राजश्री प्रोडक्शन हाउस के अंतर्गत निर्माता ताराचंद बड़जात्या द्वारा निर्मित एवं हिरेन नाग द्वारा निर्देशित फ़िल्म, अंखियों के झरोखों से, मोटे तौर पर Erich Segal के 1970 में प्रकाशित बहुचर्चित लघु उपन्यास Love Story, जिस पर हॉलीवुड में इसी नाम से एक बेहतरीन फ़िल्म बनी, पर आधारित थी| हिरेन नाग और मधुसूदन केलकर ने इसे भारतीय सन्दर्भों में बहुत प्रभावशाली ढंग से ढाल दिया| कॉलेज के कुछ उटपटांग दृश्यों, जो कॉमेडी के नाते डाले गए उन्हें हटाकर इसे ठोस रूप देकर इसका डायरेक्टर कट प्रदर्शित हो तो आज 46 सालों बाद भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस को जीतने की सामर्थ्य रखती है|
धमेंद्र, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन,विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, और शशि कपूर के स्टारडम से सजे पिछली सदी के 70 के दशक की हिंदी फिल्मों में हायर सेकेंडरी स्कूल, और कॉलेज में पढने वाले छात्र की भूमिका निभाने के लिए ऋषि कपूर और सचिन ही सर्वथा योग्य अभिनेता थे और इनकी ऐसी फ़िल्में जहां इन्होंने छात्र की भूमिकाएं निभाईं, बेहद रोचक और आकर्षक हैं|
विनोद खन्ना और अमिताभ बच्चन अगर अपनी कमीज के ऊपर के तीन बटन खोल कर रखते थे तो विनोद मेहरा चार से कम पर राजी होते दिखाई नहीं देते अपनी फिल्मों में| ऐसे लम्बे कद वाले नायक अभिनेताओं के दौर में साढ़े पांच फुट से भी कम कद वाले सचिन का भी इसी स्टाइल में ऊँची हील्स के जूते, बेलबॉटम पहन कर कमीज के बटन खोलकर परदे पर आना उस दौर के फैशन को दर्शाता है|
रविन्द्र जैन ने स्वंय के लिखे हुए गीतों को जिस आकर्षक और मधुर संगीत से सजाया है उससे यह एक बेहतरीन संगीतमयी फ़िल्म बन गयी है और पिछले 46 सालों से इसका संगीत श्रोताओं और दर्शकों को लुभाता रहा है| यूं तो इसके सभी गीत अच्छे और लोकप्रिय रहे हैं, जिनमें जसपाल सिंह और हेमलता द्वारा गाई गयी दोहावली, और शैलेन्द्र सिंह और हेमलता द्वारा गाया दोगाना- कई दिन से मुझे कोई सपनों में आवाज देता है, बहुत लोकप्रिय रहे हैं, रविन्द्र जैन द्वारा गया गया एकल गीत – जाते हुये ये पल छिन, अपने भाव और उनकी भावप्रवण गायिकी के कारण एक विशिष्ट गीत बन चुका है जिसका स्थान हिन्दी सिने संगीत के इतिहास में ऐसा ही है जैसे सचिन देव बर्मन के गाये गीतों, रज़िया सुलतान में कब्बन मिर्ज़ा के गाये दो गीतों, और कई ऐसे गायकों के गाये गीतों का है जो नियमित गायक नहीं थे सिने संगीत संसार के|
हेमलता द्वारा गया एकल गीत – अंखियों के झरोखों से मैंने देखा जो सांवरे, इस फ़िल्म का सारांश, आदि और अंत तीनों एक साथ प्रस्तुत करता है| यह हेमलता का हिन्दी सिने संगीत संसार में प्रतिनिधि गीत का स्थान भी प्राप्त कर चुका है| सुनने में यह जितना मधुर, प्रभावशाली और आकर्षक गीत है उतना ही प्रभावशाली इसका फिल्मांकन किया गया है| हिरेन नाग ने सचिन के फ़िल्मी जीवन की दो सबसे बड़ी हित फिल्मों, गीत गाता चल और अंखियों के झरोखों से का निर्देशन किया| और यह कहना सही होगा कि एकल नायक के रूप में उन्होंने सचिन को सबसे बेहतर तरीके से सिनेमा के परदे पर प्रस्तुत किया और उनसे भावप्रवण अभिनय करवाया|
इस गीत के फिल्मांकन को देख कर आश्चर्य होता है कि हिरेन नाग ने कितनी बारीकी से इसकी योजना बनाई होगी! जितनी छोटी छोटी बातें उन्होंने इस गीत के माध्यम से दर्शाई हैं क्या उस कलात्मक बारीकी को फ़िल्म के प्रदर्शन के वक्त के सक्रिय फ़िल्म समीक्षकों ने देखा भी होगा या सराहा भी होगा?
