्तर पर अभिनय कर रहे थे वहीं से पता चलना आरम्भ हो जाता है जब वे अपनी नाटक मंडलीद्वारा लैला मजनू नाटक की रिहर्सल करते समय केश्टो मुखर्जी से कैस कहलवाने का प्रयास करते हैं और इस साधारण से दृश्य में अपनी भाव भंगिमाओं की आहुति से एक अलग ही जान डाल देते हैं|

भोला जब पहली बार नायिका के दर्शन अपने गुरु और उनकी नाटक मंडली को करवाता है और बाकी नायिका की तारीफ़ करते हैं लेकिन गुरुदेव शांत खड़े रहते हैं तो भोला को लगता है कि नायिका के गुस्सैल बर्ताव को देख गुरु को लडकी पसंद नहीं आयी| मायूसी से वह पूछता है,” गुरु तुम्हें पसंद नहीं आई”|

पहली बार फ़िल्म देख रहे दर्शक को किशोर कुमार के अंदाज़ से कोई अनुमान नहीं लगेगा कि वे क्या और कैसे प्रतिक्रिया देने वाले हैं|

नायिका की खिड़की की ओर ताक रहे विद्यापति जी सस्पेंस बना कर गुर्राकर बोलना शुरू करते हैं, “भोले, चीज तो तूने वो ढूंढी है, कि अगर अकेली फ्रंट पर चली जाए तो दुश्मन हथियार डाल दे“| जिस आवाज़ और अंदाज़ में वे इस संवाद की समाप्ति करते हैं वही परदे पर श्रेष्ठ हास्य रचता है|

यह संवाद फ़िल्म – मुग़ल-ए-आज़म में शहजादे सलीम (दिलीप कुमार) द्वारा बोले गए एक प्रसिद्द संवाद की पैरोडी जैसा है|

नायिका के घर में नृत्य और संगीत शिक्षक को देख किशोर कुमार कुछ बोलते नहीं वरन इशारों से नायक से पूछते हैं ये कौन साहब हैं?

नायिका की अपने संगीत एवं नृत्य शिक्षक संग नजदीकी को देख, नायक निराश होता है और उसके साथी उसे और हतोत्साहित करते हैं लेकिन गुरुदेव डंके की चोट पर एलान कर देते हैं कि क्या हम एक नचनिये से हार मान लेंगे?

वे जंग का एलान कर देते हैं और भोला को लड़ने की शक्ति देते हैं|

फ़िल्म में किशोर कुमार के अभिनय प्रदर्शन का चमत्कार अपने चरम पर पहुँचता है जब नायक नायिका के मध्य प्रेम स्थापित करने के बाद नायिका अपनी सखियों को अपने घर बुला लेती है और भोले से गीत गाने के लिए कहती है और विद्यापति, नायक के लिए प्लेबैक सिंगिंग करते हैं| नायिका की एक सखी अनुराधा विद्यापति को जानती पहचानती है और वह भोला के करे में विद्यापति की एक झलक देख कर भोला के गायन पर संदेह प्रकट करते हुए नायिका को लेकर चुपचाप भोला के घर आ जाती है|

इस समय का दृश्य पूरी फ़िल्म पर भारी है| भोला तो देख लेता है कि नायिका अपनी सखी के साथ कमरे में उसके सामने खडी है, लेकिन विद्यापति तो आँखें बंद करे गीत गाने में मगन हैं और जब नायक जबरदस्ती उनकी तन्द्रा भंग करता है उसके बाद विद्यापति की स्थिति, परिस्थिति, उसके हाव भाव में किशोर कुमार नामक अभिनेता का अभिनय प्रदर्शन जो आनंद दर्शक के सामने लाता है वैसा चार्ली चैपलीन की फिल्मों के द्वारा या टॉम एंड जेरी की कार्टून फिल्मों के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है|

कहीं छिपने में नाकाम होने और भोले द्वारा स्वंय को उनके पीछे छिपा लेने के बाद खिसियाकर विवशता में जब वे बोलते हैं – अनुराधा! तो हास्य अभिनय आसमान में बहुत ऊँचे उड़ने लगता है|

किशोर कुमार ने बहुत से दृश्यों में ऐसा हास्य अभिनय किया है कि उनकी भाव भंगिमाओं और संवाद अदायगी के जौहर पर ही एक पुस्तक अभिनेताओं को हास्य अभिनय सिखाने के लिए बन जाए|

पड़ोसन को इसके बहुत से गुणों के कारण जीवन में बार बार देखा जा सकता है लेकिन कई बार इसे सिर्फ किशोर कुमार के श्रेष्ठ अभिनय के लिए भी देखा जाना चाहिए| तब फ़िल्म हास्य अभिनय की कई परतें खोलना शुरू करती है|

यह किशोर कुमार के अभिनय का ही चमत्कार है कि दर्शक के अन्दर महमूद के चरित्र से सहानुभूति उमड़ ही नहीं पाती, एक अंतिम दृश्य को छोड़कर जहाँ वे शहनाई पर अमीरबाई कर्नाटकी द्वारा गाया और नौशाद द्वारा संगीतबद्ध गीत – मिल के बिछड़ गयी अँखियाँ, की धुन बजाते हैं|

…[राकेश]


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