दो तरह के प्रेम (निजी प्रेम और देश प्रेम) के मध्य संघर्ष इस फ़िल्म के बुनियादी तत्वों में से एक है| प्रेम, देशप्रेम, और स्वतंत्रता आन्दोलन का संघर्ष की पृष्ठभूमि में देशप्रेम जब आहुति माँगता हो तो व्यक्तिगत प्रेम एक व्यसन की तरह लग सकता है|
भगत सिंह ने देश की खातिर अपने व्यक्तिगत प्रेम को तिनके बराबर भी सामने नहीं आने दिया| मात्र 24 साल की उम्र से भी पहले वह रणबांकुरा फांसी के फंदे को खुद अपनी गर्दन में डालकर इस जगत से भौतिक रूप से विदा हो गया इस आशा में कि कभी उसका प्रिय देश अंगरेजी राज से स्वतंत्रता पा लेगा| कभी उसके सपनों का देश, भूमि का यह खंड बन जाएगा|
सन 1942 के दौर में जब चारों ओर नारे गूँज रहे हों,
अंग्रेजों, भारत छोडो,
करेंगे या मरेंगे,
तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा
ऐसे में चारों ओर व्याप्त उत्तेजना के बीच वैयक्तिक प्रेम को सही परिपेक्ष्य में देख पाना मुश्किल हो सकता है|
स्वतंत्रता संघर्ष की पृष्ठभूमि में दो युवा प्रेमियों की प्रेम कहानी पर आधारित फ़िल्म प्रदर्शित हुयी तो पत्रकारों ने फ़िल्म देखने गए अटल बिहारी वाजपेयी से पूछा था कि उन्हें फ़िल्म कैसी लगी और क्या स्वतंत्रता आन्दोलन के ऐसे दौर में ऐसे प्रेम फले फूले होंगे?
अटल जी ने हँसते हुए जवाब दिया था कि यह तो फ़िल्म है, उस दौर में किसे इतनी फुर्सत थी कि प्रेम में उलझे| फ़िल्म जब प्रदर्शित हुयी तब केंद्र में पी.वी. नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी| विदेश सेवा की नौकरी छोड़ कर कांग्रेस से जुड़े और नए-नए संसद सदस्य बने मणि शंकर अय्यर ने फ़िल्म की आलोचना करते हुए अखबारों में लेख लिखे थे वे इस बात से बेहद नाराज़ थे कि विधु विनोद चोपड़ा और बिनोद प्रधान का कैमरा, क्लोज़-अप में मनीषा कोइराला के शारीरिक गठन और सौंदर्य की नुमाइश करता रहा और स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि का दुरूपयोग निर्देशक ने ऐसी व्यर्थ की बातों को दिखाने में किया| यह और बात है कि अपने लेख में वे स्वयं भी शारीरिक सुन्दरता के नाम ऐसे शब्द विशेष उपयोग में लाते रहे जिनकी आवश्यकता न थी|
तब मणि शंकर अय्यर और कुछ फ़िल्मी समीक्षकों को शायद इस तथ्य की जानकारी नहीं थी कि यह फ़िल्म बहुत हद तक सन 1948 में रमेश सहगल द्वारा निर्देशित फ़िल्म – शहीद की रीमेक थी| शहीद में नायक की भूमिका दिलीप कुमार ने, नायिका की भूमिका कामिनी कौशल और नायक के अंग्रेजपरस्त पिता की भूमिका चंद्रमोहन ने निभाई थी|
बहरहाल, फ़िल्म 1942 ए लव स्टोरी में आम भारतीय हैं जो कि उपरोक्त नारों से प्रेरित जीवन के एक-एक पल को अंग्रेजों के आतंकी और असमानता के राज के चंगुल से देश को छुडाने के प्रयास के यज्ञ में होम कर रहे हैं, उन्हें सिर्फ आज के इसी पल का पता रहता है, कब अंगरेजी गोली उनके सीने के पार निकल जायेगी, उन्हें नहीं पता| उन्हें भली भांति पता है कि अंगरेजी राज बहरा है उसे केवल नारों की आवाज़ सुनाई नहीं देती और उसके कान की सफाई के लिए धमाका जरुरी है|
जगह-जगह स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों से संघर्ष में अपनी मुक्ति खोज रहे हैं, वहीं फ़िल्म के नायक वीरेन्द्र सिंह (अनिल कपूर)| का मन अटक गया है, एक लडकी राजेश्वरी (मनीषा कोइराला) की ख़ूबसूरती में …
एक लडकी को देखा तो ऐसा लगा जैसे …
और इस जैसे शब्द को अन्य शब्दों से पूर्ण कर देने के लिए उसके पास सैंकड़ों काव्यात्मक तुलनाएं हैं|
वीरेन्द्र सिंह (अनिल कपूर) अपने निजी प्रेम की खातिर देश प्रेम से भरे पड़े, अपनी प्रेमिका, नायिका – राजेश्वरी (मनीषा कोइराला) के पिता पाठक जी (अनुपम खेर) से कहता या पूछता है – आपका देशप्रेम प्रेम, और हमारा प्रेम कुछ भी नहीं?
