बात बहुत पुरानी नहीं है। वक्त केथोड़े ही वक्फे भूत हुए होंगे जब डंकी लोग, अर्थात गर्दभ/गधे इस बार मनुष्य के साथ आर पार की लड़ाई करने के मूड में आ गये और सारे गधों को गाँव के बाहर एक खाली मैदान में इकटठा होने का संदेश पहुँचा दिया गया। सारे गधे मैदान में पहुँच भी गये। गधों के तात्कालिक नेता एक बुजुर्ग गधे ने सब गधों से एक स्वर में नारे लगाने को बोला।

गर्दभ एकता जिन्दाबाद

और

” हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है

जैसे नारों से आकाश गूंज उठा और उनके रेंकने ने इतना शोर उत्पन्न किया कि गाँव तो गाँव समीप के शहर तक में घरों की खिड़कियाँ हिल गयी। लोग समझ नहीं पाये कि एकाएक ऐसा शोर क्यों और कहाँ से आया है? पहले पहल तो उन्हें लगा कि कहीं भूकंप न आ गया हो और वे अपने घरों से निकल बाहर सड़कों पर आ गए|

आवाजों का शोर इतना ज्यादा था कि कुछ को लगा कि हो न हो किसी दुश्मन पड़ोसी मुल्क ने अपने देश पर आक्रमण कर दिया है और यह गर्जना असल में उसके फाइटर जेटों की आवाज है, पर आकाश में देखा तो दूर दूर तक पक्षियों के अलावा किसी यात्री हवाई जहाज के भी चिह्न तक न दिखाई दिए| नेताओं और उद्योगपतियों को हवा में इधर से उधर ले जाने वाले छोटे विमान और हेलीकॉप्टर जैसे उड़न वाहन आकाश से गायब थे| इन्सान साझ नहीं पाए कि ये शोर कहाँ से आया?

थकहार कर सब अपने घरों में वापिस चले गये कि अब तो सबसे तेज सबसे पहले वाले चैनल ही बताएँगे इस शोर के पीछे का भेद! या हो सकता है टीवी मीडिया छोड़ वैकल्पिक मीडिया बन गए पूर्व पत्रकार और अब के सोशल मीडिया चैम्पियंस ही इस रहस्य से पर्दा उठा दें!

उधर गधों की सभा की अध्यक्षता कर रहे बुजुर्ग गधे ने घोषणा की कि जिस भी गधे को मनुष्य के विरोध में अपना दुखड़ा सुनाना हो वे आगे आकर एक से दो मिनट के बीच अपनी बात रख सकते हैं।

ज्यादातर गधों ने मनुष्यों के उनके प्रति निर्मम व्यवहार का ऐसा सजीव वर्णन किया कि न केवल बोलने वाले बल्कि सुनने वाले गधों की आँखें भी भीग गयीं। सबने मनुष्य के क्रूर व्यवहार के प्रति विद्रोह करने का फैसला सर्वसम्मति से पारित कर दिया|

गधों का पहला असहयोग आन्दोलन अस्तित्व में आ गया था|

बुजुर्ग नेता ने सभी गधों से इस फैसले के समर्थन में आगे आकर जमीन पर लोट पोट होकर शपथ लेने का आह्वान किया कि अब से वे भूखों मर जायेंगें पर मनुष्य का काम तब तक नहीं करेंगे जब तक कि वे उनके साथ हमदर्दी का बर्ताव करना शुरु नहीं करते।

आखिरकार मनुष्य का सबसे ज्यादा काम वे ही करते हैं पर तब भी मनुष्य का प्यार पालतू कुत्तों, घोड़ों और पक्षियों को मिलता है और गधों के साथ न केवल सौतेला बल्कि क्रूरतापूर्ण बर्ताव किया जाता है।

मेरा गधा गधों का लीडर
कहता है के दिल्ली जाकर
सब मांगे अपनी कौम की मैं
मनवा कर आऊंगा
नहीं तो घास न खाऊंगा
नहीं तो घास न खाऊंगा
मेरा गधा गधों का लीडर

सबसे पहली मांग हमारी
धोभी राज़ हटा दो
अब न सहेंगे डंडा चाहे
फांसी पर लटका दो
अगर न मानी सरकार
किया इंकार तो

यू एन ओ तक जाऊंगा

दूजी मांग के जात हमारी
मेहनत करने वाली

फिर क्यों यह इंसान गधे का
नाम समझते गली
न बदला यह दस्तूर
तो हो मजबूर
मैं इन पर केस चलाऊँगा

तीजी मांग हमारी हुमको
देदो एक एक क्वार्टर
तीजी मांग हमारी हुमको
देदो एक एक क्वार्टर
हफ्ते में एक बार घास के
बदले मिले टमाटर
अगर कर दो यह एहसान
ओ मेरी जान दुआए देता जाउँगा
कभी न दिल्ली आऊँगा
मेरा गधा गधों का लीडर
कहता है के दिल्ली जाकर
सब मांगे अपनी कौम की मैं
मनवा कर आऊंगा
नहीं तो घास न खाऊंगा
मेरा गधा गधों का लीडर

