pursuit of happiness-001सिनेमा विचित्र लगने वाले क्षेत्रों में भी अतिक्रमण कर चुका है पर अभी भी मानवीय भावनाओं को सिनेमा से अलग किया जाना संभव नहीं| रोबोट, एलियन, वैम्पायर और जोम्बिस पर आधारित फिल्मों की भीड़ में अभी भी फ़िल्में बनती हैं जो मूलतः मनुष्य और उसकी भावनाओं को उसी रूप में प्रतिनिधित्व देती हैं जैसे कि वे हैं|

सिनेमा के परदे पर इंसानी चरित्रों के साथ दर्शक हँसते हैं, रोते हैं, और दर्शक को अपने बहाव के साथ बहा ले जाने में ही ऐसी फिल्मों की सफलता बसी होती है| यदि सिनेमा ईमानदारी से इंसानी भावनाओं को दर्शा पाता है तो यह दर्शक के ह्रदय से एक गहरा रिश्ता कायम करने में सफलता प्राप्त कर लेता है|

The Pursuit of Happiness’ भी एक ऐसी ही फिल्म है जो कि इंसानी भावनाओं को बखूबी दर्शाती है और एक ऐसे आम इंसान Chris Gardner (Will Smith) के जीवन के ऐसे संघर्षपूर्ण दौर को दिखाता है जबकि उसका जीवन विनाश के कगार पर खड़ा है और एक कदम उस तरफ और वह नष्ट हो जाने वाला है और अपने जीवन के बिखरे हुए तिनकों को चुन कर एकत्रित करने के सारे प्रयास नाकाम होते जाते हैं और वह घनघोर निराशाओं में डूब जाता है|

 

ऐसा नहीं कि वह कर्मठ नहीं और कामचोर है| वह गंभीरता से अपने जीवन को संवारना चाहता है और अपनी पत्नी Linda Gardner (Thandie Newton) और बेटे Christopher Gardner Jr. (Jaden Smith) को सुखी कर पाने के सब यत्न करता अहै पर उसके सारे प्रयास भी इस दौर में उसे इतना कमाने के अवसर नहीं देते कि वह अपने परिवार का भरण पोषण कर सके| इस संघर्षपूर्ण जीवन से घबराकर उसकी पत्नी उसे और उन दोनों के बेटे को छोड़ जाती है|

 

क्रिस को अपने बेटे से अगाध स्नेह है और अब अकेले ही उसे अपने बेटे की देखभाल ऐसे समय में करनी है जबकि उसे हर तरफ से असफलताएं और निराशाएं ही मिल रही हैं और उसके भीतर बहुत कुछ टूटता जा रहा है| करनी है| लेकिन उसे सफलता पाने के लिए प्रयास तो करने ही हैं| बेटे के पालन पोषण के लिए भी उसका सफल होना बेहद आवशयक है|

 

बहुत अवसरों पर उसे एहसास होता है कि बस उसके सहने के लिए यह अंतिम सीमा है और अब वह और प्रयास नहीं कर सकता सफलता के लिए लेकिन कुछ है अभी शेष उसके अंदर जो उसे डटाए रखता है जीवन के संग्राम में|

 

 

इस दौर में नामुमकिन सा लगने लगा है तुम्हे छू पाना

थकान घर कर गई है अंदर तक तुम्हारा इंतजार करते करते

रोज सुबह धड़कनें बढ़ जाती हैं इस आशा के साथ कि

शायद आज तुम्हारा साथ मुझे मिल जाए

पर दिन मुझे मायूस करके शाम के स्लेटी रंग में दुबक जाता है

मुझे निराशा के समुद्र में डुबोकर

खुद को बहलाना चाहता हूँ

ताकि संघर्ष जारी रख सकूं

कर्मण्येवाधिकारस्ते… को अपना मंत्र बनाना चाहता हूँ

मन को कई तरीकों से समझाता भी हूँ

पर फिर इस बात का बोध सिर उठाने लगता है कि

तुम बिन जीवन की राह आगे नहीं जाती

बेहद कठिनाई से आ पाई नींद से अनायास जाग जाता हूँ

इस आशंका से घबराकर कि अगर तुम न मिलीं तो…?