वैयक्तिक-प्रेम और देश-प्रेम के बीच निरंतर संघर्ष को सिनेमाई तरीके से दिखाने की तकनीकी दक्षता जैसी विधु विनोद चोपड़ा और उनके सिनेमेटोग्राफर बिनोद प्रधान एक दृश्य में दिखाते हैं वैसे उदाहरण हिन्दी सिनेमा में कम देखने को मिलते हैं| सिनेमा के अध्येताओं के लिए इस विशेष दृश्य को देखने, समझने और फिर इस फ़िल्म के बेहद विशाल फलक को सराहने का अवसर आता ही है|
जनरल डायर जैसा एक जनरल डगलस फ़िल्म में है| कसौली में उसे अल्पकालिक दौरे के लिए आना है और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह एक सुनहरा अवसर है, उस पर घात करने का| वहां उनका एक छिपा हुआ अस्तित्व बन चुका है जो चुपके चुपके गतिविधियों को अंजाम देता रहता है|
अपनी बेटी से भी सत्य छिपाकर अपने असली लक्ष्य की पूर्ती करने के लिए स्वतंत्रता संघर्ष कर रहे एक अध्यापक पाठक जी (अनुपम खेर) उसे लेकर अपनी बीमारी ठीक करने के लिए पहाड़ों पर जाकर रहने के बहाने से कसौली पहुँच जाते हैं|
उनका अपना बेटा (आशीष विद्यार्थी) और बेटे से भी प्रिय शिष्य, शुभांकर (जैकी श्रॉफ) जनरल डगलस के वहां पहुँचने से एक दो दिन पहले ही पहुंचेंगे जिससे अंगरेजी सैन्य बल को किसी प्रकार का शक न हो| लगभग फूल प्रूफ योजना है लेकिन जीवन ऐसे नहीं चलता!
जैसे देश भर में अंग्रेजों के मित्र, रईस और रसूख वाले लोग, जिनमें से बहुतेरे राय बहादुर जैसे खिताबों से नवाजे जाते थे, रहते थे, वैसे ही कसौली में भी रहते हैं एक राय बहादुर (मनोहर सिंह) जिनके लिए स्वामिभक्ति का अर्थ अंग्रेजों की इच्छापूर्ती करने का कर्तव्य निभाना है| ऐसे रईस खानदान के इकलौते कुंवर साहिब हैं, जिन्होंने बचपन से दुख, कष्ट, संघर्ष, विपरीत परिस्थिति का क ख ग भी न देखा न जाना| उनके लिए जीवन मस्त है|
देश प्रेम भी फ़ैल रहा हो और दो युवाओं का निजी प्रेम भी पल्लवित होने लगा हो और तभी कुछ विस्फोट हो जाएँ और नायिका गायब तो प्रेम में डूबा नायक, जिसने प्रेम के संसार के आनंद में सराबोर होना बस शुरू ही किया था, वह क्या करेगा? रमता जोगी बना अपनी प्रेमिका की याद में भटकेगा?
फिल्म में किसी चरित्र का बस नाम ही मध्यांतर तक आता रहता हो और यकायक जब उसका प्रवेश फ़िल्म में हो तो रोंगटे खड़ा होना क्या होता है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण दर्शक महसूस कर सकता है|
जिस भावनात्मक कष्ट से दर्शक गुज़रा रहा होता है उसमें से एक में उसे सांत्वना मिलती है लेकिन एक नई भावनात्मक परेशानी उसके सामने आ खडी होती है| इस नए चरित्र की भावनाएं भी तो भावनाएं हैं न! उनके साथ भी उन्हीं ही चलना है|
फ़िल्म दर्शकों को बहुत सारे मानसिक और भावनात्मक द्वंदों में फंसाती आगे चलती रहती है|
किसी फ़िल्म के क्लाइमेक्स को फिल्माने में भारतीय सिनेमा के नौ नामचीन फ़िल्म निर्देशकों की सिनेमाई सलाह काम आयी हो तो उस फ़िल्म के बनाने में कितनी मेहनत की गई होगी और कितनी निष्ठा से इसका निर्माण किया गया होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है| यह आवश्यक नहीं कि नौ निर्देशक मिलकर एक महान अंत दे ही दें फ़िल्म कोऔर यह खिचडी संस्करण भी लग सकता है लेकिन बात सामूहिक प्रयास की है और एक निर्देशक की अपनी फिल्म को अद्भुत बनाने की चेष्टा की है अन्यथा फ़िल्म निर्देशक अपनी फिल्मों में किसी प्रकार की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करते|
हैंग हिम !
