पंचायत के सीज़न 4 का मुख्य शरीर ग्राम प्रधान के चुनाव के इर्दगिर्द पसरी राजनीति से बना है और बाकी उप–कथाएं इधर उधर पैर पसारती हैं|
इस बार राजनीति के अखाड़े में ग्राम प्रधान के चुनाव में यूं तो आमने सामने मंजू देवी (नीना गुप्ता) और क्रांति देवी (सुनीता राजवार) ही हैं और इस संघर्ष में उन दोनों के पतिदेव भी एक दूसरे के सामने खड़े हैं|
सीज़न 3 में सांसद की झलक दिखाई गयी थी, नए सीज़न की एक कड़ी में उनकी सक्रियता से इस बात का खुलासा किया गया कि एक राजनेता के तौर पर सांसद जी, सार्वजनिक रूप से अपने मतदाताओं को दिखाई भले न दें, लेकिन वे अपने संसदीय क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए परदे के पीछे रह कर ही दर्जनों कारगुजारियां खिलाते रहते हैं|
विधायक महोदय को विधायकी जाने का ग़म है और उनके अहं को ठेस पहुँची है और इस बात से तो बहुत ज्यादा ठेस लगी है कि एक छोटे से गाँव की प्रधान के पति और उसके तीन चार साथियों ने उनकी आँखों के सामने उनके अस्तबल से उनका चहेता घोड़ा, जिसे वे घोड़ा नहीं, सितारा कहते हैं, ले लिया| वास्तविकता में ऐसा होना लगभग असंभव है कि एक गाँव का प्रधान अपने क्षेत्र के विधायक से शक्ति प्रदर्शन में बाजी जीत ले जाए, क्योंकि राजनीति में जितनी बड़ी कुर्सी उतनी बड़ी शक्ति| इसी तरह इस सीज़न में ऐसा दिखाना कि सांसद महोदय भी विधायक के सामने खुलकर अकड़ने से कतराते हैं, भी वास्तविकता से दूर लगता है|
पंचायत कुछ बातें चुपचाप कर रही है, बिना नारेबाजी के| वह मसले अपरोक्ष रूप से उठाती है लेकिन दर्शक उन मसलों का दबाव अपने ऊपर महसूस करता है| भले यह सजगता या बात को समझने की प्रक्रिया हर दर्शक के साथ अलग समय पर घटती हो|
स्त्री विमर्श को नारेबाजी से अलग कर श्रंखला यह तो दिखाती है कि फुलेरा गाँव में हरेक वर्ग में पत्नी रुपी स्त्री का सामाजिक स्थान पति से निम्न ही है, भले घर में स्त्री की ही बात पति से ऊपर रहती हो| श्रंखला मंजू देवी (नीना गुप्ता) और क्रांति देवी (सुनीता राजवार) अपनी मर्जी से घर से बाहर की घटनाओं में भी सक्रियता दिखाती हैं और अपने आप ही कदम उठाती हैं, अपने-अपने पति के जाने बिना ही| उन दोनों पुरुषों को इन स्त्री उम्मीदवारों के उठाये क़दमों के परिणाम ही दिखाई देते हैं|
वोट की राजनीति में सदैव एक तर्क दिया जाता है कि जनता को दो या ज्यादा उम्मीदवारों में से सबसे कम बुरे उम्मीदवार को चुनना पड़ता है| आदर्श रूप से अच्छा उम्मीदवार वोट आधारित राजनीति में अपवाद स्वरूप ही सामने आता है|
पंचायत भी फुलेरा गाँव के चुनाव के नाते गाव के वासियों और कार्यक्रम के माध्यम से दर्शकों के सामने दो विकल्प रखती है| एक ओर मंजू देवी हैं, जिनके पति पूर्व प्रधान रह चुके हैं, यह गुट गाँव के काम करने में सुस्त हो सकता है, लेकिन ये गाँव में किसी का बुरा हो ऐसा कोई काम नहीं करते, न जीतने के लिए ऐसी तिकड़म भिड़ाते हैं कि किसी की हानि करके ऐसा करना पड़े| इस गुट को अपनी जीत फिर से चाहिए लेकिन ऐसा करने के लिए वे विरोधी दल पर झूठे आरोप लगा उनकी छवि बिगाड़ने के काम में नहीं लगे हैं|
दूसरी ओर हाँ क्रान्ति देवी, जो अपने पति के साथ मिलकर मंजू देवी और उनके पति के विरुद्ध किसी भी स्तर की साजिश रच सकती हैं| पति-पत्नी दोनों को कैसा भी झूठ बोलने में कोई संकोच नहीं| पूर्व विधायक के सक्रिय सहयोग से वे गाँव में गड़बड़ी फैलाने की कारगुजारियां दिखाते ही रहते हैं| गाँव में बिजली की समस्या प्रधान जी का गुट ठीक न करवा पाए इसके लिए वे खूब साजिश करते हैं| उन्हें वर्तमान प्रधान को हर मोर्चे पर निजी रूप से नीचा दिखाकर अपने को ऊपर उठाना है|
बहुत से लोग फुलेरा के दो राजनीतिक गुटों के मध्य जातिगत अंतर ढूंढते हैं लेकिन श्रंखला में चुनावी भिड़ंत मंजू देवी+ बृज भूषण दूबे गुट और क्रान्ति देवी + भूषण शर्मा गुट के बीच है| अब दूबे बनाम शर्मा में जातिगत अंतर खोजने वाले को खासा श्रम करना पड़ेगा|
