सन 1962 में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरु की वैश्विक शांति में आस्था पर चोट करते हुए उनके पंचशील के सिद्धांत को ठुकराते हुए पड़ोसी चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया| अंगरेजी हुकूमत से आज़ादी मिले डेढ़ दशक भी पूरा न हुआ था और भारत विकास के पथ पर शैशवस्था में डगमगाते हुए चल रहा था कि चीन ने उस पर ऐसी बड़ी विपत्ति लाद दी|

चीन के धोखे से भारत ज्यादा घायल था बनिस्पत इस बात के कि एक विशाल देश से युद्ध हेतु उसके पास आवश्यक साधन नहीं थे| कोई भी युद्ध सैनिकों से प्राणों का बलिदान और नागरिकों से साधन विहीन जीवन स्वेच्छा से अपनाने का त्याग मांगता है, भारत के सैनिक और नागरिक दोनों अपने अपने हिस्से का त्याग करने हेतु तैयार भी सदैव रहे हैं लेकिन ऐसे कठिन समय में सैनिकों में जोश और साहस की भावना और नागरिकों में एकता का भाव जगाना बहुत आवश्यक है और ऐसी आवश्यकताओं के समय ऐसे नेताओं, जिनकी अपील सारे देश में मान्य हो, द्वारा सैनिकों और जनता से लगातार संवाद करते रहने की आवश्यकता होती है| सौभाग्य से तब पंडित नेहरु जैसे विशाल कद के नेता भारत के प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित थे और उन्हें जनता का भरपूर सहयोग प्राप्त था|

हथियारों की कमी से भारतीय सेना जूझ रही थी और हथियार भी पुराने किस्म के थे| यहाँ यह याद रखना आवश्यक है कि चीन से लड़ाई बर्फ से घिरे पर्वतीय इलाकों में हो रही थी जहां जीप जैसे हलके वाहन भी तब निष्प्रभावी हो गए जब सैनिकों को शून्य या इससे नीचे के तापमान में लड़ना पड़ा क्योंकि तब वाहनों में इंधन (डीज़ल) कम तापमान के कारण जम कर वैक्स जैसा ठोस न हो जाए इस हेतु एडिटिव्स नहीं थे| आज यह समस्या बेहद छोटी लगेगी लेकिन तब यह एक बहुत बड़ा तकनीकी सवाल था|

चीन द्वारा भारत पर युद्ध थोपे जाने के कठिन समय हिंदी सिने-उद्योग ने अपने कदम आगे बढाए और अपनी कला का उपयोग करते हुए सैनिकों और नागरिकों में उत्साह और साहस की भावना को मजबूत बनाये रखने के लिए उन्हें प्रेरित करने के लिए किया| फ़िल्म उद्योग ने ‘इन्डियन फ़िल्म इंडस्ट्री नेशनल डिफेन्स कमेटी‘ नामक संस्था का गठन किया और कलाकारों ने सीमा पर लड़ रहे सैनिकों के मनोरंजन के लिए वहां जाकर कार्यक्रम प्रस्तुत किये| चैरिटी शोज़ के माध्यम से देश भर से सैनिकों की सहायता के लिए धन एकत्रित किया|

फ़िल्म निर्माता निर्देशक महबूब खान ने भी भारत के उत्साहवर्द्धन के लिए अपनी कलात्मक क्षमता का उपयोग किया और दो विडियो गीत, जिन्हें काव्यात्मक लघु फ़िल्म कहा जा सकता है, बनाए जिन्हें फिल्म्स डिवीजन की सहायता से सिनेमाघरों में दिखाया गया|

विगत कुछ सालों में महबूब खान ने दिलीप कुमार, राज कुमार, राजेन्द्र कुमार, सुनील दत्त और कमलजीत के साथ फ़िल्में बनायी थीं और उन्हें लेकर ही दोनों विडियो गीतों का निर्माण एवं निर्देशन किया|

पहला गीत बनाया गया|

वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ
हमारे इम्तहां का वक़्त है, तैयार हो जाओ

हमारी सरहदों पर खून बहता हैं जवानों काहुआ जाता है दिल छलनी हिमाला की चट्टानों का
उठो रुख फेर दो दुश्मन की तोपों के दहानों का
वतन की सरहदों पर आहनी दीवार हो जाओ
हुशियार हो जाओ, वतन की आबरू खतरे में है