शहर से बाहर धनी नायक की कन्वर्टिबल कार में जाते हुए नायक नायिका के चारों और फ़ैली प्राकृतिक सुन्दरता दर्शक का मन न मोहे ऐसा संभव नहीं| आबादी के कम होने से कितना आसान था ऐसी जगह शूटिंग करना जहाँ लोगों की भीड़ दिखाई न दे| प्लास्टिक की थैलियों, बिस्कुट और चिप्स के पैकेट्स के रैपर्स से जो गन्दगी अब देश में चहुँ ओर दिखाई देती है उसका सर्वथा अभाव इस गीत के फिल्मांकन में दिखाई देता है| उस दौर में प्राकृतिक रूप से ही देश में शहरों से बाहर का क्षेत्र कितना अच्छा दिखाई देता होगा, उस बात की गवाही यह गीत देता है|
यह गीत नायक-नायिका के मध्य प्रेम संबंध के प्रति नायिका की भावनाओं को प्रदर्शित करता है|
अंखियों के झरोखों से, मैने देखा जो सांवरे
तुम दूर नज़र आए, बड़ी दूर नज़र आए
बंद करके झरोखों को, ज़रा बैठी जो सोचने
मन में तुम्हीं मुस्काए, बस तुम्हीं मुस्काए
अंखियों के झरोखों से…
शहर से बाहर एक पहाडी पर एक पेड़ के पास उगी झाड़ी के पास बैठी नायिका और उससे दूरी पर पेड़ के दूसरी ओर घास पर लेटे नायक के बीच की दूरी निर्देशक की सायास योजना का अंग है| यह उस दौर को, और किशोरावस्था के प्रेमियों के मध्य प्रेम की शुरुआती अवस्था के बाद घर परिवार द्वारा उनके विवाह को स्वीकृति दिए जाने के बाद का गीत है| नायक-नायिका प्रेमी प्रेमिका तो है हीन, लेकिन अब शीघ्र पति पत्नी भी बनने वाले हैं, लेकिन निर्देशक परदे पर एक पारिवारिक फ़िल्म में ऐसा नहीं दिखाना चाहता उनके मध्य देह का ऐसा तीव्र आकर्षण नहीं है कि वे शहर से बाहर के एकांत में सिर्फ दैहिक नजदीकियों में ही खो जाएँ| निर्देशक पारिवारिक फ़िल्म के व्याकरण को पूरा सम्मान देते हुए ही इस गीत के फिल्मांकन की योजना बनाते हैं|
बारिश से और ज्यादा हरी हो चुकी घास और चारों और फ़ैली हरियाली के बीच फूलों के रंगों जैसे रंगीन कपडे पहने युवा सचिन और रंजीता फूलों जैसी ताजगी की ही एहसास दर्शकों में जगाते हैं| जिस झाड़ी के पास रंजीता को बिठाया गया है उसके फूलों का रंग उनकी वेशभूषा के रंग जैसा ही है|
नायिका नायक को जता रही है कि बाहर भले ही वह उससे कितनी दूर बैठा हो, रहता हो, दिखाई देता हो, उसके मन में वह गहरे तक बस चुका है| प्रेम में कम से कम प्रेमी को ऐसे भाव लुभाते हैं क्योंकि सामान्यतः प्रेमी गण ही कविता या शेरो शायरी के माध्यम से प्रेमिका के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं और प्रेमिकाएं मौन रहकर अपने भावों से ही अपनी प्रेम में उपस्थिति की गहराई को प्रदर्शित करती हैं| यहाँ सचिन को नायिका जैसा ही अभिनय करना था और नायिका के गाये बोलों पर अपनी मौन प्रतिक्रियायें प्रदर्शित करनी थीं, जिन्हें वे बखूबी प्रदर्शित करते हैं|