सिर्फ एक गधे को छोड़ कर सभी गधों ने शपथ ले ली। कुछ गधे तो भावातिरेक से इतने भर गये कि उन्होने इस अंदाज में जमीन पर लोट लगायी कि चारों तरफ धूल के बादल छा गये|

धूल के इस बवंडर ने घरों में बैठे मनुष्यों के सामने अलग उलझन उत्पन्न कर दी कि कहीं पड़ोसी दुश्मन देश की सेना पैदल ही तो उनके शहर तक नहीं आ पहुँची, पर नियमित मीडिया और सोशल मीडिया दोनों ही जगह से उन्हें कोई संकेत नहीं मिल रहा था उन्होंने माँ लिया कि यह किसी स्थानीय दैवीय प्रकोप के कारण हुआ है और अवश्य ही वहां के निवासियों में से किसी व्यक्ति या किन्ही लोगों से पाप जैसी कोई भयानक भूल हुई है जिसके कारण रुष्ट होकर प्राकृतिक शक्तियां उन्हें दंड देने स्वयं जाग्रत हो चली हैं| सब अपने अपने मत अनुसार प्रार्थना आदि में जुट गए|

उधर गर्दभ सम्मेलन में बुजुर्ग गधे ने शपथ न लेने वाले नौजवान गधे से पूछा कि वह शपथ लेने आगे क्यों नहीं आया?

नौजवान गधे ने थोड़ा शर्माते हुये कहा कि यूँ तो उसकी हालत कुछ अलग नहीं है और सब गधों से परन्तु उसका भविष्य मनुष्य जाति के साथ रहने के कारण बहुत अच्छा होने वाला है।

सारे गधे उसकी बात सुनकर आश्चर्यचकित रह गये।

उन्होने उसे अपनी बात विस्तार से बताने को कहा और पूछा कि उसके आशावाद का कारण क्या है?

नौजवान गधे ने कहा कि कुछ साल पहले तक तो उसका मालिक एक गरीब आदमी था परन्तु कुछ समय पहले समय ने ऐसा चक्र घुमाया कि लोगों ने उसकी पत्नी को गाँव का प्रधान बना दिया। पद एक खास जाति की महिला के लिये आरक्षित हो गया था और मेरे मालिक की पत्नी ही ऐसी थी जो अपनी बिरादरी की महिलाओं से ज्यादा पढ़ी लिखी थी। पत्नी के प्रधान बन जाने के बाद मेरे मालिक ने ही प्रशासन चलाना शुरु कर दिया और जम कर धन कमाया पिछले कुछ सालों में। जब मेरे मालिक के दिन फिर सकते हैं तो भाग्य पर भरोसा क्यों न किया जाये?

बुजुर्ग गधे ने उसकी तरफ प्रश्नात्मक दृष्टि से देखते हुये पूछा कि परन्तु उसके मालिक के धनी होने से उसके अच्छे भविष्य का क्या संबंध है?

नौजवान गधे के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आ गयी और उसने बमुश्किल खुशी से चेहरे पर आ जाने वाली हँसी को दबाया। उसने बताया कि दरअसल मेरे मालिक की एक लड़की है और मैने अपने मालिक को अक्सर उसे डाँटते हुये पाया है कि यदि वह ऐसे ही भोंदू बनी कर्म करती रही और पढ़ायी लिखायी में ऐसी ही फिसडडी रही तो उसकी शादी किसी गधे से ही करनी पड़ेगी।

युवा गधा साँस लेने के लिये रुका और उसने उत्सुकता से उसी की तरफ देख रहे गधों पर एक दृष्टि दौड़ाई और आगे कहा कि अब उस घर में मैं ही अकेला गधा हूँ। और यह बात तो आप सब भाई लोग जानते ही हो कि मनुष्य सबसे ज्यादा अपने दामाद को सिर पर चढ़ाकर रखता है। अब बताओ कि मेरा फायदा तुम लोगों के साथ हड़ताल करने में है कि अपने भविष्य की चिन्ता करने में?

फिर सोचो कि नगर प्रमुख का दामाद बन कर मैं अपनी बिरादरी का भी कितना फायदा कर सकूँगा!

बुजुर्ग गधे की समझ में नहीं आया कि वह इस गधे के गधेपन को किस रुप में ले?

पता नहीं इन गधों में से कोई कुछ समझा कि नहीं पर पास से तेजी से गुजरती एकमात्र गाड़ी में बज रहे रेडियो से आवाज आ रही थी, 

दिल के बहला लेने को गालिब ये ख्याल अच्छा है

उस गाडी का ड्राइवर अकेला गवाह रहा जिसने इतनी बड़ी संख्या में गंधों को एकत्रित होते देखा, हालांकि वह समझ कुछ नहीं पाया|

…[राकेश]


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