श्याम बेनेगल की फ़िल्म – Welcome To Sajjanpur (2008) मात्र एक कॉमेडी फ़िल्म न होकर सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य है और एक अच्छे व्यंग्य की तरह सामाजिक विसंगतियों पर हास्य-व्यंग्य के माध्यम से चुटीली चोट करती है|

इस फ़िल्म में कथा-पटकथा लेखक अशोक मिश्रा की लेखनी अपने पूरे शबाब पर है और श्याम बेनेगल भी सिनेमा के इस क्षेत्र में अपनी पूर्ण पकड़ को सिद्ध करते हैं|

अगर दर्शक के पास साहित्य में हरी शंकर परसाई जैसे उच्च कोटि के व्यंग्यकारों की लेखनी को पढ़ पाने, आर.के लक्ष्मण जैसे सुपर स्टार कार्टूनिस्ट के कार्टूनों से उनके पूरे अर्थ सहित गुज़र जाने का अनुभव और समाज में चारों ओर घट रही बातों और उनसे भी पहले जो घट चुका है उसकी जानकारी से गुजरने का अनुभव है तो वह इस फ़िल्म का सम्पूर्ण आनंद ले सकता है या एक सामान्य दर्शक जो इसे एक सामान्य हास्य फ़िल्म समझ कर देखेगा और सराहेगा उससे कहीं ज्यादा इसका आनंद ले पायेगा| यह बॉलीवुड से प्रदर्शित होने वाली स्लैप स्टिक कॉमेडी फ़िल्म नहीं है| इसमें हास्य का स्तर थोडा अलग सा है|

इसमें बेरोजगारी है, पर अच्छे जीवन के सपने हैं, युवा प्रेम के कई रूप हैं, जहां आदर्शवादी प्रेम भी पल्लवित होता है| अपनी युवा विधवा बहु के पुनर्विवाह के लिए क्षण में राजी रिटायर्ड फौजी की आँख से टपके आंसू हैं तो एक किन्नर का चुनाव में एक बाहुबली को आँख में आँख डालकर चुनौती देकर उसे मुकाबले में हरा देना भी है| यहाँ अपशकुन टालने के लिए एक युवती के असल विवाह से पहले एक कुत्ते से विवाह की रसम पूरा करने का अंधविश्वास भी है तो बचपन से कुछ समय साथ पढी लेकिन कालान्तर में विवाहित हो गयी युवती के प्रति मूक प्रेम से भरा हुआ नायक भी है जो इस बात से ही गदगद रहता है कि वह उसके पास चिट्ठी लिखाने आती हैऔर वह कुछ पल उसके साथ बिता पाता है|

चाय की दूकान पर देश की राजनीती फिक्स कर देने वाले लोगों की भीड़ है तो ऊपर से लंपट दिखाई देता हुआ एक विधवा मरीज स्त्री के प्रेम में पड़ा हुआ कम्पाउडर भी है जो अनपढ़ लोगों के लिए डॉक्टर बन जाता है|

शांतनु मोइत्रा के संगीतबद्ध गीत ऐसे हैं कि प्रेम गीत दर्शक को प्रेम के झूले पर झुलाने ऊपर आसमान की ओर ले जाये और फिर वहां से नीचे आते हुए नाभि केंद्र में गुरुत्व बल के कारण उठती गुदगुदी को महसूस करा दें, भीड़ के साथ सामूहिक कोरस गीत ऐसे कि उत्सव का उल्लास भर दें, और सामाजिक क्रान्ति के ऐसे राजनीतिक अर्थों वाले गीत जो सुनने देखने वाले को वीर रस और देश में सुधार लेन की भावनाओं से भर दे|

किन्नर की भूमिकाएं तो बहुत सी हास्य और संजीदा फिल्मों में दिखाई देती रही हैं लेकिन जिस तरह का चरित्र यहाँ मुन्नी (रवि झंकाल) का चरित्र गढ़ा गया है ऐसा कभी सिनेमा के परदे पर नहीं आया था, और इसके बाद भी नहीं आया| यह आश्चर्य की बता न होगी अगर अब तक इस फ़िल्म से अनजान दर्शक इसे आज की तारीख में देखे तब भी वह फ़िल्मी चुनाव में मुन्नी की तरफ से प्रचार करेगा उसे ही जितायेगा, उसके संवादों पर तालियाँ बजाएगा, उसके चुबहने वाले संवादों में छिपे दर्द से स्तब्ध रह जाएगा|

इला अरुण की अभिनय कला को परदे पर असामान्य गीतों को प्रस्तुत करने में ही हिन्दी सिनेमा के निर्देशकों ने उपयोग में लिया है, एक श्याम बेनेगल हैं जिन्होंने हमेशा इला अरुण की अभिनय कला का सदुपयोग करके उन्हें सार्थक भूमिकाएं दी हैं, औअर यहाँ उनकी भूमिका के कारण परदे पर जो हास्य उभरता है वह गज़ब का है|

श्रेयस तलपडे के पास इकबाल जैसी फ़िल्म रही है और बहुत सी बहुसितारा हास्य फिल्मों में वे आये हैं लेकिन यहाँ महादेव की भूमिका में वे अपने फिल्मी जीवन की सर्वश्रेष्ठ भूमिका पाते हैं और उसका लाभ उठाते हैं, बस समस्या यही है कि उनके इर्द गिर्द यशपाल शर्मारवि झंकालइला अरुणललित मोहन तिवारीराजेश्वरीअमृता रावदिव्या दत्ता और रवि किशन तथा छोटी भूमिकाओं में वल्लभ व्यासरजित कपूर, और दया शंकर पांडे आदि इतने अच्छे अभिनय प्रदर्शन कर गए हैं कि वह अलग से नहीं चमकते बल्कि इन सब सितारों के बीच स्तरीय उपस्थिति बनाए रखते हैं|

दया शंकर पांडे इतने ज्यादा सच्चे लगते हैं कि पहचानना मुश्किल है कि वे अभिनेता हैं भूमिका वाले पुरुष नहीं| उनसे जो डायलेक्ट बुलवाया गया है और जैसे हाव भाव उन्होंने अपनाए हैं, उससे एकबारगी एहसास ही नहीं होता कि यही अभिनेता स्वदेस में भी था, धर्म में भी था| ऐसा ही लगता है कि किसी असली सपेरे को पकड कर कैमरे के सामने बिठा दिया गया है|

अंत में फ़िल्म सच और मिथक का ऐसा घालमेल करती है कि दर्शक चौंक सा जाता है और सोचता ही रह जता है कि जो पहले देखा वह सही रहता या जो अब बताया जा रहा है वह आश्वस्त करने वाला है?

श्याम बेनेगल और अशोक मिश्रा की इस हास्यशाळा का भ्रमण न केवल हंसने का अवसर ही देता है मिलेगा बल्कि दर्शक की भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य की समझ में थोड़ी वृद्धि भी करता है|

सामाजिक-राजनीतिक हास्य-व्यंग्य फ़िल्में ऐसी ही और इसी स्तर की होने चाहिए|

…[राकेश]


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