
पचास और साठ के दशक का हिंदी सिनेमा भी नेहरु के विशाल व्यक्तित्व के प्रभाव से अछूता नहीं रहा और हिंदी फिल्मों के नायकों का चरित्र भारत को लेकर नेहरुवियन दृष्टिकोण से प्रभावित रहा और उसमें चारित्रिक आदर्श की मात्रा डाली जाती रही।
उन सालों में भारतीय लोगों और बच्चों में प. नेहरु के लिये कितना आकर्षण था इस बात को भी अब दिल्ली दूर नहीं (1957) और नौनिहाल (1967) फिल्म में दिखाया गया है।
नौनिहाल में तो प. नेहरु की मृत्यु के बाद उनकी शवयात्रा पर उमड़े जन-सैलाब की असली फुटेज इस्तेमाल की गयी थी। गाँधी की मृत्यु के बाद नेहरु की मौत पर ही इतना व्यापक जन समूह जुटा था और शोक की ऐसी विश्वव्यापी लहर उठी थी।
बी आर चोपड़ा ने नया दौर बनाई और फ़िल्म सेंसर बोर्ड में स्वीकृति के लिए पहुँची तो पंडित नेहरु तक सूचना इस रूप में पहुँची कि एक हिन्दी फ़िल्म निर्माता निर्देशक ने आधुनिक विकास एवं मशीनीकरण के विरोध में फ़िल्म बनाई है तो पंडित नेहरु ने अपने मंत्रीमंडल के सदस्य लाल बहादुर शास्त्री को फ़िल्म देखने और अपनी राय व निष्कर्ष से अवगत कराने के लिए कहा|
1948 की 30 जनवरी को गाँधी की हत्या के बाद भारत के लिये प. नेहरु का चले जाना बहुत बड़ा आघात था। गाँधी के बाद सरदार पटेल भी जल्दी ही धरा छोड़ गये और बहुत सारे अन्य स्वतंत्रता सेनानी भी पचास के दशक में जीवन का त्याग कर गये परंतु देश में नेहरु की उपस्थिति ने एक आशामायी मोर्चा संभाला हुआ था। वे निरंतर भारत को लोकतांत्रिक, आधुनिक, प्रगतिवादी, और स्वावलम्बी बनाने की ओर प्रयासरत थे और उनके द्वारा निर्मित की गयी नीवों पर बाद में विशाल इमारतें खड़ी हो गयीं और आज बहुत सारे क्षेत्रों में भारत समर्थ दिखायी देता है तो उसका बहुत सारा श्रेय प. नेहरु की दूरदृष्टि को भी जाता है।
जब एक बहुत बड़े कद का नेता सक्रिय राजनीति के कारण प्रशासन में सीधे सीधे बड़ा पद ग्रहण करता है तो स्वाभाविक रुप से उसके चारों तरफ उसके विरोधी भी उत्पन्न हो जायेंगे। प. नेहरु भी इस प्रतिक्रिया से अछूते नहीं रहे। उनके प्रधानमंत्री बनते ही उनके विरोधी गुट भी सक्रिय हो गये थे। लोकतंत्र में ऐसा होना भी चाहिये। पर जैसा विश्वास भारत की जनता को प. नेहरु पर था वैसा किसी अन्य प्रधानमंत्री पर कभी नहीं बन पाया। कश्मीर और चीन के भारत पर आक्रमण के मुद्दे को लेकर बहुत सारे लोग और संगठन नेहरु को हमेशा से ही निशाना बनाते रहे हैं और कई बार तो इन मुद्दों को लेकर कुछ अतिवादी संगठन हद पार करके असंसदीय और अलोकतांत्रिक किस्म की बातें नेहरु के बारे में फैलाते रहे हैं। लघु काल के लिये ऐसे दुष्प्रचार सफलता पाते भी दिखायी दे सकते हैं पर भारत प. नेहरु से दूर नहीं जा सकता। प. नेहरु का न तो व्यक्तित्व ही इतना हल्का था और न ही उनका दृष्टिकोण इतना छोटा था कि उनकी प्रासंगिकता भारत से खत्म हो जाये।
आज जब चारों तरफ आदिवासी इलाके जल रहे हैं तब भी नेहरु की नीति की याद हो आती है। उनके जैसा प्रधानमंत्री भारत में 90 के दशक में होता, जबकि भारत आर्थिक, साम्प्रदायिक और जातीय आधार पर उथल-पुथल से गुजरकर लड़खड़ा रहा था, तो भारत में एकता और अखण्डता इस तरह से विखण्डित न नज़र आती जैसी कि आज के दौर में नज़र आ रही है।
आज भारत में बहुत कुछ जो विकसित हुआ है और बहुत कुछ जो अच्छा दिखायी देता है, उसमें बहुत बड़ा योगदान प्रथम प्रधानमंत्री नेहरु के प्रगतिवादी दृष्टिकोण का भी है। प्रशासन चला रहा व्यक्ति कुछ ऐसे निर्णय भी लेगा जो शायद उतने लाभकारी न सिद्ध हो पायें जितने कि लोगों ने सोच रखे थे और फिर नेहरु जैसे बड़े नेताओं से लोगों की अपेक्षायें भी साधारण नहीं रहतीं। पूर्वज फिर पूर्वज ही होता है| स्वस्थ विश्लेषण सदैव लाभकारी सिद्ध होता है और प्रगति में सहायक बनता है लेकिन व्यर्थ की आलोचना से कभी किसी का कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो पाया|
किसी भी कोण से और किसी भी कसौटी पर रखकर, मगर ईमानदारी और निष्पक्षता से, परखा जाये, प. नेहरु भारत के एक बेहतरीन प्रधानमंत्री रहे हैं। वे भारत के इतिहास के एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति बन चुके हैं। उन्होंने अपने काल के समक्ष आयी समस्याओं से निबटने के आधार पर निर्णय लिए|
पंडित नेहरु द्वारा किये गये कार्यों से लोकतांत्रिक भारत को जो लाभ पहुँचे हैं उनके लिये देश सदैव उन्हें नमन करता रहेगा|
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