उपन्यास में एक सहूलियत होती है कि लेखक घटनाओं को विस्तार दे सकता है, इधर उधर की व्याख्या या वर्णन कर जो दर्शाना है उसे ज्यादा गहराई और विस्तार से पाठक को समझा सकता है| एक कहानी जैसी कहानी तो इसमें भी होती है लेकिन एक कहानी की तरह उपन्यास सीमित नहीं रहता, बल्कि दस दिशाओं में इसकी भुजाएं एक ऑक्टोपस की तरह फ़ैल सकती हैं|
पंचायत जैसी वैब-श्रंखलायें भी उपन्यास सरीखी हैं, बल्कि उससे भी ज्यादा बड़े विशाल शरीर वाली हैं| चूंकि ऐसी वैब-सीरीज़ के भाग अलग-अलग समय पर निर्मित और प्रसारित होते हैं अतः इनकी कथा, पहले न सोचे गए मोड़ों को ग्रहण कर सकती है, पहले अज्ञात रही मंजिलों की ओर की यात्रा आरम्भ कर सकती है|
पंचायत के एक रोचक चरित्र प्रहलाद के ऊपर लिखी कहानी, पिछले सीज़न में उसके दुःख के साथ समाप्त हो जाती और पाठक के पास उसका दुःख रह जाता| लेकिन जीवन और जीवन पर आधारित उपन्यासों में ऐसे चरित्र की गाथा आगे बढ़ेगी, क्योंकि उसने आगे जीना ठाना है और जीवन किसी भी व्यक्ति के प्रति अपनी निरपेक्षता और निर्ममता की कसौटियों की धार कम नहीं करता है|


…[राकेश]
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