रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों में देव साब को देखने की बात ही कुछ है|
पचास के दशक के तीन सबसे बड़े नायकों में से एक देव आनंद अपनी फिल्मों में कोशिश करते थे कि उन्हें परदे पर रोने के सीन न करने पड़ें| शायद उन्हें निजी प्रकृति के कारण लगता हो कि रोना क्या और क्यों है जब जीवन के दुखों और संघर्षों का सामना व्यक्ति कर सकता है और इसके अलावा कोई राह भी नहीं है| वे बेहद दुखी दिखाई देंगे परदे पर, लेकिन रोते हुए उन्हें कैमरे ने बमुश्किल दो तीन बार ही पकड़ा होगा|
जब प्यार किसी से होता है में वही दुर्लभ क्षण आया जब देव आनंद परदे पर वास्तव में रोये, शायद उन्हें वास्तविक जीवन की घटना की याद ने रुला दिया हो जहाँ वे ऐसा ही दृश्य जीकर आये थे|
देव आनंद की फ़िल्म थी – जब प्यार किसी से होता है (1961), जिसमें आशा पारेख उनकी नायिका बनीं और इसी फ़िल्म ने हास्य अभिनेता – राजेन्द्र नाथ को पोपट लाल का प्रसिद्द चरित्र दिया| प्राण, सुलोचना, राज मेहरा और मुबारक अन्य महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे|
फ़िल्म को देखे बिना भी लोग इसके बेहद प्रसिद्द गीतों – सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, ये आँखें उफ़ यम्मा, तेरी जुल्फों से जुदाई तो नहीं मांगी थी, और, जब प्यार किसी से होता है तो दर्द सा दिल में होता है, को सुनते सराहते रहे हैं|
युवावस्था में नायक नायिका मिलते हैं, तो उनकी लड़ाई झगड़ों वाली शुरुआत के बाद दोस्ती और प्रेम की राह के किसी मोड़ पर नायक को पता लगता है कि नायिका संग उसके विवाह की बात नायिका की माँ बहुत साल पहले जब नायक नायिका बच्चे ही थे, तब नायक की माँ के साथ निश्चित कर गयी थी| उसवक्त नायक का परिवार धनी था, आज वे निम्न मध्यवर्गीय परिवार हैं जबकि नायिका के पिता अब बड़े धनी व्यक्ति बन चुके हैं और वे सिर्फ अपनी बराबरी वाले लोगों से ही मिलते जुलते हैं, उनसे बात करते हैं|
बहुत सारी गलतफहमियों के बाद जब अंततः नायक नायिका एक दूसरे संग प्रेम में हैं तब नायक नायिका के पिता से मिलने उनके महल जैसे घर जाता है जहाँ नायिका का धनी पिता उससे बेरुखी से मिलता है और नायक द्वारा पुरानी सारी बातें बताने – उनके और अपने पिता की दोस्ती और कि उसकी माँ अगर नायिका की माँ की सहेली न होती तो नायिका का गरीब पिता कभी भी उस वक्त अमीर लडकी से विवाह न कर पाता, – के बावजूद नायक का अपमान करके उसे घर से बहार जाने के लिए कहता है| नायक को नायिका संग अपने प्रेम पर भरोसा है|
वह नायिका के पिता को बताता है कि वह उनकी बेटी के संग प्रेम में है और उनकी बेटी भी उससे प्रेम करती है|
बौखलाया धनी पिता अपनी बेटी को धमकी देता है, उसे भावनात्मक रूप से दबाव में लाता है कि अगर इस आदमी के साथ घर से बाहर कदम रखा तो फिर जीते जी वह उसके पास नहीं आ पायेगी, उसका मुंह नहीं देख पायेगी|
नायिका और उसके प्रेम पर भरोसा करके नायक हिम्मत जुटाकर उसके पिता से मिलने चला आया है और अब बात इतनी बढ़ गयी कि पिता बनाम प्रेमी की स्थिति नायिका के सामने आ गयी है|
नायक बाहें फैलाए उसकी ओर आस से देख रहा है, ऊपर खड़ा पिता उसे आग्नेय नेत्रों से घूर रहा है, और ऊपर उसकी बुआ चुपचाप खडी है, जो नायिका के बचपन से लेकर आज तक की सारी कहानी जानती है और जिसने नायिका को मातृवत पाला है|
इस चतुष्कोण को कैमरा बड़े प्रभावी ढंग से दर्शा कर सीन के तनाव को बढ़ाता जाता है| फिर कैमरा नायक के चेहरे पर ठहर जाता है|
अपने ह्रदय से निकली पुकार का अपेक्षित असर नायिका पर न होता देख, नायक स्तब्ध खड़ा है, नायिका का जड़त्व उसकी निरंतर पुकार से भंग नहीं होता और वह नायिका को अपने हाथ अपने कानों पर रखते देखता है तो उसकी सारी आशाएं धूमिल हो जाती हैं| उन पर बर्फ पड जाती है|
इससे अपमानजनक स्थिति उसके सामने पहले न आयी थी| वह रुआंसा हो जाता है, और नाम हुयी आँखों से आंसू ढलक कर उसके गालों पर बह जाते हैं|
वह नायिका को यह कह कर- कि अब वह कभी उसकी पुकार नहीं सुनेगी– उस महल जैसे घर से निकल जाता है|
उसका जाना नायिका के जड़त्व को तोड़ता है और वह उसका नाम लेकर चीखती हुयी पुकारती है| लेकिन तब तक चोट खाया प्रेमी वहां से जा चुका है|
जीत की आशा से प्रेमिका के घर गए उर्जावान नायक के हारे हुए प्रेमी की निराशाजनक वापसी के बीच के क्षणों को जैसे देव आनंद ने प्रदर्शित किया, वह परदे पर बेहतरीन अभिनय का नमूना है|
राहुल रवैल द्वारा निर्देशित सनी देओल की पहली फ़िल्म बेताब, देव आनंद अभिनीत और नासिर हुसैन द्वारा निर्देशित जब प्यार किसी से होता है का ही एक्शन पैक्ड संस्करण है|
Discover more from Cine Manthan
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Leave a comment