गुलज़ार साब के गीत ऐसे होते हैं जो श्रोता और पाठक की भावनाओं को अपने साथ अपनी इच्छित दिशा में ले जा सकते हैं| गुलज़ार भावनाओं के ट्रैफिक के नियंत्रक कवि हैं| बहुत सी फ़िल्में ऐसी हैं जिनसे वे केवल एक गीतकार की भूमिका में ही जुड़े लेकिन उनके गीतों ने न केवल उन फिल्मों का सार प्रस्तुत कर दिया बल्कि अक्सर तो उन फिल्मों की औसत गुणवत्ता ही ऊपर उठा दी| कुछ ऐसी फ़िल्में भी हैं जोे उनसे जुड़े रहे लोगों ने बनाईं और स्वाभाविक है कि ऐसी फिल्मों के गीत गुलज़ार साब ही लिखते रहे और लिखेंगे| उनके साथ बिताये समय का असर हो या गुलज़ार साब के रचे गीतों का, पर उनसे जुड़े रहे व्यक्तियों की फिल्मों में एक गुलज़ारियन प्रभाव दिखाई देता है, ऐसे मानो गुलज़ार साब ने ही निर्देशन और सम्पूर्ण कलात्मक पक्ष पर अपने नेतृत्व की दृष्टि बनाए रखी हो| कुछ फिल्मों से गुलज़ार गीत हटा दिए जाएँ तो उनके प्रभाव 50% तो एकदम से कम हो जाएँ|
दोस्त तुमने ख़त तो लिखा था
पर दुनिया की मार्फत डाला … (अमृता प्रीतम)
पत्र लिखना मनुष्य की एक बेहतरीन पूंजी और कला हुआ करती थी। पत्र चाहे मित्रों को लिखे जायें या करीबी लोगों को, पत्र लेखन का कोई सानी नहीं है। पत्र चाहे मशहूर लेखक एक दूसरे को लिखें या साधारण मनुष्य अपने करीबी लोगों को लिखें, पत्र लिखना अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन जरिया हुआ करता था।
पत्र केवल व्यक्ति की भावनाओं का ही संप्रेषण नहीं करते बल्कि वे अपने युग के दस्तावेज भी होते हैं। पत्र एक तरह से साहित्यिक अभिव्यक्ति भी होते थे।
एस.टी.डी फोन -> इंटरनेट -> ई-मेल -> पेज़र-> सेलफोन -> एस एम एस आदि की सुविधा के जन्म के साथ ही पत्र लेखन की विधा समाप्त होती चली गयी और पोस्टमैन नामक इंसान को कुरियरमैन ने स्थान्तरित कर दिया।
नेट-चैट जैसी सुविधाओं ने लोगों के लिखने का अंदाज़ ही बदल दिया और शब्द छोटे से छोटे रुप में सुहाने लगे लोगों को। हालत ऐसे हो गये कि गणितीय अंकों ने वर्णमाला के शब्दों में घुसपैठ कर दी। लिखने में लगता समय बचाकर मनुष्य ने उस समय का कौन सा सदुपयोग किया?
एक ग्रामीण युवक ने स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर तक की पढ़ाई कर ली है, वापिस अपने गाँव में घर लौट आया है, जगह जगह नौकरी के लिए आवेदन कर दिए हैं, अब इंतज़ार है नौकरी पाने की सूचना का| खेती उसने की नहीं थी बचपन से कि पढ़कर नौकरी करनी है| उसके साथ के जो साथी अपनी अपनी पढ़ाई किसी स्तर पर छोड़कर अपने पुश्तैनी काम खेती में लग चुके हैं, पढ़े लिखे युवक की दुपहरी और शाम ऐसे पुराने साथियों के साथ कटती हैं, क्योंकि घर पर घरवालों की निगाहें चौबीसों घंटे ऐसे ही सवाल समाकर उसे देखती हैं कि कब तेरी नौकरी लगेगी? बोलने में वाचाल एक दो बुजुर्ग ऐसे भी हो सकते हैं जो सामने पड़ते ही तंज भी कस देते हों कि पढ़ाई लिखाई का क्या लाभ हुआ , इतना पैसा भी खर्च किया अब निठल्ले बैठे हैं, लाट साहब को किसानी भी नहीं आती, इतना भी नहीं कि पशुओं को चारा पानी ही दे दें|
कुछ सच्चे साथी ही सहारा होते हैं ऐसे समय जो उस युवक की तरह ही उसकी नौकरी की सूचना का इंतज़ार किया करते हैं| दुपहरी में उसे अपने आरामगृह में लिटा कर सारे साथी रेडियो पर हिंदी फिल्मों के गीत सुन कर अपने अपने युवा ग़मों को संभाला करते हैं|
