दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
(~फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

TVF ने ग्रामीण जीवन पर आधारित अपनी वेब श्रंखलाओं में प्रेमचंद और श्रीलाल शुक्ला द्वारा ग्रामीण जीवन पर रचे साहित्य का संगम साध लिया है| जहाँ प्रेमचंद साहित्य से उन्होंने ग्रामीण समाज में फ़ैली विभिन्न किस्म की असमानताओं, गरीबी, भ्रष्टाचार की स्वीकृति के बाद इनके मेल मिलाप से चलते हुए एक नए तंत्र को लिया है वहीं उन्होंने श्रीलाल शुक्ला की रागदरबारी जैसी कृति से हास्य-व्यंग्य की धार को अपना लिया है| जहाँ प्रेमचंद के रचना संसार में दुखों, कष्टों और नैतिकता के घालमेल की संवेदना मिल जाती है वहीं श्रीलाल शुक्ला के रचना संसार से स्वंय पर हंसने और तमाम कष्टों के बीच मासूमियत को बनाए रखने की सरलता मिल जाती है|

TVF की वेब श्रंखलाओं में ऐसे तत्वों के मिश्रण से उपजे चरित्र वास्तविक भी लगते हैं, साहित्यिक भी| उनकी श्रंखलायें तमाम किस्म की सामाजिक बुराइयों को दिखा कर भी दर्शक को निराशा में नहीं छोड़तीं बल्कि निराशा के एंटीडोट के रूप में वे एक या दो चरित्रों की नैतिक मजबूती, समाज के प्रति दायित्व के बोध की सजगता, और चारों ओर निराशा के बादल छाये वातावरण में भी आशा का साथ न छोड़ने की जिजीविषा को भी दिखाकर मानवीय सफलता की संभावना को जिलाए रखती हैं|

ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के समुचित साधनों का अभाव ग्रामीण क्षेत्रों को बहुत गहरे में प्रभावित करता है| अब भारत की 70% से थोड़ा ही कम (68.8%, 83 करोड़ लोग, 2011 की जनगणना के अनुसार) आबादी गाँवों में आज भी रहती है|

2021-22 के Rural Health Statistics को देखा जाए तो, ग्रामीण क्षेत्रों में 1,57,935 उप-स्वास्थ्य केंद्र (Sub-Centres), 24,935 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs), और 5,480 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHCs) कार्यरत थे।

अगर स्कूल हैं भी तो वहां कक्षाओं की कमी, बुनियादी सुविधाओं (जैसे पानी और शौचालय) की अनुपस्थिति, और इसी तरह चिकित्सा केंद्र हैं तो वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रमुख चुनौतियां हैं, जिनका सामना करके हालात और बेहतर करने की आवश्यकता है|

Ministry of Health and Family Welfare और NCERT की वेबसाइट्स देखें तो ग्रामीण भारत में स्कूलों और स्वास्थ्य सुविधाओं की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में वृद्धि हुई है, लेकिन गुणवत्ता और पहुंच में अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित है। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। 90% लोगों को विशेषज्ञ उपचार के लिए अन्य स्थानों पर जाना पड़ता है।

मेडिकल के क्षेत्र में जीवन के 7-10 साल पढ़ाई करने और अगर सरकारी मेडिकल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त नहीं की तो निजी मेडिकल शिक्षा लेने पर बहुत बड़ी धनराशि खर्चने के बाद, डॉक्टर बन गए, युवक-युवतियां, क्या ग्रामीण क्षेत्रों में बने स्वास्थ्य केन्द्रों में सेवायें देने जायेंगे?

उनमें से कुछ साल में एक दो बार ग्रामीण क्षेत्रों में किन्हीं समाजसेवी संस्थाओं द्वारा लगाए गए स्वास्थ्य कैम्पों में हिस्सा लेने अवश्य जा सकते हैं अगर ऐसी सेवा उनकी संवेदना को छूती हो|

ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों पर वैसे डॉक्टर्स ही जाकर कर्तव्य का निर्वाह कर सकते हैं, जिन्होंने बचपन से मेडिकल सेवाओं की अनुपस्थिति का प्रकोप झेला हो, या बचपन से उनके मन में ग्रामीण क्षेत्रों में मेडिकल क्षेत्र में सेवा करने का भाव जम कर बैठा हो, या वे इतना पैसा बचपन से देख चुके हैं कि अब पैसा उनके सिर पर चढ़कर नहीं रहता और वे सरकारी वेतन की सीमाओं में रहकर लोगों को चिकित्सा प्रदान कर सकने में पैसे को लेकर परेशान नहीं होते और मेडिकल का क्षेत्र उनके लिए समाज की सेवा का अवसर है|

