When Osho left his physical body on January 19, 1990, having lived for 58 years, 1 month, and 8 days, many might have thought this marked the end of a spiritual leader known for his playful nature. Some believed his... Continue Reading →
अध्याय 2- चलो दिल्ली ------------------------- शिल्पी, प्रोफ़ेसर मयंक के घर उनके स्टडी रूम में बैठी है| चारों ओर रैक्स में किताबें करीने से सजी हुयी हैं| शिल्पी के सामने एक छोटी गोल मेज पर पानी से भरा जग, एक कांच... Continue Reading →
बाबाजी तुम ब्रह्मचारीतुम्हारी सोच के अनुसारऔरत नरक का द्वार। लेकिनमैं तो ब्रह्मचारी नहींदिखने में भीढ़ोंगी- पुजारी नहींमेरे लिये तोहर औरत खूबसूरत हैबशर्ते यह किवह औरत हो। तुमने जिसे नकाराधिक्काराऔर अस्पर्श्य विचारा हैउसके आगे मैंने तोसमूचा जीवन हारा है। मेरी दृष्टि... Continue Reading →
काशी सध नहीं रहीचलो कबीरा!मगहर साधें सौदा-सुलुफ कर लिया हो तोउठकर अपनीगठरी बांधेइस बस्ती के बाशिंदे हमलेकिन सबके सब अनिवासी,फिर चाहे राजे-रानी हों-या हो कोई दासी,कै दिन की लकड़़ी की हांडी?क्यों कर इसमें खिचड़ी रांधे? राजे बेईमानवजीरा बेपेंदी के लोटे,छाये... Continue Reading →
“दुःख तोड़ता भी है, पर जब नहीं तोड़ता या तोड़ पाता, तब व्यक्ति को मुक्त करता है” (अज्ञेय के विलक्षण उपन्यास “नदी के द्वीप” की दो में से एक नायिका का कथन) दुःख एक नितांत निजी मसला है मनुष्य के... Continue Reading →
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