नेता और अभिनेता में अंतर होता है और कैमरे के सामने तो यह अंतर बहुत ज्यादा स्पष्ट हो जाता है| हाल में श्री संदीप दीक्षित ने श्री राहुल गांधी के साथ एक पॉडकास्ट किया| संदीप दीक्षित दिल्ली की लम्बे समय तक मुख्यमंत्री रह चुकीं श्रीमति शीला दीक्षित के सुपुत्र हैं और स्वंय भी सांसद रह चुके हैं| संदीप दीक्षित के दादा श्री उमा शंकर दीक्षित कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और पंडित नेहरु और इंदिरा गांधी, दोनों के करीबी रहे| वे केंद्र में मंत्री भी बने और बाद में कुछ राज्यों के राज्यपाल भी रहे| संदीप दीक्षित के पिता श्री विनोद दीक्षित संभवतः सिविल सर्वेंट थे| कुल मिलाकर संदीप दीक्षित ऐसे परिवार से आते हैं जो आज़ादी से पहले से ही कांग्रेस से और नेहरुगांधी परिवार से जुड़ा रहा है| संदीप दीक्षित और राहुल गांधी की उम्र में भी 6-7 साल से ज्यादा का अंतर नहीं होगा और उम्र में इतने कम अंतर वाले अक्सर गहरे मित्र न भी हों दोस्ताना संबंध वाले अवश्य हो जाते हैं| लेकिन पॉडकास्ट में राहुल गांधी और संदीप दीक्षित के मध्य एक स्वाभाविक सहजता का अभाव दिखाई देता है| दोस्ताना गर्मजोशी का अभाव तो स्पष्ट ही दिखाई देता है| दोनों में से कोई भी खुल कर बोलता हुआ दिखाई नहीं दिया|

बहरहाल पॉडकास्ट के शुरू में ही बड़ी रोचक बात सामने आ जाती है| संदीप दीक्षित पूछते हैं कि परिवार में राहुल गांधी का परिचय पंडित नेहरु से कैसे हुआ, उनकी दादी के माध्यम से या पिता के द्वारा?

राहुल गांधी कहते हैं कि किसी ने पहली बार यह बात मुझसे पूछी है| आगे बताते हुए राहुल गांधी बचपन में दादी इंदिरा जी के साथ की गयी एक कश्मीर यात्रा की बात कहते हुए पंडित नेहरु के जीवन की एक घटना का जिक्र करते हैं, जो इंदिरा जी ने उन्हें बतायी कि कैसे पंडित जी एक बार मरते मरते बचे जब वे हिमालय में ट्रेकिंग के दौरान एक ग्लेशियर में गिर/धंस गए थे और संदीप दीक्षित इस रहस्योद्घाटन पर आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछते हैं कि यह कब हुआ पंडित नेहरु के पीएम बनने से पहले या बाद में| जिस पर राहुल गांधी जवाब देते हैं कि नहीं बहुत पहले|

हिंदुस्तान का बच्चा-बच्चा जिसने स्कूली शिक्षा प्राप्त की है पंडित नेहरु से सम्बंधित इस घटना को जानता है क्योंकि यह पांचवीं कक्षा से पहले ही कोर्स में बच्चों को पढ़ाई जाती रही है| भारतीय राजनीति में तनिक भी रूचि रखने वाले भारतीय के लिए स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े इतिहास और उसमें सम्मिलित नेताओं की लिखी किताबें पढ़ना आवश्यक बात रही है| और पंडित नेहरु जैसे शानदार लेखक की आत्मकथा तो साहित्य के अध्येता भी पढ़ते रहे हैं| संदीप दीक्षित, जो सिद्ध रूप से एक कांग्रेसी परिवार के सदस्य रहे हैं, और इसी नाते सांसद बन सके हैं, उन्होंने पंडित नेहरु की आत्मकथा मेरी कहानी (My Story) पढ़ी नहीं है यह बड़े आश्चर्य की बात है| पंडित नेहरू ने अपनी आत्मकथा में विस्तार से इस ग्लेशियर वाली घटना का वर्णन किया है और एक पूरा अध्याय इस अनुभव को समर्पित किया है| पुस्तक के शुरू में ही यह अध्याय है|

पंडित नेहरु के विवाह वाले वर्ष 1916 की घटना है जब वे अपने परिवार के कई सदस्यों के साथ गर्मियों का अवकाश मनाने कश्मीर गए थे और उन सबको श्रीनगर में छोड़ अपने एक चचेरे भाई के साथ कई महीने पर्वतों में घूमते रहे| जोजी-ला घाटी से आगे अमरनाथ के गुफा से कुछ ही मील पहले यह हादसा हुआ था| यहीं पंडित नेहरु तभी होकर निबटी बर्फबारी के कारण बर्फ से ढकी एक बड़ी दरार को न देख पाए और नर्म बर्फ पर पैर रखते ही दरार में गिर गए| सौभाग्य से उनके हाथ से रस्सी न छूटी और वे तुरंत ही ऊपर खींच लिए गए|

इसमें मुद्दे की बात यही है कि एक घोर कांग्रेसी परिवार का सदस्य, जो कांग्रेस पार्टी की ओर से संसद सदस्य भी रहा, अगर उन्होंने भी पंडित नेहरु की आत्मकथा नहीं पढ़ी है तो राहुल गांधी किस तरह से कांग्रेस के बड़े नेताओं के जीवन से अनजान कांग्रेसी नेताओं के बलबूते कांग्रेस को मजबूत बनाना चाह रहे हैं?

संदीप दीक्षित ने पॉडकास्ट के शुरू में नेहरु सेंटर में राहुल गांधी का स्वागत किया, और जिस कक्ष में पॉडकास्ट संपन्न हुआ वहां सलीके से सजी पुस्तकों से भरी हुयी बड़ी बड़ी अलमारियां उनके पीछे दिखाई दे रही हैं, चूंकि कैमरा कक्ष के चारों ओर का द्रश्य नहीं दिखता लेकिन ऐसा अनुमान अवश्य लगता है कि कक्ष में चारों ओर किताबों की अलमारियां हो सकती हैं| नेहरु सेंटर में इतनी किताबों में पंडित नेहरु की माई स्टोरी और डिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया जैसी प्रसिद्द किताबें न होंगी ऐसा मानना बहुत मुश्किल है|

आश्चर्य यह भी है कि राहुल गांधी भी एक बार भी इस किस्से को सुनाते हुए नेहरु जी की आत्मकथा का जिक्र नहीं करते और संदीप दीक्षित को नहीं सुझाते कि आप इस घटना को विस्तार से वहां भी पढ़ सकते हैं|

कांग्रेस में कम से यह परंपरा तो बनी रहे कि सभी नेता कम से कम महात्मा गांधी, पंडित नेहरु, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, लोकमान्य तिलक, और अन्य नेताओं पर और उनके द्वारा लिखी गयी किताबें पढ़ लें| कांग्रेसी परिवारों के दो नेताओं द्वारा पंडित नेहरु पर बात करते हुए उनके लिखे साहित्य की चर्चा न छेड़ना दुखद है|


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