और एक दिन उस क्षेत्र का डाकिया उस युवक के नाम की पुकार लगाते आता है हाथों में एक लिफाफा लिए| उसे सारे गाँव का हर हाल पता है| नौकरी युवक की लगी है लेकिन उतना ही प्रसन्न गाँव का डाकिया भी है|
गाँव के एक परिवार की लडकी ने अपनी और अपने घर की क्षमताओं के बराबर या उससे अधिक पढ़ाई कर ली है और अब उसका विवाह होना है| कहीं बातचीत चल रही है और यहाँ लडकी को भी अपना भावी गृहस्थ जीवन अच्छा प्रतीत हो रहा है| लड़के के घर की तरफ से उनके निर्णय के संदेशे का इंतज़ार है, और इंतज़ार के एक एक पल का समय लडकी के भविष्य के सपनों पर ताला लगाए बैठा है, और अंततः डाकिया चिट्ठी लेकर साइकिल बाहर रख घर में घुसता है एक विजेता की तरह|
शादी हो गयी दो युवाओं की, पति को कहीं दूर जाना पड़ जाए, जैसे सैनिक को अपनी नौकरी पर या नई नौकरी पर लगे युवा को अकेले जाना पड़े क्योंकि अभी प्रबंध नहीं हुआ है पत्नी को साथ ले जाने का|
पीछे ससुराल या अपने मायके में रह गयी नव विवाहिता के दिन का हर पल डाकिये के इंतज़ार में बीतता है, चाहे वह किसी काम में व्यस्त हो, कितनी गहरी सखी संग बातचीत में समय बिता रही हो|
पति के हस्तलिखित पत्र का महत्त्व ऐसा हो सकता है कि पाती पाते ही युवती उस लिखे के आनंद में सराबोर होने के लिए पूर्ण एकांत चाहे, आखिर उसे तुरंत उत्तर भी लिखना है और पत्र में लिखे शब्दों से उसके बदलते भावों को सबको दिखाना भी नहीं है|
उधर पति के जीवन में नया रस नई ऊर्जा का समावेश हो जाता है अगर उसे पत्नी की लिखी चिट्ठी नियमित मिलती रहे|
शब्द, चमकीले शब्द उसकी मुस्कान कानों तक फैला देते हैं| किसी द्रव के असर से धुंधला गए फ़ैल गए शब्द उसके दिल को भारी भरकम बना देते हैं, वह उड़कर वापिस अपने घर परिवार में जाना चाहता है लेकिन वाह रे जालिम समय, उसे पता है भावनाओं को दबा कर उसे कार्यरत ही रहना पड़ेगा| अब वह और संभल कर चिट्ठी लिखेगा जिससे उसकी पत्नी को वियोग की घड़ियों का असर कम सताए|
फिर शोक सन्देश लाने वाली चिठियाँ जो सूचित करती हैं कि कल तक जो थे अब प्रयाण कर गए हैं इस लोक से|
पोस्ट कार्ड, अंतर्देशीय और लिफ़ाफ़े का एक पूरा जीता जागता संसार होता था और इनमें शब्दों के माध्यम से दर्ज मानवीय संसार को इधर से उधर ले जाने वाले सज्जन को डाकिया कहते हैं|
राजेश खन्ना से बड़ा सुपर स्टार हिन्दी सिनेमा ने देखा नहीं है और उनमें यह काबिलियत थी कि वे अपने सफलतम दौर में बावर्ची, सब्जी फलों को ठेले पर बेचने वाला, मोटर मैकेनिक, हवलदार, डाकिया, और बाल काटने वाला नाई आदि कुछ भी बन जाते थे|
गुलज़ार साब के एक असिस्टेंट मीराज ने फ़िल्म बनायी – पलकों की छाँव में, जिसमें गुलज़ार साब ने गीत लिखे जिन्हें संगीतबद्ध किया लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने| फ़िल्म में राजेश खन्ना डाकिया बने हैं और एक तरह से यह सहायक भूमिका है और फ़िल्म हेमा मालिनी के चरित्र पर केन्द्रित है| हेमा मालिनी को इंतज़ार है उस फौजी अधिकारी का जिसके संग उन्हें प्रेम हो गया था और जो उनसे वादा करके गया था|
