दुखांत न भी हों लेकिन दुःख भरे मार्गों से गुजरने वाली प्रेम कहानियों पर आधारित महत्वपूर्ण हिन्दी फ़िल्में हर दशक में 2-3 के औसत से बनती ही आ रही हैं| कभी लता मंगेशकर के आयेगा आने वाला गीत (महल) को देख सुनकर दर्शक रात रत भर परेशान रहते थे, फिर मुकेश और शमशाद बेग़म आ गए उन्हें तड़पाते हुए – धरती को आकाश पुकारे (मेला), परदे पर मुकेश की आवाज़ में राज कपूर अगर गाते दिखाई देंगे – हम तुझसे मोहब्बत करके सनम रोते भी रहे हँसते भी रहे तो युवाओं पर असर होने से कौन रोक पायेगा| मंजिल. शराबी, मधुमती, आखिरी ख़त, आराधना, बॉबी, जूली, मिली, लव स्टोरी, एक दूजे के लिए, चित्तचोर, नदिया के पार, घर, अंखियों के झरोखों से, सदमा, चांदनी, आशिकी, क़यामत से क़यामत तक, मैंने प्यार किया, हम आपके हैं कौन, रंगीला, दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे, कहो न प्यार है और रॉकस्टार आदि बहुत सी फ़िल्में ऐसी बनीं जहाँ प्रेम कहानियों में दुःख का समावेश था और जिन्होंने दर्शकों के बीच गहरी जगह बनाई|

प्रेमी युगल में किसी एक को किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित दिखाने वाली फिल्मों में मिली, अंखियों के झरोखों से, सदमा, रॉकस्टार, दिल बेचारा और अब नयी बनी सैयारा आदि फ़िल्में दर्शाको के बीच खासी सफल रही हैं| जैसे तब लाइलाज बीमारी से ग्रसित होते हुए भी नायिका को अपनी ही फिल्म आनंद की राह पर न भेज, निर्देशक हृषिकेश मुकर्जी ने मिली में नायक को नायिका को विवाह के तुरंत बाद विदेश ले जाते हुए दिखा कर आशा की एक किरण झलकाकर फिल्म को समाप्त किया और दर्शकों को इस संभावना के साथ फिल्म ने विदा कहा कि शायद मिली ठीक हो ही जाए| वैसे ही आशाजनक नोट के साथ सैयारा भी अपने प्रदर्शन पर पर्दा गिराती है कि शायद विवाह करने के बाद प्रेमी से पति बने नायक के प्रेम से नायिका की मेडिकल स्थिति में सुधार होगा या कम से कम उसकी बीमारी के स्थिति गंभीर होने की गति धीमी पड़ेगी|

नए कलाकारों के साथ युवा प्रेम कहानियां प्रभावशाली बन जाती हैं अगर युवा अभिनेता अभिनय भी अच्छा कर जाएं| सैयारा में नवोदित कलाकार अहान पांडे और अनीत पड्डा, मजबूत अभिनय कर गये हैं दोनों को लम्बे-लम्बे मोनोलॉग्स भी मिले जिन्हें उन्होंने सफलतापूर्वक प्रदर्शित कर दिया| उनके दृश्य भी लम्बे हैं और उसमें निरंतर एक स्तर बनाये रखते हुए अभिनय कर दिखाना उनकी बड़ी उपलब्धि है| उनकी भावनाएं और आंसू असल लगते हैं क्योंकि लम्बे दृश्यों में निरंतरता की प्रक्रिया से चलकर वे उनकी आँखों से नीचे ढलकते हैं और छोटे छोटे दृश्यों में ग्लिसरीन की सहायता से झलकाये आंसू नहीं लगते|

रनबीर कपूर जैसी संवाद अदायगी और रणवीर सिंह जैसी शारीरिक उपस्थिति के मिश्रण जैसे लगते अहान पांडे, कुंठा और गुस्से से जूझते हुए अपने चरित्र – कृष के रूप में पास आकर खड़ी हुयी वाणी (अनीत पड्डा) से कहते हैं – हेल्प मी, तो एक स्वतंत्र अभिनेता का जन्म सिनेमा के परदे पर हो जाता है, जिसमें बड़ी संभावनाएं दिखाई देती हैं, जिनके भरोसे निर्देशक और लेखक लोग अपनी कहानियां दिखाने का उत्साह दिखा सकते हैं|

