पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर (1910-1992) हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के जयपुरअतरौली घराने के प्रमुख प्रतिनिधियों में से एक थे| पंडित जी की गायकी ने ख्याल गायन शैली की गहरी समझ, जटिल तानों, और भावनात्मक प्रस्तुति के साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में अपनी एक अमिट छाप बनायी।

मल्लिकार्जुन मंसूर ने संगीत की शिक्षा की बुनियाद उस्ताद माणिकराव बोरकर के मार्ग निर्देशन में प्राप्त की| तत्पश्चात उन्होंने जयपुरअतरौली घराने के संस्थापक उस्ताद अल्लादिया खान और उनके पुत्रों, उस्ताद माणिकबुवा ठाकरे और उस्ताद भुर्जी खान, से गहन तालीम ली और संगीत के इस प्रसिद्द घराने द्वारा रागों के शुद्ध और वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण पर विशेष जोर देने की परंपरा को उन्होंने गहराई से आत्मसात कर लिया।

कठोर अनुशासन का पालन करते हुए कई बरसों के निरंतर रियाज के माध्यम से मल्लिकार्जुन मंसूर अपनी कला को निखारते रहे| शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र को अपने संगीत के साथ साथ उन्होंने एक और उपहार अपनी आत्मकथा लिखकर दिया| उनके द्वारा कन्नड़ में लिखी उनकी आत्मकथा – नन्ना रसायत्रे का अंगरेजी में अनुवाद (RASA YATRA: MY JOURNEY IN MUSIC) उनके पुत्र और शिष्य राजशेखर मंसूर ने किया तथा हिन्दी में अनुवाद (रसयात्रा) मृत्यंजय ने किया| आत्मकथा में वे अपनी संगीत साधना और संगीत के प्रति समर्पण का विस्तार से वर्णन करते हैं| सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले मल्लिकार्जुन मंसूर ने आत्मकथा में अपने संघर्ष, आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य समस्याओं, का उल्लेख किया है| और उजागर करता है।

जयपुरअतरौली घराने की प्रमुख विशेषताएँ, मल्लिकार्जुन मंसूर की गायकी में भरपूर झलकती हैं| घराने की परंपरा के अनुसार वे रागों को उनके शुद्ध और शास्त्रीय रूप में प्रस्तुत करते थे, और उनके गायन में स्वरों की बारीकियाँ और राग का भाव पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है|

उनकी तानें स्वरों की सटीकता और लय के साथ सामंजस्य रखते हुए आलाप और लयकारी में जटिल एवं तीव्र प्रतीत होती हैं|

उनके आलाप में राग का क्रमिक विकास और बंदिशों में शब्दों के साथ स्वरों का सामंजस्य देखने को मिलता है। पारंपरिक बंदिशें भी उनकी प्रस्तुति में नई लगती हैं| उनकी गायकी में सहजता है, जो तकनीकी जटिलता के बावजूद श्रोता को सरल और आनंददायक लगती है।

उनकी लयकारी में ताल के साथ स्वरों का तालमेल बेजोड़ सुनाई देता है। उनकी तानों में मध्य और द्रुत लय, दोनों की प्रभावशाली उपस्थिति मिलती है।

तेज, जटिल, और स्वरों की सटीकता से भरी, सीधी और उलटी दोनों तरह की तानों का उपयोग उनकी तकनीकी निपुणता को दर्शाता है|

उनकी गायकी में अध्यात्मिक और भावनात्मक गहराई दिखाई देती है जो श्रोता को राग के अंदुरनी जगत में खींच ले जाती हैं।

तकनीकी कौशल और भाव का एक बेजोड़ संतुलन पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर की गायिकी में मिलता है|

मल्लिकार्जुन मंसूर ने कई रागों को अपनी गायकी से अविस्मरणीय बना दिया। उन्होंने कई दुर्लभ, क्लिष्ट व जटिल स्वर संरचनाओं और विशिष्ट भाव वाले राग खूब गाये और कम प्रचलित रागों, जैसे राग नट बिहाग, बसंती केदार, मुलतानी, और राग खट को भी अपनी गायिकी में जगह दी।

राग तोड़ी की उनकी प्रस्तुति में सुबह के राग का गंभीर और आध्यात्मिक भाव स्पष्ट होता है। उनके आलाप में स्वरों का क्रमिक व उतरोत्तर विकास और तानों की जटिलता श्रोता को मंत्रमुग्ध कर देती है|

उनके द्वारा गाये राग मुलतानी हमेशा प्रसिद्द रहे हैं, इस राग की प्रकृति अनुरूप उनकी गायकी में दोपहर की शांति और गहराई चारों ओर पसर जाती है|

राग बसंती केदार एक दुर्लभ राग है, और केदार और बसंत रागों के मिश्रण को मल्लिकार्जुन मंसूर ने मनमोहक ढंग से प्रस्तुत किया।

उन्होंने राग नट बिहाग की प्रस्तुति में राग की मधुरता और जटिलता के अद्भुत संतुलन को साधा|

छह स्वरों वाले राग खट को तकनीकी दक्षता और भावनात्मक गहराई के संगम से मल्लिकार्जुन मंसूर ने जीवंत कर दिया।

मुख्य रूप से ख्याल गायक होते हुए भी मल्लिकार्जुन मंसूर की ठुमरियों और भक्ति गायिकी में भी भावनात्मक अभिव्यक्ति का शिखर दिखाई देता है।

पद्मश्री (1970), पद्मभूषण (1976), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1971), और मरणोपरांत पद्मविभूषण (1992) से सम्मानित पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर का हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बहुत बड़ा योगदान रहा है|

चौहत्तर साल की वह निष्कंप लौ
एकाएक काँपी

और उसने चश्मा लगा लिया
ज़रा देखें

सुरों के बाहर भी है
क्या कोई दुनिया?

(~ कुलदीप कुमार)


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