हेमा के इंतज़ार का, उसके दुःख का भान सारे गाँव कोऔर डाकिया बाबू को है| जब भी डाकिया अपनी साइकिल की घंटी बजाते गाँव में आते हैं हेमा मालिनी आशा से भर कर उसकी ओर देखती है कि आज तो चिट्ठी आयी ही होगी|
हेमा मालिनी के चरित्र की आशाओं और भावनाओं को प्रदर्शित करने वाली एक बेहद खूबसूरत गीत गुलज़ार साब ने लिखा था –
कोई मेरे माथे की बिंदिया सजा दे रे
लता जी ने जैसे इसे गाया है, और हेमा मालिनी ने जैसे अभिनीत किया है वह सुनने और देखने की बात है, और जो लिखा गया है उन शब्दों के जादू को तो पाठक श्रोता और दर्शक तीनों श्रेणी के लोग महसूस कर ही सकते हैं|
ऊपर जितना वर्णन किया गया जीवन में पत्रों की महत्ता के बारे में, विशेषकर सूचना क्रान्ति से पहले के दौर में, और इस पत्र संसार में सन्देश वाहक की भूमिका में डाकिये के महत्त्व के बारे में, उन सबको बहुत ही प्रभावशाली ढंग से प्रदर्शित करता हुआ एक गीत गुलज़ार साब ने इस फ़िल्म के लिए लिखा|
डाकिया डाक लाया
किशोर कुमार ने इसे गाया और राजेश खन्ना के लिए वे ऐसे गाते थे कि रेडियो पर भी सुन ले कोई तो जान ले कि इसे फ़िल्म में राजेश खन्ना ही गा रहे होंगे|
सरल शब्दों में लिखे गाये गीत की किसी किस्म की व्याख्या की आवश्याकता है नहीं|
हरेक को पढ़, सुन और देख कर इस गीत का आनंद स्वमेव प्राप्त हो जाता है|
डाकिया डाक लाया, डाक लाया
ख़ुशी का पयाम कहीं, कहीं दर्दनाक लाया
डाकिया डाक लाया, डाक लाया
देवर के भतीजे की साली की सगाई है
ओ आती पूरणमाशी को क़रार पाई है
मामा आप को लेने आते, मगर मजबूरी है
बच्चों समेत आना, आप का ज़रूरी है
दादा तो, अरे-रे-रे
दादा तो गुज़र गए, दादी बीमार है
नाना का भी तेरहवाँ आते सोमवार है
छोटों को प्यार देना, बड़ों को नमस्कार
मेंरी मजबूरी समझो, कार्ड को तार
शादी का संदेसा तेरा, ए ए ए, सोमनाथ लाया
डाकिया डाक लाया, डाक लाया
ए, डाकिया बाबू,
क्या री?
छः महीना हुई गवा, खतौ नाही लिखन
खतौ नाही लिखन? बोल क्या लिखूँ?
बस जल्दी से आवै का लिख देओ ना
बिरह में कैसे-कैसे काटूँ रतियाँ?
बिरह में कैसे-कैसे काटूँ रतियाँ?
सावन सुनाए बैरी भीगी-भीगी बतियाँ
अग्नि की बूँदों में जले-जले बावरिया
ओ, नौकरिया छोड़ के तू आजा ना, साँवरिया
आजा रे, साँवरिया आजा, आया बैसाख, आया
डाकिया डाक लाया, डाक लाया
ए मुनिया
होली के होली मनिया
घर से माल भेजे
हे दाल के लिफाफे में
सैंया गुलाल भेजे
किसी की दीवाली आई
किसी का दिवाला
निम्मो की गोद भरी
खैरू का प्याला
सात रुपैये लाया
लाया क्या खाक लाया
डाकिया डाक लाया डाक लाया
गीत खतो-किताबत के एक पुराने दौर का दस्तावेजीकरण है| यह एक ऐसी विरासत का गीत है, जो खो गयी है लेकिन जिसकी खूबसूरती ऐसी है कि आधुनिक पीढी के लोग भी इसे पुनर्जीवन दे सकते हैं|
आखिर आर्चीज़ के ग्रीटिंग कार्ड्स लेने देने के आनंद का अनुभव से तो नई से नई पीढी भी परिचित है ही|
…[राकेश]
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September 2, 2024 at 5:50 AM
अच्छा लिखा आपने, तकनीक ने मानव के साथ मानव का संपर्क खत्म सा कर दिया है। तकनीक ने समय बचाना था,लेकिन अब समय किसी के पास नहींहै
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