सिनेमा परदे पर मायाजाल रचता है और दर्शक उसमें जानबूझ कर फंसते हैं| कई बार मायाजाल भी झूठे चित्रों से रचा जाता है जिसके बारे में अक्सर दर्शकों को पता नहीं चलता| स्टंट सीन्स में तो जानकार मानकर ही चलते हैं कि लॉन्ग शॉट्स में एक्टर्स के डुप्लीकेट या बॉडी डबल ने हरकतें की हैं और केवल क्लोज अप शॉट्स में ही असली अभिनेता का चेहरा सामने आता है|

पाकीज़ा के बनाने में लगभग डेढ़ दशक लम्बा समय लगा| पहले यह श्वेत एवं श्याम फ़िल्म पर बननी शुरू हुयी थी, फिर रंगीन फ़िल्म आ गयी भारत में तो कमाल अमारोही ने इसे रंगीन में बनाना शुरू किया और इसकी स्टार कास्ट भी बदल गयी| फिर मीना कुमारी संग उनकी वैवाहिक अदावत हो गयी तो शूटिंग रुक गयी, बरसों बाद फिर से बननी शुरू हुयी तो तब तक मीना कुमारी गंभीर रूप से बीमार पड़ चुकी थीं| नृत्य आदि के सीन मीना कुमारी के बदले पद्मा खन्ना पर फिल्माए गए| केवल क्लोज अप्स में मीना कुमारी को दिखाया गया था| फ़िल्म को बारीकी से देखा जाये तो केवल नृत्य दृश्यों में ही नहीं बल्कि अन्य जगहों पर भी मीना कुमारी के लिए अन्य स्त्री कलाकार की उपस्थिति का इस्तेमाल किया गया|

जैसे पाकीज़ा का ही नहीं हिन्दुस्तानी सिनेमा के एक सबसे चर्चित संवाद [ मुआफ कीजियेगा, इतेफाकन आपके कंपार्टमेंट में चला आया, आपके पाँव देखे, बहुत हसीं हैं, इन्हें ज़मीं पर मत उतारियेगा, मैले हो जायेंगे] वाले बरसाती रात के दृश्यों के सीक्वेंस में ट्रेन की बोगी में बर्थ पर सोती हुयी मोहतरमा क्या मीना कुमारी ही हैं?

जबकि सुबह के उजाले में जो स्त्री सोकर उठती है वह तो मीना कुमारी हैं हीं|

दोनों के चेहरे की चमक, कसावट में आँखों में, और स्वास्थ्य में बहुत अंतर है|

पर सिनेमा की यही ताकत है कि भ्रम के बावजूद भावनाओं में यह दर्शकों को ऐसे बहा ले जाता है कि इन सब बातों पर मुश्किल से ही आम दर्शक का ध्यान जाता है|

पाकीज़ा के निर्देशक कमाल अमरोही और उनके सिनेमेटोग्राफर Joseph Wirsching ने कमाल की दक्षता से फ़िल्म में डुप्लीकेट कलाकारों से मीना कुमारी के बदले काम लिया है|

….[राकेश]


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