वो जिनको सादगी में हमने आँखों पर बिठाया थाजो जिनको भाई कहकर हमने सीने से लगाया था
वो जिनकी गरदनों में हार बाहों का पहनाया था
अब उनकी गरदनों के वास्ते तलवार हो जाओ
हुशियार हो जाओ, वतन की आबरू खतरे में है

न हम इस वक़्त हिन्दू हैं न मुस्लिम हैं न ईसाईअगर कुछ हैं तो हैं इस देश, इस धरती के शैदाई
इसी को ज़िंदगी देंगे, इसी से ज़िंदगी पाई
लहू के रंग से लिखा हुआ इकरार हो जाओ
वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ

खबर रखना कोई गद्दार साजिश कर नहीं पायेनजर रखना कोई ज़ालिम तिजोरी भर नहीं पाये
हमारी कौम पर तारीख तोहमत धर नहीं पाये
वतन-दुश्मन दरिंदों के लिए ललकार हो जाओ
वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ

इस गीत को साहिर लुधियानवी ने लिखा, गाया मोहम्मद रफ़ी ने और संगीतबद्ध किया खय्याम ने| इस गीत को परदे पर प्रस्तुत किया दिलीप कुमार, राज कुमार, राजेन्द्र कुमार और कमलजीत ने| चारों अभिनेताओं ने अपने भाव प्रणव अभिनय से गीत में जान डाल दी|

दूसरा गीत बनाया गया

एक है अपनी ज़मीं
एक है अपना गगन

एक है अपना जहाँ
एक है अपना वतन

अपने सभी सुख एक हैं
अपने सभी ग़म एक हैं

आवाज़ दो हम एक हैं
ये वक़्त खोने का नहीं

ये वक़्त सोने का नहीं
जागो वतन ख़तरे में है

सारा चमन ख़तरे में है
फूलों के चेहरे ज़र्द हैं

ज़ुल्फ़ें फ़ज़ा की गर्द हैं
उमड़ा हुआ तूफ़ान है

घर की हिफ़ाज़त फ़र्ज़ है
बेदार हो बेदार हो

आमादा-ए-पैकार हो
आवाज़ दो हम एक हैं

ये है हिमाला की ज़मीं
ताज-ओ-अजंता की ज़मीं

संगम हमारी आन है
चित्तोर अपनी शान है

गुल-मर्ग का महका चमन
जमुना का तट गोकुल का बन

गंगा के धारे अपने हैं
ये सब हमारे अपने हैं

कह दो कोई दुश्मन-नज़र
उट्ठे न भूले से इधर

कह दो कि हम बेदार हैं
कह दो कि हम तय्यार हैं

आवाज़ दो हम एक हैं
उट्ठो जवानान-ए-वतन

बाँधे हुए सर से कफ़न
उट्ठो दकन की ओर से

गंग-ओ-जमन की ओर से
पंजाब के दिल से उठो

सतलुज के साहिल से उठो
बंगाल से गुजरात से

कश्मीर के बाग़ात से
नेफ़ा से राजस्थान से

कुल ख़ाक-ए-हिन्दोस्तान से
आवाज़ दो हम एक हैं

हम एक हैं
हम एक हैं

इस गीत को लिखा शायर जां निसार अख्तर ने, संगीतबद्ध किया खय्याम ने और गाया मोहम्मद रफ़ी ने|

परदे पर इसे प्रस्तुत किया राज कुमार, राजेन्द्र कुमार, कमलजीत और सुनील दत्त ने| जिस जोश से गीत को परदे पर अभिनेताओं ने इसे प्रस्तुत किया है वह रोंगटे खड़ा कर देने वाला है| सुनील दत्त इतने वास्तविक क्रोध के साथ परदे पर कम ही आये होंगे|

ये दोनों गीत ऐतिहासिक हैं|

महबूब खान, खय्याम, मोहम्मद रफ़ी, साहिर और जां निसार अख्तर और पाँचों अभिनेताओं के संयुक्त प्रयासों से ऐसे बेहतरीन प्रयास फलीभूत हो पाए और इस टीम ने संकट के समय देश, सेना और नागरिकों की बेहतरी के लिए अपनी ओर से कदम उठाये|

काश कि आजकल का फ़िल्म उद्योग भी देश के प्रति अपने दायित्व को समझ समय समय पर ऐसे कदम उठाता|

…[राकेश]


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