‘ग्राम चिकित्सालय’ का नायक समाज सेवा के भाव से भरा हुआ धन से अमीर पृष्ठभूमि से आने वाला डॉक्टर है, जो अपने मेडिकल कॉलेज का टॉपर है| उसे ग्रामीण क्षेत्र में ही काम करना है ऐसे ही निश्चय से वह गाँव के प्राथमिक चिकित्सा केंद्र पर अपना पद संभालने पहुँचता है|

स्वास्थ्य केंद्र के कम्पाउण्डर, सफाई कर्मी और नर्स को वहां किसी डॉक्टर को देखने की आदत नहीं है, उन्हें लगता है परंपरा के अनुसार अगर कि डॉक्टर वहां आ भी गया तो यहाँ का माहौल देख भाग खड़ा होगा और उनके ऊपर सब कुछ छोड़कर महीने में एक बार आ जाया करेगा, वह भी उस समय तक,जब तक वह वहां से ट्रांसफर का प्रबंध न कर ले|

गाँव को स्थानीय झोला छाप (कथित) डॉक्टर पर भरोसा है, समुचित शिक्षित डॉक्टर पर नहीं| सरकारी स्वास्थ्य केंद्र का कम्पाउण्डर, झोला छाप नकली डॉक्टर के क्लीनिक से संबंधित मेडिकल स्टोर को कम दामों पर सरकारी कोटे की दवाइयां बेच देता है| सफाई कर्मचारी ने अपने बदले ठेके पर किसी और को रखा हुआ है| एक नर्स ही है जो गाँव गाँव घूम सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम में भागीदारी करती रहती है| स्वास्थ्य केंद्र के सामने की सरकारी जमीन पर पड़ोस के किसान ने अनाधिकृत कब्ज़ा करके वहां फसल उगा रखी है सो स्वास्थ्य केंद्र तक जाने का कोई रास्ता नहीं बचा, जिसे जाना होगा, खेत में लहलहाती फसल के बीच में से चलकर जाना होगा|

सरकारी डॉक्टर को गाँव वालों के मन में बसे अपने प्रति नापसंदगी, और शत्रुता के भावों का सामना करते हुए अपने निश्चय पर डटे रहकर अपने पद से अपेक्षित कर्त्तव्यों का निर्वाह करना है, और इस निश्चय को डांवाडोल करने के लिए गाँव की तरफ से 99 बाधाएं उसके मार्ग में बिछाई जाती हैं, उसके पास अपने दृढ निश्चय के सिवा कोई बाहरी सहायता नहीं है|

डॉक्टर नायक के पूर्वग्रहों को गाँव में उसका प्रतिद्वंदी नकली डॉक्टर भी तोड़ता है और उसे वैयक्तिक संपर्क और संबंध की महिमा समझाता है| गाँव जैसी छोटी रिहायशी ईकाई में जहाँ सभी एक दूसरे को भरपूर जानते पहचानते हैं, वहां अजनबी बनकर कोई भी लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता|

डॉक्टर की यात्रा में अन्यों की वास्तविक परेशानियां जब उसे दिखाई देनी शुरू होती हैं तभी उसके सामने एक रोड मैप बनना शुरू होता है, लेकिन पनघट की डगर रपटीली भी है और संकरी भी| शहर में बैठ गाँव के जीवन की जो एक रोमांटिक छवि लोग बना लेते हैं, उसे श्रंखला शरू में ही तोड़ देती है| वहां रहने को शहरी को बड़े जीवट वाला होने की जरुरत है| वहां अपने ही स्तर की राजनीति काम करती है|

डॉक्टर की गाँव वास की यात्रा में उसे खट्टे-मीठे-कड़वे अनुभव होते चले जाते हैं, लेकिन अपने ऊपर उनके प्रभाव उसे बहुत भारी नहीं लगते जब तक कि वह अपने चिकित्सालय में नियुक्त नर्स के जीवन के संपर्क में नहीं आता|

