1990 का साल समाप्त होते होते चुपके से दक्षिण भारत से हिंदी सिनेमा में एक आगंतुक का आना हो गया| ये सज्जन साथ लाये थे एक साल पहले तेलगु में अपनी ही बनाई पहली फ़िल्म को दुबारा से हिंदी में बनाकर| तेलगु फ़िल्म बड़ी हिट थी| हिंदी सिनेमा ने 1990 के साल समाप्त होने से पहले ही घायल और अग्निपथ के रूप में परदे पर हिंसात्मक होली के दर्शन कर लिए थे| नवागन्तुक थे रामगोपाल वर्मा, और उनकी हिंदी में उनकी पहली फ़िल्म थी शिवा| अपने साथ वे लाये थे दक्षिण के सितारा अभिनेतागण नागार्जुन, और अमला को| अभिनेत्री अमला को हिन्दीभाषी दर्शक कमल हासन की पुष्पक में पहले देख चुके थे|
शिवा में दो अन्य अभिनेता दक्षिण भारतीय सिनेमा के अभिनेता थे, जे डी चक्रवर्थी और रघुवरन| रघुवरन इससे पहले दिलीप कुमार अभिनीत इज्जतदार में नज़र आ चुके थे| अमिताभ बच्चन जैसे बालों की स्टाइल अपनाये हुए रघुवरन में अमिताभ के मैनेरिज्म की झलक मिलती थी|
शिवा में हिंदी सिनेमा के पहचाने हुए अभिनेता परेश रावल, रोहिणी हटंगड़ी, दिलीप धवन, राज जुत्शी, गिरिजा शंकर, अजीत वाछानी, गोगा कपूर, और वरिष्ठ अभिनेता इफ्तेखार, एवं चंद्रशेखर भी थे|
कॉलेज राजनीति और कॉलेज में पढने वाले चरित्रों को लेकर पिछले कुछ सालों में हिंदी सिनेमा में अर्जुन, अंकुश, और तेज़ाब, जैसी प्रसिद्द फ़िल्में आ चुकी थीं और उसी कड़ी में शिवा का आगमन हुआ और यह आना एक ताजगी भरा अहसास लेकर आया| शिवा परदे पर एक कथा दिखाने के एक नए सिनेमाई अंदाज़ को लेकर आई|
कॉलेज की राजनीती पर शहर के स्थानीय नेताओं, खासकर गुंडे राजनेताओं के कब्जे के विरुद्ध कॉलेज में पढने लिखने आये एक सज्जन युवा के धर्म युद्ध की फ़िल्म ने देखते ही देखते दर्शकों के दिलों में घर बसा लिया|
फ़िल्म में युवा छात्रों की आपसी मित्रता और उनकी मस्ती से भरे समय से भरपूर हिस्से तब कॉलेज में पढ़ रहे, पढ़ चुके या कुछ सालों में कॉलेज जाने वाले सभी किस्म के युवा दर्शकों के लिए बेहद आकर्षक थे|
बॉटनी छोड़ेंगे मैटिनी देखेंगे, है क्या ख्याल बोलिए
एक तरह से कॉलेज कैम्पसों का गीत ही बन गया|
इन मस्ती भरे क्षणों को कॉलेज के छात्र संघ के चुनाव में स्थानीय नेताओं के संरक्षण में पल रहे गुंडे छात्र द्वारा छिन्न भिन्न कर देने से अच्छे छात्रों और बुरे छात्रों के बीच संघर्ष टल ही नहीं सकता और अच्छे की ताकत देखकर स्थानीय गुंडे राजनेताओं द्वारा अच्छे को अपने छाते के नीचे ले आने की कवायद भी होनी ही होती है और अच्छे युवा को बुरे नेता को उसके मुंह पर ही मना कर देना और कॉलेज की छात्र संघ की राजनीति से दूर रहने की चेतावनी देना भी अच्छाई का ही धर्म है|
कॉलेज से बाहर का जीवन कैम्पस की गतिविधियों से कहीं ज्यादा खतरनाक होता है और इसलिए अच्छाई और बुराई के संघर्ष में शहर भर में शोले उठते ही हैं|
शिवा के 11 बरस बाद आई ग़दर में सनी देओल द्वारा पाकिस्तान में हेंडपंप उखाड़ने में सिनेमाई लिबर्टी के नाम कितनी ही रियायत बरत ले कोई पर वहां अतिशयोक्ति ही दिखाई देती है और यह अवास्तविक है ऐसा मानकर ही दर्शक उस सीक्वेंस का आनंद लेता है लेकिन शिवा में जब नागार्जुन अपनी साइकिल की चेन को एक झटके में खींच कर अपने हाथ में लपेट लेता है तो परदे पर आकर्षक और वास्तविक दिखाई देने वाला एक्शन कैसा होता है, रामगोपाल वर्मा उस बात को स्थापित करते हैं|
रुक रुक कर अपनी गर्दन को थोड़ा ऊपर उठाकर अपने कंठ को दिखाते हुए अपने संवाद बोलने वाला गुंडा भवानी (रघुवरन) जब अपने सरपरस्त नेता तिलकधारी (परेश रावल) को अपने तरीके से संभालता है तो शिवा के 8 साल बाद रामगोपाल वर्मा की कालजयी फ़िल्म सत्या देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी कल्पना में सत्या के बीज शिवा की धरती पर सालों पहले बो दिए गए थे|
ऐसी भूमिका के लिए नागार्जुन के पास कसरती शरीर, उंचा कद, आत्मशक्ति और विश्वास और युवा ऊर्जा से भरा चेहरा था जिससे शिवा में उन्होंने जो किया वह विश्वसनीय लगता है|
एक भ्रष्ट नेता के रूप में परेश रावल और उनके पाले गए गुंडे के रूप में रघुवरन इतने बड़े और बुरे परदे पर लगते हैं कि उनका विरोध करने वाले शिवा में अपने आप नायकत्व की झलक दिखाई देने लगती है| इतनी बड़ी बुराई के आतंक का विरोध कोई साधारण मनुष्य तो कर ही नहीं सकता|
शिवा की भूमिका में नागार्जुन को भारी भरकम संवादों से नहीं लादा गया था बल्कि बोलने से ज्यादा उनके एक्शन को ज्यादा महत्त्व दिया गया था और एक तरह से शिवा पर सिल्वेस्टर स्टेलोन के चरित्र रैम्बो की छाया का असर दिखाई देता है| वे एक ही कुल के लगते हैं, बातें कम एक्शन ज्यादा|
शिवा में एक रॉ अपील थी जिसके कारण शिवा को तीन दशक बाद भी दर्शक ताजगी भरा पाते हैं और इसे पहली बार देखने वाले दर्शक तो बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकते|
…[राकेश]
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