क्या ऐसे दुर्गति भरे प्रारब्ध को प्राप्त हो जाना होगा मुझे?

भाग्य को कोसने लगता है मन ऐसे में|

पर थक हार कर यथास्थिति को स्वीकार करना पड़ता है

जीवित रहने के लिए स्वप्न देखने का दुस्साहस भी कर बैठने को विवश हो जाता हूँ

काश तुम्हारा साथ मिल जाए तो

इस तरीके से उस अंदाज में राहें संवारूंगा जीवन की

घोर परिश्रम करूँगा ताकि तुम्हारी उपस्थिति को अपने साथ बरकारार रख सकूं

पर तुम तो कोसों दूर हो मुझसे

तुमने अपना मुख मुझसे क्यों फेरा हुआ है?

तुम अपना हाथ भले ही न पकड़ने दो मुझे

पर इतना सच तो तय ही है कि तिनके जितना सहारा तो चाहिए ही

जीने के लिए

बार की असफलता से बिखरने लगता है मन

कब तक आशा को सहेजेगा मन?

इससे पहले कि संभावना ही न बचे मेरी तुम्हारा साथ पाने की,

दो कदम तो मेरे साथ चलो – सफलता!

 

The Legend of Bagger Vance (2000), Ali (2001) और The Pursuit of Happyness (2006) तीनों ने सिद्ध कर दिया था कि Will Smith केवल Bad Boys (1995) और Men in Black (1997) जैसी एक्शन फिल्मों के लिए ही उपयोगी अभिनेता नहीं थे वरन उनकी अभिनय रेंज बहुत बड़ी है और मानवीय भावनाओं को परदे पर उतारने में वे बहुत अच्छे अभिनेता सिद्ध होते हैं|

 

यह फिल्म उन्हें एक संवेदनशील अभिनेता के रूप में मजबूती से स्थापित करती है| इस फिल्म में उनके बेहतरीन अभिनय की बानगी देखने के लिए तीन महत्वपूर्ण हिस्सों की चर्चा आवश्यक हो जाती है|

 

उनके चरित्र क्रिस गार्डनर और उसके बेटे को जब घनघोर परेशानियों के दौर में उसकी पत्नी छोड़कर चली जाती है तो क्रिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि कैसे वह अपने बेटे को पाले और उसे खुश रखे और यही एक इच्छा उसे अनवरत संघर्ष करने के लिए प्रेरित या विवश करते है वरना अगर वह अकेला हो तो शायद टूटकर बिखर जाए| ऐसे ही समय जब वह घर से बाहर गया हुआ है, उसका मकान मालिक घर को सील कर देता है| क्रिस का बेटा बहुत थका हुआ है और रोज की तरह अपने कमरे में जाकर अपने आरामदायक और चिर परिचित बिस्तर में लेटकर सोना चाहता है और यहाँ उसका मजबूर पिता उसे लेकर उस घर के बाहर खड़ा है जहां वह अभी तक रहता आया था| वह किराया नहीं चुका पाया है सो इस किराए के मकान में नहीं घुस सकता| ऐसी विवशता में आदमी अपनी कुंठा अपने से कमजोर पर निकालता है और इस वक्त उसकी परेशानी उसका बेटा है और उसी बेटे की लगातार जिद उसे कुंठित कर देती है और गुस्से में वह अपने बेटे पर बरस पड़ता है|

 