पंचायत सांसद महोदय की सक्रियता से ऐसा माहौल बनाती है कि अब तो वर्तमान प्रधान मंजू देवी की जीत एक औपचारिकता भर है, लेकिन श्रंखला कुछ अनपेक्षित मोड़ ले लेती है ताकि अगले सीज़न में कुछ नए तत्व जोड़े जा सकें और दर्शकों को सब कुछ एक ही परिपाटी पर चलता हुआ चिर परिचित माहौल ही न मिले जहाँ वे श्वेत एवं श्याम वर्णों में चरित्रों को बाँट कर उनके साथ अपनी पसंदगी या नापसंदगी जोड़ सकें|
इस सीज़न में फुलेरा गाँव में अल्पावास हेतु एक चरित्र का आगमन होता है| मंजू देवी के पिताजी (रामगोपाल बजाज) फुलेरा में फिल्मों के आइटम गीतों की तरह विशिष्ट उपस्थिति दर्शाते हुए प्रकट होते हैं |
वे राजनीति में आदर्शवाद में आस्था के प्रतीक हैं| ग्राम पंचायत सचिव भले उनकी अपनी बेटी के पक्ष के हैं लेकिन वे सचिव से कहते हैं,”आप तो सरकारी पद पर हैं, आपको तो निष्पक्ष रहना चाहए|”
उन्हीं का दर्शन है कि उनकी बेटी और दामाद को अपने घर और आस पड़ोस पर विकास की रोशनी ज्यादा डालने के बजाय गाँव के अन्य क्षेत्रों को विकसित करने के प्रयास ज्यादा करने चाहिए थे| इस काम में कोताही बरतना ही उनकी नज़रों में सत्ता पक्ष के विरोध में माहौल बनाता है, जो कि बनना एकदम न्यायोचित होगा|
मंजू देवी के पिता के माध्यम से पंचायत इस गुट की ग्राम विकास हेतु निष्ठा को कसौटी पर जांचती है और उन्हें कमजोर पाता दिखाती है और अपरोक्ष रूप से संकेत भी देती है कि सत्तावर्ग को जनता को हल्के में नहीं लेना चाहिए और अपने द्वारा किये वादों को पूरा करने का प्रयास पूरी निष्ठा से करना चाहिए|
राजनीति में ऐसी कसौटियां रखने वाले लोग भारत में सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं और दलगत राजनीति में आकंठ डूबी और विभाजित इन्हें सनकी और पुरातन काल का व्यक्ति ही मानेगी, जो असंभव की कल्पना में जीते हैं|
सीज़न 3 में अगर प्रहलाद के जिम्मे एक भारी संवाद आया था – वक्त्त से पहले कोई नहीं जाएगा, कोई नहीं मतलब कोई नहीं, तो इस बार विनोद/बिनोद के पाले में श्रंखला का सबसे प्रभावशाली संवाद आता है- प्रधान जी, हम गरीब जरुर हैं पर गद्दार नहीं|
अब तक छोटी छोटी हास्य बिखरने वाली पंक्तियाँ बोल अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्शाते विनोद/बिनोद (अशोक पाठक) इस वजनदार संवाद को भरपूर शिद्दत से अभिनीत करते हुए बोलते हैं|
पंचायत 4 में राजनीतिक माहौल वाले भागों में इस सीज़न का सबसे कमजोर सीक्वेंस है –
बृजभूषण दूबे+सचिव+प्रहलाद+विकास की चौकड़ी की सांसद के आवास पर उपस्थिति के दौरान ही पूर्व विधायक का वहां पहुंचना और सांसद द्वारा इन चारों को कार में छिपाना, और इधर उधर की बातें करने के बाद मामले को खींचते हुए पूर्व विधायक द्वारा इत्र की गंध के आधार पर इन लोगों को कार में ढूंढ निकलना| यह जबरदस्ती का सीक्वेंस था जिसे अन्य बेहतर तरीकों से गढ़ा जा सकता था|
पूर्व विधायक के अहं को लगी चोट को क्रान्तिदेवी और भूषण शर्मा गुट के जीत के जुलूस में पूर्व- विधायक द्वारा हर्षोल्लास के साथ किये गये नृत्य के माध्यम से दिखाया गया है| एक छोटे से गाँव के प्रधान के चुनाव में एक पूर्व विधायक का सक्रियता से भाग लेना, और अपने पक्ष के उम्मीदवार की जीत की खुशी में निकले जुलूस में नाचते हुए गाँव में आना, बताता है कि पूर्व विधायक को कितनी गहरी चोट लगी हैऔर अब इस जीत के बहाने उसे अपनी शक्ति दिखाने का अवसर मिला है| अभिनेता पंकज झा ने इस श्रंखला में अपने अभिनय से अपने द्वारा निभाये चरित्र को प्रमुख बना दिया है|
राजनीतिक परिवारों के लोगों में कैसे अपने माता-पिता या अन्य अग्रजों के राजनीतिक महत्त्व के कारण, अहं भरता जाता है इसे भी यह सीज़न एक हलवाई की दुकान पर रिंकी और पूर्व विधायक की बेटी के आपसी टकराव के रूप में दिखाता है|
राजनीति में क्रिकेट मैच की तरह चुनावों में कभी कभी अनपेक्षित परिणाम भी मिल जाते हैं , हालांकि जैसे मैच के दौरान ही इस झलक मिलनी शुरू हो जाती है कि अगर ऐसा ही चला तो हार भी हो सकती है उसी तरह सत्ता पक्ष को भी वोट से पहले, चुनावी अभियान की तैयारी के समय ही चेतावनी की झलकियाँ मिलनी शुरू हो जाती हैं कि मतदाता बदलाव भी ला सकते हैं|
…[राकेश]
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