यह संपर्क उसके जीवन को हिलाता है| श्रंखला के सेटायर वाले भागों से अलग पति-पत्नी और मानसिक रूप से असामान्य स्थितियों का सामना कर रहे नवयुवक बेटे, वाले भाग श्रंखला में भावावेश का समावेश करते हैं| बेटे और पति दोनों के द्वारा वर्तमान जीवन में उत्पन्न तनाव के बहुत बड़े स्तर को झेलती स्त्री के रुप में गरिमा विक्रांत सिंह को कुछ दृश्यों में भावातिरेक से जूझने के साथ धराशायी होकर रुदन में डूबना न करके कष्टों की हद पर पहुँचकर रोते हुए भी, बेटे के जीवन के कारण, अपनी अंदुरनी मजबूती दिखानी थी और वे इसे कुशलता से निभा जाती हैं| एक परिवार की जटिल परिस्थितियों में उलझे भाग, दर्शन को भी स्क्रीन पर जगह देते हैं| पति-पत्नी और बेटे के आपसी रिश्ते इतने ज्यादा उलझे हुए हैं कि न पति-पत्नी को पता है उनके बीच समस्या की एकमात्र वजह क्या उनका असामान्य मानसिक शक्ति वाला बेटा है? बेटे के कारण पिता संन्यास की ओर उन्मुख है, या वह परिवार की जिम्मेदारियों से ही भाग रहा है? या कि संन्यास की ओर उसका सहज ही झुकाव रहा, और वह बस अपनी पत्नी की अनुमति के कारण गृहस्थ जीवन से बाहर होकर भी घर की चारदीवारी से बहार और संन्यास के संसार के प्रवेश द्वार के बीच के स्थान में फंसा हुआ है|

मानसिक बीमारी होती है, इस बात को श्रंखला स्थापित करती है और इसका उपचार भी संभव है, इसकी आशा भी जगाती है और सारी मानसिक व्याधियां पागलपन नहीं होतीं, इसे भी स्थापित करती है| ग्रामीण परिवेश में एक कम पढी लिखी माँ के लिए यह स्वीकारना ही बेहद कठिन व जटिल है कि उसकी संतान को मानसिक रोग हो सकता है|

यूं तो युवा डॉक्टर (अमोल पराशर) के समक्ष एक युवा डॉक्टर नायिका (आकांशा रंजन) है लेकिन श्रंखला के पहले सीज़न में अन्य कलाकारों के अच्छे अभिनय के बावजूद यह अमोल पराशर और गरिमा विक्रांत सिंह के बीच की जुगलबंदी बन जाता है| बहुत से चरित्रों के बीच ये दो चरित्र ज्यादा उभर कर आते हैं और इसका लाभ दोनों कलाकार भरपूर उठाते हैं|

विनय पाठक, आनंदेश्वर द्विवेदी और संन्यास की ओर उन्मुख व्यक्ति की भूमिका में लम्बे कद के अभिनेता (?) भी अलग से चमकते हैं| यह चरित्र एकरंगी लग सकता था पर बेहद भावनाओं से भरे दृश्यों में भावों के विभिन्न रंग दिखा उन्होंने इसे एक जटिलता से गुजरने वाला चरित्र बनाकर इस चरित्र के प्रति उत्सुकता जगा दी| शायद श्रंखला आगे इस चरित्र की कथा को विस्तार दे|

शुरुआती कड़ियों में श्रंखला को ज्यादा कसावट दी जा सकती थी| जितनी गति श्रंखला बाद की कड़ियों में पकड़ती है उसी गति को शुरू से हासिल किया जाता तो कहीं कहीं नज़र आने वाली बोझिलता दूर होती| लेकिन हर श्रंखला का एक स्वभाव होता है और चूंकि पहले सीज़न में अभी कुछ भी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाया है, संभावना है कि दूसरा सीज़न पहले को भी परिभाषित करेगा| दूसरे सीज़न के बारे में दर्शक को उत्सुकता की अवस्था में तो श्रंखला छोड़ ही जाती है|

ग्रामीण परिवेश में स्थित होने के बावजूद यह TVF के बहुचर्चित कार्यक्रम पंचायत से अलग स्थान बनाने में कामयाब हो जाती है|

महत्वपूर्ण यह है कि एक प्रोडक्शन टीम ऐसी है जो शहर और गाँव के बीच पुल बनाने वाले कार्यक्रम बना रही है और रोचक कार्यक्रम बना रही है|

राकेटरी, मामला लीगल है के बाद ग्राम चिकित्सा निर्देशत करने वाले राहुल पांडे अपनी कलात्मक क्षमता को स्थापित कर चुके हैं| कॉमिक-ड्रामा-ट्रेजडी का मिश्रण फिल्माने में वे सिद्धहस्त दिखाई देते हैं और भविष्य में हो सकता है इस डोमेन में वे राजू हिरानी को कड़ी टक्कर दें|

…[राकेश]


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