एक शाम जब, अपने अन्दर जाने कितने दशकों की दास्ताँ समेटे हुये पुश्तैनी घर को छोड़कर जाना है, उस दिन की सुबह कैसी होगी, वृद्ध कलाकार हुसैन के लिए और उसके परिवार (पत्नी – सकीना, और बेटी – नूर) के लिए?

घर भर में सामान फैला हुआ है| चंद अटैचियों में कितना और क्या क्या लेकर जा पायेंगे? जबकि इकरारनामे – घर की इमारत और इसके अन्दर हरेक वस्तु सहित बेचने पर सहमति, पर दस्तखत करवाने स्थानीय व्यापारी किशोरीलाल आया है|

भारत-पाकिस्तान बंटवारे और उसके कारण खूनी दास्तानों को सुनकर वह मुस्लिमों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रखता है|

सकीना बेगम जब किशोरीलाल को बताती हैं कि हुसैन साहब नवाब के दरबार के सबसे अच्छे मिनियेचर आर्टिस्ट थे और अपनी आर्ट के प्रति जूनून के कारण ही उन्होंने अपनी आँखें गंवाई हैं|

हुसैन कहते हैं,

“ये आँखें गंवाई नहीं हैं बेगम, ये आँखें कमाई हैं| ये अंधापन सुबूत है इनाम है| एक सच्चा और अज़ीम मिनियेचरिष्ट ही पा सकता है ऐसी नज़र|”

स्वाभाविक है कि कलाकार की कला की इतनी तारीफ़ सुनकर व्यापारी, जिसे पता है कि अब उसके नियंत्रण में कलाकार की बनाई कला के नमूने भी आयेंगे, उन मिनिएचर पेंटिंग्स को देखना भी चाहेगा|

एक कलाकार को अपनी कला प्रदर्शित करना स्वभावतः अच्छा लगता है|

अतः वह उत्साहित होकर अपनी पत्नी से उन्हें किशोरीलाल को दिखाने की बात कहता है जबकि कलाकार की पत्नी बहाना बना देती है कि सामान में बंध गयी हैं| वे बस कागज़ पर फिजूल लकीरें हैं|

कलाकार कहता है,

“मैं कोई अंग्रेजी हुकुमत हूँ जो फिजूल लकीरें बनाता हूँ”

भारत के बंटवारे की निर्मम और जबरन कार्यवाही को यह संवाद दर्शा देता है|

बंटवारे की त्रासदी को फ़िल्म दिखाती है|

कलाकार अपनी पत्नी को विवश कर देता है कि वह किशोरीलाल को उसकी बनाई मिनिएचर पेंटिंग्स दिखाए|

बक्से में हिफाज़त से रखी एक पेंटिंग की बाबत किशोरीलाल पूछता है तो कलाकार बक्सा बंद करके कहता है-

यह पेंटिंग मैं किसी को नहीं दिखाता

घर बेच कर अपना सबकुछ यहीं छोड़ कर जा रहे कलाकार की ठसक मकान को साजो सामान के साथ खरीदने वाले व्यापारी को स्तब्ध छोड़ जाती है|

व्यापारी पूछता है,

“ऐसा क्यों?”

कलाकार जवाब न देकर बक्सा बंद कर देता है|

एक अच्छी फ़िल्म उसी समय सब कुछ नहीं दिखा देती| वह दर्शको को अधपका भोजन कभी नहीं खिलती| वह सही समय पर फ़िल्म के कथ्य के किसी मोड़ को दर्शक के सम्मुख प्रस्तुत करती है|

फ़िल्म ने कलाकार के जवाब को अंत के लिए सुरक्षित रख छोड़ा है|

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इस घटना से पहले इसी दिन की सुबह, बेटी नूर जब अपने कलाकार पिता के साथ बैठकर चाय पीने के लिए पिता के कमरे में आती है तो चाय का पहला घूँट लेते ही पिता जैसे चेत कर बेटी को चेताता है,

“सुनो, एकदम से सारी चाय गटक मत जाना, एक घूँट जरुर छोड़ देना प्याली में”|

“क्यों”

“सुना नहीं तुमने, जो छोड़ जाता है आख़िरी घूँट, वो उसकी तलब में वापिस जूनागढ़ जरुर आता है”|

फ़िल्म की विशेषता यह भी है कि यह व्यापारी किशोरीलाल के चरित्र के द्वारा दिखाती है कि विषाक्त माहौल से ग्रसित होकर मनुष्य कठोर बन सकता है लेकिन कोई भी घटना, घटना की उसकी समझ उसे मानवीय सराकोरों की ओर लौटा सकती है|

नेत्र दृष्टि से बाधित कलाकार अगर उस कागज़ को अपनी उँगलियों से स्पर्श भर कर दे तो उसके सामने वह राज खुल जाएगा जिसे बड़े जतन से उसकी पत्नी और बेटी ने उससे छिपाकर रखा हुआ है, और स्पष्ट नहीं है कि इस रहस्य के खुलने से लगे सदमे से वह उसी पल मर जाएगा या तिल तिल मर कर कुछ दिनों में पूरी मृत्यु को प्रात करेगा|

यह राज नेत्र दृष्टि खोये कलाकार पर जाहिर न हो, इसका पूरा दारोमदार, उन पलों में जिस आदमी के ऊपर है, वह कलाकार के पास ही उसके सामने बैठा है| यह आदमी एक व्यापारी है और कलाकार की हवेली और उसमें उपस्थित सारे साजो सामान को खरीद चुका है| उसे कोई सहानुभूति यहाँ रहने वालों से नहीं है|