अनीत पड्डा के जिम्मे ऐसा चरित्र आया था जो वर्तमान की लड़कियों से या कम से कम जैसा उन्हें सिनेमा के परदे पर दिखाया जाता है, उन सबसे अलग दिखाई दे| मैं रात में देर तक काम नहीं कर सकती, साढ़े आठ बजे तक मुझे घर पहुँच जाना है, मैं पैसिव स्मोकिंग नहीं कर सकती, कृपया मुझे दूर रहकर स्मोकिंग कीजिये, मुझे ऐसी भाषा पसंद नहीं तो क्या आप अपनी गाली गलौज की भाषा पर थोडा संयम रख सकते हैं जब हम साथ में काम कर रहे हों? आजकल विषम समझे जाने वाले ऐसे संवाद को अनीत अपने चरित्र की मासूमियत लेकिन दृढ़ता को ओढ़कर कहती हैं तो वे विश्वसनीय चरित्र लगती हैं| नवोदित अभिनेत्री के तौर पर उनमें कोई हिचक दिखाई नहीं देती और यह खुलापन और आत्मविश्वास से भरपूर अभिनय दर्शाता है कि उनके सामने संभावनाओं का आसमान फैला पड़ा है|

अपनी माँ को मृत्यु के हाथों खो देने वाले कृष का परिवार, जिसमें वह और उसके पिता ही हैं, बिखर चुका है और वह अगर अनाथ ही होता तो संगीत में इतनी बड़ी प्रतिभा का स्वामी होने के कारण अपने व्यक्तित्व को सँवारे रहता लेकिन पिता का उस रूप में होना जिस रूप में वे जी रहे हैं, उसके लिए बहुत बड़े तनाव का कारण है इसलिए उसके अपने व्यक्तित्व में कई प्रकार के गांठें समा चुकी हैं| वह सामान्य व्यक्तित्व नहीं बचा है| वह नए ज़माने का गुस्सैल है जो निजी कारणों से कुंठित है|

एन शादी के दिन ठुकराई जाने वाली वाणी इस सदमे से ग्रसित व्यक्तित्व को साथ लिए घूम रही है| मानसिक सदमे से उपजे तनाव को वह सहन कर पाने में असमर्थ है|

ऐसी परिस्थितियों में कृष और वाणी आपस में मिलते हैं और धीरे-धीरे दिल को दिल से राह मिलती है| उनकी नवजात प्रेमकथा में शुरू में ही भूकंप आकर प्रेम की नींव ही हिला डालता है|

अब जो सामान्य है उस प्रेमी के चारित्रिक गठन, प्रेम में उसके विश्वास और उसके सपनों के बीच की जंग है| नए ज़माने का दस्तूर कहता है और उसके यार दोस्त और पिता भी कहते हैं कि उसे अपने सपनों के पीछे दौड़ना चाहिए क्योंकि वे उसके करीब सफलता को लाये जा रहे हैं| प्रेमी को एहसास है कि बहुत बड़ी सफलताएँ सामने देख कर भी वह अन्दर से खुश नहीं क्योंकि जिससे उसे प्रेम है अगर वह साथ नहीं है तो यह सब बाहरी उपलब्धियां बेमानी हैं|

फ़िल्म के अंतिम 15-20 मिनट अगर और कुशलता से संभाले जाते तो यह फिल्म और बेहतर बनती| फ़िल्म कायदे से वहीं समाप्त हो जाती है जहाँ वाणी को खोने के डेढ़ दो साल बाद लन्दन में उसे सामने स्क्रीन पर भारत से लिए गए फुटेज में वह उसे दिखाई दे जाती है| वहां न भी समाप्त करते तो जहाँ आश्रम में बाहर बैंच पर बैठी वाणी उसकी ओर देखकर कहती है ,” मैं वाणी हूँ, और आप?”

