बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के कारण छिड़े भारत-पाक युद्ध (1971) के दौरान भारतीय सेना ने न केवल रिकॉर्ड समय में इस युद्ध को जीता बल्कि दुनिया के किसी भी अन्य देश से ज्यादा बड़ा कारनामा दिखाते हुए पाकिस्तान की सेना से आत्मसमर्पण करवा कर लगभग 90000 युद्धबंदियों को अपने यहाँ उचित सुविधाएं देते हुए उनके सैनिक होने के मान को बरकरार रखते हुए रखा| भारत पाकिस्तान, दोनों पड़ोसी देशों के एक दूसरे के प्रति रुख में अंतर भी इसी युद्ध से स्पष्ट हो गया| पाकिस्तान ने भारत के बर्ताव के बिलकुल उलट पाकिस्तान में फंसे 54 भारतीय सैनिकों को युद्धबंदी का स्टेटस भी नहीं दिया| पाकिस्तान ने कभी माना ही नहीं कि उसके यहाँ भारतीय सैनिक बंदी मौजूद हैं और पाकिस्तान की इस हठधर्मिता के कारण उन 54 भारतीय सैनिकों ने कैसी नरक जैसी ज़िंदगी बिताई होगी इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है|
भारत ने तो शिमला समझौते के तहत पाकिस्तान के 90000 को सकुशल उनके देश जाने दिया लेकिन पाकिस्तान द्वारा अपने यहाँ फंसे भारतीय सैनिकों की अपने यहाँ उपस्थिति से इनकार कर देने के कारण उन्हें युद्ध में लापता ही माना गया|
रामायण धारावाहिक बनाने वाले प्रसिद्द फ़िल्म निर्माता निर्देशक रामानंद सागर के पौत्र अमृत सागर ने 2007 में उन्हीं 54 भारतीय सैनिकों की व्यथा को इस फ़िल्म 1971 के माध्यम से दुनिया के सामने लाने का सिनेमाई प्रयास किया| पीयूष मिश्रा के साथ मिलकर उन्होंने इसकी कथा-पटकथा लिखी|
फ़िल्म 1971 दिखाती है कि सन 1977 तक भारत और रेडक्रॉस संस्था के सामने पाकिस्तान ने कभी माना ही नहीं कि उसके यहाँ भारतीय सैनिक युद्ध बंदी के रूप में हैं| पाकिस्तान 6 सालों तक इन 54 भारतीय सैनिकों को दुनिया भर की निगाहों से बचाते हुए अवैध रूप से अनजान जेलों में कैद में छिपाए रहा| फ़िल्म असल में 2007 में शुरू होती है इन 54 भारतीय सैनिकों में से जीवित बचे रह गये एक सैनिक की डायरी के द्वारा फ्लैश बैक से|
फ़िल्म में इन 54 भारतीय सैनिकों में से कुछ वीरों ने भरकस प्रयास किये जिससे बाहरी जगत को उनकी पाकिस्तान में उपस्थिति के बारे में पता चल सके और उन्हें युद्ध बंदी का दर्जा मिले जिससे जेनेवा कन्वेंशन के नियमों के मुताबिक उनके साथ व्यवहार हो और उन्हें भारत वापिस भेजने की प्रक्रिया शुरू हो सके|
पाकितान चूंकि कई वैश्विक पटलों पर यह बोल चुका था कि उसके यहाँ एक भी भारतीय सैनिक युद्ध बंदी नहीं है अतः उसकी पूरी कोशिश यही थी कि ये भारतीय सैनिक दुनिया की निगाहों से गायब ही रहें|
इस संघर्ष को फ़िल्म अच्छे तरीके से कवर करती है| भारतीय वीरों के योजनाबद्ध तरीकों से पाकिस्तानी खुफिया कैम्प से भाग जाने से जो उनके और पाकिस्तानी सेना और पुलिस के बीच जो शिकार और शिकारी की दौड़ शुरू होती है तो दर्शक को न भावनात्मक रूप से सांत्वना मिलती है न उसे इतनी ही राहत भी मिलती है कि पूरी सांस ले सके|
भारत को निस्संदेह एक बहुत अच्छी बढ़त मिली थी पाकिस्तान के 90000 सैनिकों के आत्मसमर्पण के कारण लेकिन शिमला समझौते में भारत इस सैन्य बढ़त का लाभ उठा नहीं पाया और इसका खामियाजा दीर्घ काल में देश ने और उन 54 भारतीय सैनिकों ने भुगता जिन्हें पाकिस्तानी जेलों में छिपा कर रखा गया था|
भारत-पाक सीमा पर नो मैन्स लैंड में जो घटता है वह हिन्दुस्तानी दर्शक का ह्रदय छलनी कर देता है| कैम्प से भागे हुए भारतीय सैनिक, उनके पीछे गोलियों की बौछार करती पाकिस्तानी सेना की टुकड़ी और 50 मीटर की दूरी पर भारत का तिरंगा और कुछ सीमा प्रहरी| एक भी भारतीय सैनिक अपने देश की सीमा में पहुँच जाए तो दुनिया पाकिस्तानी ख़ुफ़िया कैम्प में कैद में रखे गए भारतीय सैनिकों के बारे में जान जाए और पाकिस्तान की किरकिरी सारी दुनिया में हो|
भारतीय सैनिकों के साथ भारतीय दर्शक भी दौड़ता है…
फ़िल्म में एक बेहतरीन भांगड़ा गीत भी है| बहुत अच्छी प्राकृतिक सौन्दर्य से भरी जगहों पर फ़िल्म को शूट किया गया है लेकिन विषय के कारण दर्शक का तनावग्रस्त मन आसपास की प्राकृतिक सुन्दरता में रम नहीं पाता|
मनोज बाजपेयी, मानव कौल, रवि किशन, कुमुद मिश्रा, दीपक डोबरियाल और अन्य बहुत सारे अभिनेताओं को परदे पर देखना इसलिए सुखद लगता है कि दर्शक को पता है कि यह सत्य घटनाओं का सिनेमाई रूपांतरण है और ऐसे समर्थ अभिनेताओं के हाथों में सारे चरित्र सुरक्षित हैं और चूंकि ये बहुत अच्छे अभिनेता अपने चरित्रों को पूरी शिद्दत से निभाते हैं सो जल्दी ही दर्शक भूल ही जाता है कि यह फ़िल्म चल रही है परदे पर, उसे ऐसा ही लगता है कि ये असल के भारतीय सैनिक युद्धबंदी हैं जिन्हें अपने मिशन में सफल होना ही चाहिए और दर्शक भावनात्मक रूप से इतना ज्यादा फ़िल्म से जुड़ जाता है कि उसके लिए फ़िल्म के अंतिम 15 मिनटों का तनाव झेलना दुष्कर हो जाता है|
सैन्य विषयों पर भारत में और कम से कम हिंदी में बहुत फ़िल्में नहीं बनी हैं और वैश्विक स्तर पर जेल या किसी कैद से बचकर भागने पर बहुत अच्छी फ़िल्में बनी हुयी हैं और उन विश्वस्तरीय फिल्मों की तुलना में 1971 एक साधारण फ़िल्म है| यह और बेहतर हो सकती थी|
पिछले 17 सालों में अमृत सागर ने केवल एक और फीचर फ़िल्म बनाई रब्बा मैं क्या करूँ| वे टीवी पर ही ज्यादा काम करते रहे हैं|
…[राकेश]
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