गंजी खोपड़ी वाला जनरल डगलस जब बोलता है और कैमरा एक ऊँची मीनार रुपी इमारत के शीर्ष से कुछ नीचे पर लकड़ी की आयताकार बल्लियाँ गिराकर फांसी देने का प्लेटफ़ॉर्म तैयार करते दिखाता है और पार्श्व में करेंगे या मरेंगे की सामूहिक ध्वनियाँ गूंजने लगती हैं तो दर्शक “अंग्रेजों, भारत छोडो” आन्दोलन के काल में ट्रांसपोर्ट हो जाता है|
कमर पर हाथ बांधे हुए अनिल कपूर के चरित्र को जब अंग्रेज सिपाही मीनार में सीढ़ियों से ऊपर ले जाते हैं तो मनोहर सिंह का चरित्र उससे विवशता, लाचारी, क्रोध और कुंठा में पूछते हैं,” अभी भी वक्त है वीरेन्द्र सिंह, उन सब देशद्रोहियों के नाम बता दो, जनरल डगलस तुम्हें माफ़ कर देंगे|”
गर्व से सर उंचा किये अनिल कपूर कहते हैं,” मैं तो सिर्फ एक देशद्रोही को जानता हूँ, और वो आप हैं बाबू जी“|
एक और जगह अनिल कपूर के चरित्र का बचपन का सखा और उसका ड्राईवर (रघुबीर यादव) उससे कहता है कि अगर मेरे सामने जनरल डगलस आ जाए तो उसके मुंह पर थूक दूं|
वीरेन्द्र सिंह हंसी में टाल देता है, उसकी बात लेकिन जब क्लाइमेक्स में ऐसा वास्तव में होता है तो दर्शक भूल जाते हैं कि यह महज फ़िल्म है, जब प्रदर्शित हुयी तब के दर्शकों से पूछिए कितनी तालियाँ सिनेमाघरों में इस एक कृत्य पर, और ऐसे अन्य दृश्यों पर बजीं और कितने गाल कितनी बार आंसुओं से भीग गए| सिनेमा बेहद शक्तिशाली माध्यम है और दर्शक को अपने बहाव में बहा ले जाता है और कुछ देर के लिए सच और मिथ्या के अंतर को मिटा डालता है|
स्वतंत्रता सेनानियों की भीड़ के बीच भिश्ती (शिव सुब्रमणियम, जिन्होंने फ़िल्म में संवाद और पटकथा लेखन भी किया) पानी के बदले अपनी मश्क में घी भरकर उसे सीढ़ियों पर बिछे लाल कालीन पर डालता है तो आगे क्या होगा उसकी कल्पना ही दर्शक को उत्तेजना से भर देती है?
कहा जाता है कि इसके गीतों का फिल्मांकन तब विनोद चोपड़ा के सहायक रहे संजय लीला भंसाली ने किया था| गगन चुम्बी परदे, और हवा में उड़ते रंग बिरंगे दुपट्टे, अलग अलग रंगों से भरे आकाश के फ्रेम्स, सिनेमा के परदे पर कैसा गज़ब समां बांधते हैं|
आर डी बर्मन की अंतिम फ़िल्म के गीतों को एक लाजवाब खूबसूरत दृश्य संयोजन इस फिल्म में मिलता है| हरेक गीत एक अलग ही संसार रचता है|
फ़िल्म के प्रेम गीतों से अलग जब हेमंत कुमार जैसी गायिकी में शिबाजी चटर्जी की गायिकी में “ये सफ़र बहुत है कठिन मगर न उदास हो मेरे हमसफ़र” परदे पर आता है तो फ़िल्म एक अलग संसार में दर्शक को ले जाती है|
जैकी श्रौफ़, मनीषा कोइराला, अनिल कपूर, रघुबीर यादव, मनोहर सिंह, सुषमा सेठ, डैनी, प्राण साहब, अनुपम खेर, गोपी देसाई, ब्रायन ग्लोवर और लगभग एक ही झलक में दिखाए गए आशीष विद्यार्थी सभी फ़िल्म देखने के बाद लम्बे अरसे तक दर्शक के जेहन में किसी न किसी दृश्य के माध्यम से जीवित रहते हैं|
फ़िल्में अपने निर्माण और प्रदर्शित होने के काल से भी एक गहरा संबंध रखती हैं| एक तो वीसीआर का लगातार बढ़ता चलन और दूसरे बनने वाली फिल्मों की औसत गुणवत्ता, इन दोनों तत्वों की वजह से अस्सी के दशक के अंत से ही सिनेमाघरों से पारिवारिक दर्शक धीरे धीरे गायब होते चले गए| फ़िल्म : 1942 – A Love Story की महत्ता इस लिए भी है कि यह इतनी खूबसूरत फ़िल्म लोगों को लगी कि इसके विशाल फलक को बड़े परदे पर देखने के लिए पारिवारिक दर्शक वापिस सिनेमाघरों में खिंचते चले गए|
फ़िल्म का पोस्टर ही बेहद आकर्षक था, एक पहाडी की दो चोटियों पर फ़िल्म के चरित्रों के मूर्तियां उभर आने जैसे चेहरे!
गीतों के साथ ही फ़िल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक भी शानदार है|
फ़िल्म देखने के बहुत बाद तक दर्शक के कानों में
तु रु न तु रु न की संगीतमयी ध्वनि गूंजती रहती है|
…[राकेश]
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