कृष की प्रतिक्रिया एक शानदार मोड़ था फिल्म समाप्त करने का| ऐसे ही मोड़ों के लिए मनोज कुमार ने अपनी फिल्म शोर में संतोष आनंद से अमर गीत लिखवाया था –

एक प्यार का नगमा है …. कुछ पाकर खोना है कुछ खोकर पाना है,,, जीवन का मतलब तो आना और जाना है … ज़िंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है —

उसके बाद उसकी बीमारी से जूझ कर उसे कृष के बारे में याद दिलाने के उपक्रम जबरन प्रयास भर लगते हैं, बाकी सभी कुछ दर्शकों के ऊपर छोड़ देना चाहिए था| ए फिल्म बाय मोहित सूरी लिखा दिखाने के बाद की घटनाएं मोंटाज रूप में तब भी काम कर जातीं|

नायक नायिका के अलावा जो अन्य चरित्रों के दृश्य उभर कर आते हैं उसमें वाणी के माता-पिता के दृश्य हैं| वाणी की माँ के अपनी बेटी के प्रति स्नेह, उसे लेकर उनके अन्दर बसे भय और उसके पुराने सदमे को देख नए संबंध के प्रति उठती आशंकाओं को गीता अग्रवाल शर्मा ने प्रभावशाली ढंग से निभाया है|

अस्पताल में कृष को चेताने का दृश्य हो या बाद में सारी स्थितियां समझ कर उन्हें स्वीकारने के बाद का दृश्य हो जहाँ वे अपनी बेटी वाणी को कृष के साथ अलीबाग भेज रही हैं, गीता अग्रवाल शर्मा ने शानदार अभिनय प्रदर्शन किया है| वाणी को दही खिलाकर जब वे कृष के पास आती हैं तो उनकी आँखों में स्नेह और कृतज्ञता के भाव देखने लायक हैं, दही के लिए पहले बायाँ और फिर दायाँ हाथ आगे बढ़ाने वाले कृष की अनगढ़ता भांप कर वे जिस अधिकार और स्नेह से उसके हाथ पर चपत लगाकर उसे चम्मच से दही खिलाती हैं वह दर्शनीय है| इस पूरे सीक्वेंस के लिए मोहित सूरी भी साधुवाद के पात्र हैं, मिनट भर में ही उन्होंने कृष के जीवन में माँ के अभाव के सारे असर को दिखा दिया है|

पुरुष व्यवहारिक स्थिति को जल्दी समझ लेता है और बेटी को घर छोड़ने आये कृष को देख कर ही सारी बातें समझ लेने वाले पिता के रूप में मौन रहकर भी आँखों के भावों से राजेश कुमार ने सटीक अभिनय किया है| साराभाई धारावाहिक में चंचल, और माता पर अत्याधिक निर्भर रोसेश के रूप में उन्हें देखने के बाद हाल में गंभीर और संवेदनशील पारिवारिक भूमिकाओं में उन्हें देखना सुखद है|

नायक संगीतकार है लेकिन फिल्म का कोई भी गीत याद नहीं रह पाता यह संगीत पक्ष के कमजोर होने का परिचायक है| कुमार गौरव की दूसरी फिल्म – तेरी कसम में उन्होंने एक गायक की भूमिका निभाई और आर डी बर्मन ने ऐसे गीत बनाए जो अभी पहली बार सुन रहे श्रोता को लुभाने की क्षमता रखते हैं| प्रेम कहाने पर बनी हिंदी फिल्म में संगीत पक्ष को मजबूत होना ही पड़ता है| मोहित सूरी की सारी फिल्मों में सबसे कमजोर संगीत इसी फिल्म का है|

रोहन शंकर के संवाद भी फिल्म की एक अन्य उपलब्धि हैं और विकास शिवरमन का छायांकन बेहद आकर्षक है| संपादन में रोहित मकवाना और देवेन्द्र मुर्देश्वर की कुशलता दिखाई देती है|

सैयारा ऐसी फिल्म तो अवश्य ही है जो अपने आप में योग्य लगती है और दर्शक में ऐसी चाह नहीं जगाती कि इससे संतुष्टि नहीं मिली, अब जल्दी (अगर अभी तक नहीं देखी) से, जिस कोरियन फिल्म – A Moment to remember, से प्रेरित इसे बताया जा रहा है, उसे देखा जाए| उसे देखने के बाद इसे देखना या इसे देखने के बाद उसे देखना, इसके असर को कम नहीं करता, यही एक बेहतर रीमेक की कसौटी होती है|

…[राकेश]


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