इक मन था मेरे पास वो अब खोने लगा है
पाकर तुझे हाय मुझे कुछ होने लगा है
इक तेरे भरोसे पे सब बैठी हूँ भूल के
यूँही उम्र गुज़र जाए, तेरे साथ गुज़र जाए
अपनी स्थिति का बयान नायिका करती है तो वह देश और काल की स्थिति के अनुसार भी/ही वर्णित होता है| फ़िल्म देख चुके दर्शक को नायक-नायिका की भिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं सांप्रदायिक स्थितियों की सच्चाई ज्ञात रहती है, इन सब भिन्नताओं के बावजूद भी एक स्त्री और पुरुष की स्थिति अलग होती है प्रेम संबंध में पड़ते समय और बीते दौर में तो बहुत ही अलग होती थी| अपने “मैं” को नायिका खोती जा रही है और प्रेमी संग प्रेम में गहरे उतरती जा रही है|
बहती पहाडी नदी के जल में पैर डाले बैठी नायिका ने अपनी व्यक्तिगत, सामाजिक सीमाओं को पार करके, और वह उस स्थिति में अब आ चुकी है जहाँ उसने अपने जीवन की नैया प्रेम के बहाव में डाल दी है अपने प्रेमी पर शत प्रतिशत भरोसा करके कि अब चाहे जो हो| प्रेम और समाज का रिश्ता ऐसा रहा है कि इसमें निश्चित कुछ भी नहीं होता, समाज से परे भी प्रेम का स्वरूप हीअपने आप में ऐसा होता है कि इसमें अनिश्चितता का भाव सदैव बना रहता है क्योंकि इसमें दो लोगों के “मैं” या “अहं” के अस्तित्वों को गलना होता है, एक में भी थोड़ी सी मात्र कम रह गयी गलने की तो अनिश्चितता कभी भी सर उठा सकती है, इन सब चिन्तनों को परे हटाकर नायिका निवेदन करती है कि उसका जीवन नायक संग प्रेम में ही बीत जाए|
प्रेमिका के ऐसे बोल सुनकर नायक उसके गीत पर अपने पैर से थाप देते हुए मुस्कुराता है| सचिन जैसी मोहक एवं आकर्षक मुस्कान और हंसी बहुत कम पुर्ष अभिनेताओं के पास होगी और वे अपने इस गुण का भरपूर उपयोग इस गीत में करते हैं|
जीती हूँ तुम्हें देख के, मरती हूँ तुम्हीं पे
तुम हो जहाँ साजन मेरी दुनिया है वहीं पे
दिन रात दुआ माँगे मेरा मन तेरे वास्ते
कहीं अपनी उम्मीदों का कोई फूल न मुरझाए
अंखियों के झरोखों से …
प्रेमी (और प्रेमिका को भी) को प्रेम में आश्वस्त करने के भावों की डोज़ निरंतर चाहिए होती है| नायिका अपने प्रेम को आश्वस्त करते हुए उसके साथ अपने प्रेम की गहराई का बखान करते हुए कहती है कि वह प्रेम पथ पर इतनी आगे जा चुकी है जहां उसकी निगाहों के सामने प्रेमी की छवि ही सारे समय रहती है, उसकी हर सांस में उसका स्मरण रहता है| नायिका के कथन की जांच के लिए नायक