गुस्सा शांत होने पर उसे समझ आता है कि बेटा इतना बड़ा नहीं कि इन बातों को समझ सके| बेटे को लेकर वह एक कम्यूनिटी सेंटर जाता है पर वहाँ उसे बताया जाता है कि वहाँ केवल महिलायें और बच्चे ही ठहर सकते हैं| उसके बेटे को अंदर सोने की जगह मिल सकती है पर उसे नहीं| वह बेटे को अकेला छोड़ने से इंकार कर देता अहै और दूसरे कम्यूनिटी सेंटर जाता है जहां अंदर शरण पाने वालों की लम्बी लाइन देख उसके हौसले पस्त होने लगते हैं| जब केवल दो या तीन स्थान बचे हैं तब एक शाराबी आदमी उससे आगे निकल कर अंदर प्रवेश करने का प्रयास करता है और क्रिस के सब्र का बांध टूट पड़ता है और वह अपने अधिकार के लिए लड़ता है| व्यक्ति अपने ऊपर आई परेशानी को सहन कर सकता है पर अपने सबसे प्रिय व्यक्ति के ऊपर आई विपत्ति को नहीं, तब उसका सारा व्यवहार बदल जाता है| विवशता में बेहद अहिंसक आदमी भी हिंसात्मक दिखाई देने लगता है| अपने पर आई विपत्ति के मामले में व्यक्ति को केवल सच्चाई को स्वीकार करना होता है पर अपने प्रिय पर आई विपत्ति में वह सच्चाई को ही स्वीकार नहीं कर पाता| इसके लिए लोहे का ह्रदय चाहिए और गजब की स्थितप्रज्ञता और यह सबके बस की बात नहीं| प्रेम ऐसे समय व्यक्ति को कमजोर बनाता है| और अगर मामला बच्चों से जुड़ा हो तो बात और गंभीर हो जाती है| बेहद अहिंसक जानवर भी अपने बच्चे पर संकट आया देख जी जान से उनकी रक्षा करते हैं और इस अभियान में हिंसक होने से भी पीछे नहीं हटते|

 

दूसरे हिस्से में जब क्रिस को कहीं शरण नहीं मिलती तो वह नींद में जाते बेटे को रात भर सुलाने के लिए एक स्टेशन पर स्थित सार्वजनिक शौचालय में घुस कर दरवाजा अंदर से बंद कर लेता है और बेटा उसकी गोद में सो जाता है और वह अपने दुर्भाग्य पर चिंतित हो बैठा अरह्ता है| तभे बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता है और क्रिस चौकन्ना हो बैठ जाता है| वह डरा हुआ है, चिंतित है, चौकन्ना है और विवश है पर उसके सामने स्पष्ट है कि उसे दरवाजा नहीं खोलना है| वह अपने बेटे को अपनी बाहों में ऐसे भर लेता है मानो सारी दुनिया से उसकी रक्षा कर रहा हो और विवशता में आंसूओं की झड़ी उसकी आँखों से बह निकलती है|

 

एक हिस्सा फिल्म के लगभग अंत में आता है| जब उसे ऐसा विश्वास हो जाता है कि उसे नौकरी नहीं मिल पायेगी क्योंकि उसे लगता है उसकी लाख कोशिशों के बावजूद भाग्य उससे रूठा हुआ है और कुछ भी अच्छा उसके साथ नहीं हो सकता| उसका तत्कालीन बॉस उसे अपने कक्ष में बुलाता है और उसके अंदर प्रवेश करने पर उससे कहता है कि उसने बड़ा अच्छा सूट पहना हुआ है|

क्रिस कहता है कि आज क्योंकि उसका इस कम्पनी में आख़िरी दिन था सो उसने सोचा कि वह अपने सबसे अच्छे कपड़े पहनकर यहाँ आएगा|

बॉस मुस्कराते हुए कहता है,” शायद! लेकिन हम लोग कल सुबह मिल रहे हैं अगर तुम्हे हमारी कम्पनी में काम करने में कोई एतराज न हो”|

 

क्रिस के दिमाग में यह संभावना पहले नहीं आई थी सो वह इस बात को सुनने के लिए तैयार नहीं था| वह अपने अंदर उमडती भावनाओं पर काबू पाने में असफल है और वह जोर जोर से रोना चाहता है , शायद ईश्वर के सामने रोकर अपना अजी हल्का करना चाहता है कि उसके जीवन का क्या हाल हो गया है, और साथ ही वह अपने सामने बैठे बॉस को अपने आंसू भी दिखाना नहीं चाहता| और इस अंदुरनी संघर्ष में वह बमुश्किल वह हल्का सा मुस्करा पाता है और आंसुओं से नाम आँखें लिए ऑफर को स्वीकृत करने के लिए अपना सिर हिलाता है|