सहानुभूति होना थोड़ी मुश्किल है क्योंकि समय ही बहुत ख़राब चल रहा है और चारों तरह से मानवता को शर्मसार करने वाली वारदातों की सूचनाएं टपक रही हैं, बरस रही हैं| ऐसे विषाक्त माहौल में सामान्य व्यक्ति भी असामान्य व्यवहार करते दिखाई देते हैं|

कमरे के दरवाजे पर कलाकार की पत्नी और बेटी घबराए हुए खड़े हैं| उनकी चार जोड़ी आँखों से व्यापारी की तरफ याचना भरा आग्रह जाता है, उन दृष्टियों में एक क्षीण सी आशा है, और मन में प्रार्थना कि ईश्वरीय शक्ति ही कुछ कर सकती है|

कलाकार की उंगलियाँ कागज़ से एक सवा सेमी दूर हैं, और वे कागज़ ओ बस छू हे लेंगीं कि व्यापारी फंसी आवाज में बोल उठता है,

“चुप्पी ही जुबान है” !

कलाकार के हाथ रुक जाते हैं, विस्मय से|

व्यापारी अटक अटक कहता है,

“आपकी बेहतरीन कलाकारी के इतने करिश्माई नमूने के सामने उस्ताद, चुप्पी ही जुबान है|”

कलाकार संतोष से हँसता है और व्यापारी से कहता है,

वाह कितनी उम्दा बात आपने कही, चुप्पी ही जुबान है|”

दरवाजे पर खडी कलाकार की पत्नी संतोष से भरकर वहां से चली जाती है और बेटी के मुंह पर भी एक बहुत बड़े बला टल जाने की खुशी भरी मुस्कान आ जाती है|

कठोरता के आलम में कलाकार की बेटी द्वारा अपनी बिल्ली को मछली खिलाते हुए उससे यह आग्रह पूछने पर पर कि हमारे जाने के बाद इसे खिला दिया करेंगे आप, वह रुक्षता से कहता है,

“हमारे यहाँ मांस मच्छी नहीं खाते “

मानव – मानव संबंधों की सामान्य अवस्था में पहुंचकर वह जब अपने स्वाभाविक रूप में जब आ जाता है तो माहौल जनित क्षणिक सांप्रदायिक अंतर के पूर्वग्रह को उतार फेंकता है तो खुशी खुशी उसी बिल्ली को उसी बर्तन में दूध पिलाता है|

व्यापारी की जाने कौन सी भावना कलाकार को भा गयी है|

रात में घोड़े तांगे पर सवार होते हुए कलाकार, अपना घर खरीद चुके व्यापारी को घर की चाभियाँ देते हुए कहता है,

” अब घर के वारिस आप ही हैं| एक बार ये सियासत की शतरंज ख़त्म हो जाए तो हम लौट आयेंगे अपने वतन और खरीद लेंगे अपना घर आपसे वापिस| उस खरीदारी की पेशगी अन्दर है मेज पर| कुबूल कर लें|”

व्यापारी किशोरी लाल को हवेली के अन्दर कलाकार हुसैन द्वारा उसके लिए छोडी गयी नायाब वस्तु मिलती है|

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निर्देशक कौशल ओझा ने एक शानदार लघु फ़िल्म बनई है जो अपने कटेंट और तकनीकी प्रदर्शन में बेहद प्रभावशाली है और किसी उच्च स्तरीय फ़िल्म की बराबरी करती है| सैधांतिक रूप से सारी योजना में दो मूलभूत कमियाँ हैं, और उन्हें वे संभाल लेते तो उनकी फ़िल्म की गुणवत्ता कई गुना बढ़ जाती|

हुसैन- नसीरुद्दीन शाह, सकीना- पद्मावती राव, मूर – रसिका दुग्गल, और किशोरी लाल – राज अर्जुन, बहुरंगी चरित्रों में चारों अभिनेताओं ने जान फूंक दी है| कुछ पलों के लिए परदे पर आये उदय चन्द्र भी अच्छा काम कर गए हैं|

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इसे भारत का सौभाग्य माना जा सकता है कि यहाँ बंटवारे के दंश से ग्रसित मानवीय कहानियां लिखी और फ़िल्में बनाई जाती रही हैं, जबकि भारत से टूटकर अलग हुए भागों में ऐसे लेखन और फ़िल्म निर्देशन का अभाव रहा है इसलिए एक असंतुलन भारत में भी आन बसा है, क्योंकि एक हाथ से ताली नहीं बजती, उस जैसी आवाज एक हाथ की हथेली को किसी सतह पर थपथपा कर निकाली जरुर जा सकती है लेकिन कुछ समय बाद उस हाथ की हथेली ही दर्द करने लगती है|

मानव को मानवता की ओर ले जाने वाली ऐसी ढेर सारी फिल्मों की आवश्यकता होती है जो समय समय पर बनती ही रहें, मानवता की खुशनसीबी हो कि हर सम्प्रदाय की ओर से ऐसी फ़िल्में बनें, बनती रहें, वरना ऐसी अच्छी फ़िल्में भी बंजर भूमि में बोया गया बीज बन जाती हैं|

…[राकेश]


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