आँखों के इशारे से उससे पूछता है कि क्या यह सच है, ऐसी स्थिति उसके अन्दर आ गयी है उसकी हरेक प्रार्थना में प्रेमी की कुशलता ही माँगी जाती है| नायिका को छेड़ने के अंदाज़ में उसके कथन की जांच के लिए नायक आँखों के इशारे से उससे पूछता है कि क्या यह सच है, ऐसी स्थिति उसके अन्दर आ गयी है? प्रत्यूत्तर में नजदीक आये प्रेमी की बाहों के सहारे प्रेमिका अपनी आँखें बंद करके उबड़ खाबड़ पगडंडी पर आगे बढ़ जाती है|
नायिका आगे कहती है कि उसकी ईश्वर के सम्मुख की गयी प्रार्थना में नायक की कुशलता की मंगल कामना ही भरी होती है|
अपने से अलग सम्प्रदाय के प्रेमी की कुशलता के लिए वह अपने सम्प्रदाय की रीति छोड़कर देवालय में प्रार्थना करने पहुँच जाती है, और वहां देव स्थल पर चढ़ाए फूलों को आशीर्वाद रूप में लेकर प्रेमी के पास पहुँचती है तो अभी तक की अपनी आदत के अनुसार आरती को अपने सर पर लगाता हुआ नायक सहसा रुक कर उसे नायिका के सिर पर फेर देता है| कौन निर्देशक इससे ज्यादा गहराई में युवा प्रेमियों के प्रेम संबंध की गहराई और तीव्रता और प्रेमियों के परस्पर समर्पण को दिखा सकता था सिनेमा के परदे पर?
मैं जब से तेरे प्यार के रंगों में रंगी हूँ
जगते हुए सोई रही नींदों में जगी हूँ
मेरे प्यार भरे सपने कहीं कोई न छीन ले
दिल सोच के घबराए, यही सोच के घबराए
अखियों के झरोखों से …
शाम के धुंधलके के बढ़ने के साथ नायिका के लडखडाने से सहसा उपजी दैहिक नजदीकी से नायक के अन्दर और ज्यादा समीप आने की कामना उत्पन्न होती है तो नायक के बढ़ते क़दमों से बनी अति निकटता की आंच को नायिका अपनी हथेली के फासले से मंद कर देती है तो थोडा हैरान, और इस नाते परेशान हुए नायक के गाल पर अपने हाथ से स्नेह भरी थपकी देकर उसे वापिस सामान्य धरातल पर ले आती है|
अब उनके दोनों के मध्य उतनी भौतिक दूरी है जितनी उनके घरों के बीच है| अपने अपने शयनकक्ष में अपने अपने बिस्तर पर लेटे हुए दोनों एक दूसरे के ख्यालों में खोये हुए हैं| नायिका नायक की तस्वीर से गीत के माध्यम से बातें करते हुए सोने के प्रयास में हैऔर नायक उसकी यादों में उड़ी हुयी नींद की जगन से जागा हुआ अपनी बालकनी में आ खडा होता है|
नायिका को कोई अनजाना भय सता रहा है कि सब कुछ र्प्रेम में इतना अच्छा होता जा रहा है कहीं यह सपना ही न सिद्ध हो और उससे यह सारी प्रसन्नता कोई छीन न ले| इसी भय से लडती शनैः शनैः वह नींद के आगोश में चली जाती है|
गीत में बीच बीच में जने वाले बांसुरी के सुर मन मोह लेते हैं|
शायद उसे कुछ आभास हो गया था आने वाले समय का!
