बिमल रॉय निर्मित और मोनी भट्टाचार्जी निर्देशित फ़िल्म – उसने कहा था, हिंदी के लेखक चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की एकमात्र उपलब्ध कहानी – उसने कहा था, पर आधारित है| सलिल चौधरी के मधुर एवं आकर्षक संगीत से सजी इस फ़िल्म में एक गीत मख़दूम मुहिउद्दीन की नज़्म – सिपाही से लिया गया| उनकी मूल नज़्म से मुखड़ा और दो अंतरे इस गीत में उपयोग में लिए गए हैं और एक अंतरा (पहला) मूल नज़्म से भिन्न है|

मख़दूम मुहिउद्दीन की मूल नज़्म – सिपाही प्रस्तुत है|

जाने वाले सिपाही से पूछो
वो कहाँ जा रहा है

कौन दुखिया है जो गा रही है
भूके बच्चों को बहला रही है

लाश जलने की बू आ रही है
ज़िंदगी है कि चिल्ला रही है

जाने वाले सिपाही से पूछो
वो कहाँ जा रहा है

कितने सहमे हुए हैं नज़ारे
कैसे डर डर के चलते हैं तारे

क्या जवानी का ख़ूँ हो रहा है
सुर्ख़ हैं आँचलों के किनारे

जाने वाले सिपाही से पूछो
वो कहाँ जा रहा है

गिर रहा है सिपाही का डेरा
हो रहा है मिरी जाँ सवेरा

और वतन छोड़ कर जाने वाले
खुल गया इंक़िलाबी फरेरा

जाने वाले सिपाही से पूछो
वो कहाँ जा रहा है

और फ़िल्म – उसने कहा था, का गीत है –

जाने वाले सिपाही से पूछो
वो कहाँ जा रहा है

इश्क़ है क़ातिल-ए-ज़िंदगानी
खून से तर है उसकी जवानी
हाय मासूम बचपन की यादें
हाय दो रोज़ की नौजवानी
जाने वाले ...

कैसे सहमे हुए हैं नज़ारे
कैसे डर डर के चलते हैं तारे
क्या जवानी का खून हो रहा है
सुर्ख है आंचलों के किनारे
जाने वाले ...

कौन दुखिया है जो गा रही है
भूखे बच्चों को बहला रही है
लाश जलने की बू आ रही है
ज़िंदगी है कि चिल्ला रही है
जाने वाले ...

मख़दूम मुहिउद्दीन की मूल नज़्म – सिपाही से फ़िल्म के गीत में एक अंतरा (इश्क़ है क़ातिल-ए-ज़िंदगानी, खून से तर है

उसकी जवानी, हाय मासूम बचपन की यादें, हाय दो रोज़ की नौजवानी) भिन्न है| नज़्म की शुरू की चार पंक्तियों को फ़िल्मी गीत में अंतिम अंतरा बना दिया गया है और गायक मन्ना डे ने फ़िल्मी गीत के दूसरे अंतरे में पहली पंक्ति गाई है (कैसे सहमे हुए हैं नज़ारे) जबकि मूल नज़्म में पंक्ति थी (कितने सहमे हुए हैं नज़ारे)|

फ़िल्म के क्रेडिट्स में पहले लिरिक्स के सामने शैलेन्द्र का नाम दिया गया है, उसके बाद कुछ और क्रेडिट्स के बाद विशेष रूप से लिरिक्स – जाने वाले सिपाही – के सामने मख़दूम मुहिउद्दीन को क्रेडिट दिया गया है|

इंटरनेट पर किसी कारणवश कुछ लोग इस गीत को फ़िल्म के बाकी गीतों की तरह शैलेन्द्र का ही रचा हुआ गीत मानते रहे हैं| या तो वे भूलवश ऐसा करते आ रहे हैं और मानते रहे हैं कि जब सभी गीत शैलेन्द्र ने लिखे हैं तो यह भी उन्हीं का लिखा हुआ होगा भले इसके लिए उन्होंने प्रेरणा मख़दूम मुहिउद्दीन की नज़्म से ली हो| अगर ऐसा हुआ होता तो फ़िल्म या तो दोनों रचनाकारों को क्रेडिट देती| मूल नज़्म की तुलना फ़िल्म में उपयोग में लाये गए गीत से करने पर यह स्पष्ट है कि फ़िल्मी गीत के पहले अंतरे को छोड़ बाकी गीत (मुखड़ा और दो अंतरे) ज्यों का त्यों मख़दूम मुहिउद्दीन की नज़्म से बना हुआ है और यह संभावना ज्यादा है कि पहला अंतरा भी मख़दूम ने ही लिखा होगा|


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