जब वह बॉस के कक्ष से निकलने ही वाला होता है तब बॉस उसे पांच डॉलर का नोट वापिस करता है जो उसने पिछले दिनों उससे उधार लिया था|

 

ऐसे बहुत से ह्रदय विदारक दृश्य फिल्म में उपस्थित हैं जो दुख को परदे से बाहर प्रसारित करके दर्शक को छू जाते हैं और उसे बांध लेते हैं| और विल स्मिथ ने गजब की कुशलता और गहराई से ऐसे दृश्यों में जीवन भर दिया है|

जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब निराशाएं चारों ओर से आदमी को घेर लेती हैं| कुछ भी सही होते नहीं दिखता पर अगर इंसान को जीवित रहना है और उसे भरोसा है कि उसे जीना है और वह आत्मघाती नहीं है तो दो बातें जरुर होती हैं|

 

एक तो व्यक्ति अपराध की ओर नहीं जाता क्योंकि वह भी एक किस्म का आत्मघात ही है और दूसरा कोई न कोई रास्ता जरुर निकल कर आता है जो व्यक्ति को जिंदा रखने में सहायक सिद्ध होता है|

 

जब तब घनघोर परेशानियों में मेरा जीवन घिर जाता है

अपनी कमजोरियों को देख मेरी परेशानी और बढ़ जाती है

मेरा आत्मविश्वास अपनी ताकत खोता जाता है

ऐसा लगने लगता है कि मैं कहीं

बहुत गहरे और अँधेरे कुएं में गिरता जा रहा हूँ

जहां से मैं चिल्लाता तो हूँ

पर मेरी आवाज बाहर नहीं पहुँच पाती

ऐसे समय मुझे अपनी छाती पर

टनों भारी शिला का बोझ मालूम होता है

धैर्य, शान्ति, ध्यान, आत्म-विश्वास, निश्चय और धनात्मक रुख जैसे शब्दों से

बनी माला मनके मनके बिखरने लगती है

लेकिन इससे पहले कि मैं सा कुछ खो दूँ,

पूरी तरह टूट कर बिखर जाऊं

एक भाव है जो मुझे जिंदा होने का एहसास करा जाता है

जब आदि काल से हवा अबह रहे एही

सूरज अपनी रोशनी और ऊर्जा धरा पर बिखेरता आ रहा है

फूल अपनी खुशबू बिखेरते आ रहे हैं

जबकि उन्हें अल्प काल में ही मुरझा कर बिखर जाना होता है

तारे अपनी छटा से लुभाते जाते हैं मानव को

चाँद अपनी शीतलता से कवियों को प्रेरित करता चला जाता है|

तब मैं तो आखिर एक मनुष्य हूँ

संभवतः प्रकृति की श्रेष्ठ रचना

तब मुझे इस रचनात्मक कार्य में शामिल क्यों नहीं होना चाहिए

अपने जीवन को रचनात्मकता से भरपूर बना कर!

 

 

The Pursuit of Happiness जीवन का आशामयी रूप हमें दिखाती है| फिल्म Chris Gardner के वास्तविक जीवन पर आधारित है|

जीवन में कैसे ऐसे समय जब निराशाएं घर कर लें और व्यक्ति उस अवस्था में पहुँच जाये कि अब जो हो सो, मौत आती हो तो आए, पर तब भी उसकी जिजीविषा में क्षीण सी भी गुंजाइश बचे जिससे तिनके का सहारा बना कर वह फिर से जीवन को अंकुरित करके लहलहाती फसल उगा देने का जीवट दिखाए, इस प्रक्रिया को देखने के लिए इस फिल्म का देखा जाना आवश्यक है|

नौकरी मिलने के बाद भावुक क्रिस को ऑफिस की बिल्डिंग से निकल कर सड़क पर भीड़ में शामिल हो जाने के बाद अपनी विभिन्न भावनाओं को प्रदर्शित करते देख और डे-केयर जाकर अपने बेटे को गोद में उठाकर उसे गले लगाकर रोने से यही एक बात उभर कर आती है फिजां में कि – जीना तो है, कैसे भी हो जीना तो है|

…[राकेश]

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