क्योंकि समय ऐसी करवट लेता है कि वही इन प्रेमियों के बीच खलनायक बन जाता है|
कुछ बोल के खामोशियाँ तड़पाने लगी हैं
चुप रहने से मजबूरियाँ याद आने लगी हैं
तू भी मेरी तरह हँस ले, आँसू पलकों पे थाम ले,
जितनी है खुशी यह भी अश्कों में ना बह जाए
अंखियों के झरोखों से
नदी के बहते पानी में हाथ की मुट्ठी में बंधा रेत जैसे फिसल कर बहता जाता है वैसे ही नायक के सामने नायिका धीरे धीरे उसके सामने से गायब होती जा रही है| अब फूलों में न वैसी सुगंध है, न वैसे रंग| जीवन की क्षण भंगुरता का भाव जितनी विवशता व्यक्ति के सामने ला सकता है उतनी नायक-नायिका के सामने आ खडी हुयी है| दोनों अपने अपने स्थान पर बेहद मजबूर| सत्य को स्वीकारने के बावजूद बेहद कमजोर| उसी में नायक को दिलासा देने की कोशिश करती है नायिका|
मृत्यु शैय्या पर पडी नायिका के पास जब नायक इस आशा में जाता है कि अमेरिकी डॉक्टर उसे देखेंगे और वह ठीक हो जायेगी| नायिका से ज्यादा कौन जानेगा कि काल ने कितने लम्हें उसके लिए रख छोड़े हैं| कुछ अरसा पहले पहाडी पर नायक को अधबीच में रोककर जिस प्रक्रिया को उसने रोक दिया था एक सुखद भविष्य में आने वाले किसी खूबसूरत क्षण के लिए, और जब उसके सामने स्पष्ट है कि वह खूबसूरत क्षण उनके संयुक्त जीवन में कभी नहीं आने वाला तो धरा छोड़ने से पहले वह अपने पास नायक के रह गए उधार को चुका देना चाहती है| और शायद नायक का कर्जा अपने चढ़ा कर उस लोक की यात्रा पर निकलना चाहती है| इसलिए वह मांगती है, याचना करती है अगर नायक उसकी इच्छा पूरी कर सके
द लास्ट किस,
द ओनली किस दे शेयर्ड विद इच अदर !
कलियाँ ये सदा प्यार की मुसकाती रहेंगी
खामोशियाँ तुझसे मेरे अफ़साने कहेंगी
जी लूँगी नया जीवन तेरी यादों में बैठके
खुशबू जैसे फूलों में उड़ने से भी रह जाए
अंखियों के झरोखों से
जिस कॉलेज के परिसर में नायक को नायिका का प्रेम प्राप्त हुआ था, और जहाँ उसे आज सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ है, जो शायद न मिल पाता अगर नायिका जीवित होती तो क्योंकि वह कॉलेज में आते ही उसे दूसरे स्थान पर धकेल चुकी थी, और जहां के दर्रे दर्रे में उसके लिए नायिका की यादें बिखरी हुयी हैं, वहां खडा नायक, अपने युवा जीवन का सबसे मूल्यवान एहसास होकर, नायिका के गीत की बाकी पंक्तियाँ गुनता है|
आनन्द बक्शी ने फ़िल्म – दो रास्ते के लिए किशोर कुमार द्वारा गाये गीत के लिए लिखा था
खिज़ा के फूल पे आती कभी बहार नहीं
मेरे नसीब में ऐ दोस्त, तेरा प्यार नहीं
वह शायद इस फ़िल्म और इस फ़िल्म में नायक नायिका के प्रेम संबंध के ऊपर एकदम सटीक बैठता है|
18-20 साल की उम्र के प्रेमियों से जुडी ऐसी फ़िल्म हिन्दी सिनेमा ने पहले नहीं देखी थी, जिसमें इतना दुःख भरा हुआ हो| जिन स्त्रियों को गीत गाना पसंद है और जिन्होंने प्रेम को जीवन में महसूस किया है, वैसी स्त्रियों में बहुतों की आँखों में इस गीत का पद्यांश
जीती हूँ तुम्हें देख के, मरती हूँ तुम्हीं पे
तुम हो जहाँ साजन मेरी दुनिया है वहीं पे
गाते हुए उभर आई नमी के साथ देखा है| क्यों अक्सर इसी पद्यांश में उन सभी के साथ ऐसा होता होगा, यह बहुत रहस्य का मामला नहीं है| दुःख जाने क्या क्या तो मांजता है अन्दर|
गीत अन्दर तक छूता है श्रोता को, दर्शक को, पाठक को|
Melancholy का अर्थ क्या होता है वह इस गीत के पूरे स्वरूप से, इस फ़िल्म से समझ में आ जाता है|
…[राकेश]
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