किसी फिल्मकार से कहा जाए कि ये जो वर्तमान के भोजपुरी गीतों में अश्लीलता की बातें चल रही है उनमें से किसी जीवित, सक्रिय और प्रसिद्द गायक – गायिका पर एक बायोपिक बना दो तो उसके पसीने छूट जायेंगे क्योंकि श्लील और अश्लील का विवाद वास्तव में ही वर्तमान में चल रहा है|

ऐसी ही दुधारी तलवार उन सभी संगीत प्रेमियों के सर पर भी लटक रही है जिन्हें श्लील -अश्लील गीतों में बीते दौर और आज के गीतों के दौर में अपनी परिभाषाएं जगजाहिर करनी हैं|

अमर सिंह चमकीला के गीत अश्लील थे या नहीं, चूंकि यह एक भूतकाल की कथा है, अतः फ़िल्म बनाने वाला, इस मुद्दे को किसी भी तरह से दिखा सकता है|

फ़िल्म जो दिखाती है कि एक एस.पी. स्तर का अधिकारी चमकीला की मंडली के सदस्यों और अपने मातहतों के सामने तो जाहिर करता है कि वह चमकीला के गीत नहीं सुनता और न उसे जानता था आज से पहले लेकिन अपनी सरकारी जीप के डैशबोर्ड की दराज से चमकीला के दो कैसेट्स निकालता है, जिनके कवर्स से, चमकीला से अनजान दर्शकों के लिए यह पता करना मुश्किल है कि वे उसके धार्मिक गीतों के संग्रह हैं या विवादास्पद गीतों के| एस.पी साहब की जीप उनका ड्राइवर चलाता होगा तो वे कब चुपके से अपनी जीप में, अपने दफ्तर में या घर में चमकीला के गीत सुन लेते होंगे, जिससे दूसरों को खबर न हो?

यह व्यर्थ का दृश्य है, बाद में अपने घर पर भी वह अपने टीनएजर बेटे से कहता है कि बेटा चाहे तो चमकीला की गाने सुन लिया करे| चमकीला के कौन से गाने बेटा सुन सकता है? विवाद उत्पन्न करने वाले या धार्मिक रंग रूप वाले?

गीतों के इस सामाजिक परिपेक्ष्य से परे, अमरसिंह चमकीला , बायोपिक को एक फ़िल्म के स्तर पर देखें तो दर्शकों को मोटे तौर पर दो वर्गों में बाँट सकते हैं| एक वे जो चमकीला को पहले से जानते रहे हैं और दूसरे वे जो इस बायोपिक के माध्यम से उसके गायन और जीवन से परिचित हो रहे हैं|

काल्पनिक कथानकों से इतर बायोपिक फिल्मों से दर्शकों की एक अपेक्षा रहती है जिस काल में फ़िल्म स्थित है उस काल के बारे में भी नई पीढी के दशकों को पता लगे|

चमकीला को किसने मारा, या कौन मार सकता है, इस ओर संकेत करने की दिशा में फ़िल्म ने कोई कदम नहीं उठाये|

अस्सी का दशक पंजाब में भयानक आतंकवाद के विस्तार का था, और पंजाब के घटनाक्रमों से हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, जम्मू -कश्मीर, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश (आज के उत्तराखंड सहित) के इलाके प्रभावित रहते थे| फ़िल्म से बिलकुल भी उस दौर की झांकी नहीं मिलती| चमकीला बीड़ी पीने के मामले में चेन स्मोकर था और फ़िल्म इस बात को सिर्फ एक दृश्य में कनाडा में कार में दिखाती है|

पंजाब में अस्सी के दशक में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद घल्लूघारा का आह्वान किया गया और गैर सिख परम्पराओं का पालन पंजाब की सीमाओं में करने पर नतीजे भुगतने की चेतावनी दी गयीं जिसमें पंजाब में स्मोकिंग का निषेध भी था| फ़िल्म बड़ी आसानी से भिंडरावालाऑपरेशन ब्लू स्टार, पीएम इंदिरा गांधी की ह्त्या और उसके बाद फ़ैली सिख विरोधी हिंसा, गुरुचरण सिंह तोहड़ा, और संत लोगोवाल, से जुड़े घटनाक्रमों और उनके पंजाब पर पड़े असर से एकदम अनभिज्ञ रहती है जबकि अन्य नागरिकों के साथ अमरसिंह चमकीला का जीवन इन घटनाओं से अछूता रहा होगा ऐसा मानना बहुत मुश्किल है| जिस सामाजिक तंत्र के सामने देश के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह और बाद में गृहमंत्री बने बूटा सिंह प्रायश्चित या सजा का सामना करने कारसेवा में जूते साफ़ करने का काम करने गए उस तंत्र के सामने अमर सिंह चमकीला जैसे एक साधारण लेकिन प्रसिद्द और विवादास्पद गायक का जीवन लगभग अछूता ही रहेगा यह बात आसानी से स्वीकार करने वाली है नहीं|

इम्तियाज अली ने दलजीत दोसांझ से जिस तरह से अमर सिंह चमकीला का चरित्र निभवाया है उससे चमकीला के जीवन में आये उतार चढ़ाव से चमकीला से अब तक अनजान दर्शक का नाता जुड़ना या उससे प्रभावित होना आसान काम नहीं| दलजीत हिंदी फिल्दों में ज्यादातर कॉमेडी ही करते रहे हैं अभी तक, तो अमर सिंह चमकीला में भी उनका ऊपरी आवरण कॉमेडी का ही है| और इस नाते दर्शक को उनके जीवन के दुखों और उतार चढ़ावों के बारे में बहुत कुछ महसूस नहीं होता| हालांकि दलजीत दोसांझ पंजाबी में संवेदना से भरपूर फ़िल्म 1984 कर चुके हैं| 

इम्तियाज अलीदलजीत दोसांझ ने अमर सिंह चमकीला के चरित्र का जो सांचा रचा है वह एक स्ट्रीट स्मार्ट व्यक्ति का उभर कर सामने आता है और इसलिए फ़िल्मी ज्यादा लगता है| बीच बीच में चमकीला की असली फुटेज या असली फोटो सामने आते रहने से दलजीत दोसांझ के सर पर बेतरतीबी से जमाई गयी बालों की विग अटपटी लगती है| और बार बार एहसास होता रहता है कि चमकीला नहीं बल्कि एक अभिनेता उनके जीवन पर अभिनय करने का प्रयास कर रहा है|

दलजीत दोसांझ और चमकीला की जोड़ी से अलग परिणीति चोपड़ा ज्यादा सहजता से पंजाब की अमरजोत कौर जैसी युवती के रूप में सामने आती हैं| फ़िल्म में परदे पर पहली बार नज़र आने वाली अमरजोत के रूप में परिणीति अमरजोत की उसके अपने परिवार के सामने चुपचाप बैठने लेकिन उनके जाने के बाद थोडा खुलने और अमर सिंह चमकीला के पूछने पर कि अमरजोत ने उसके कौन से गीत सुने हैं, शर्मा कर हंसने वाले क्षणों को बेहतरीन रूप से प्रस्तुत किया है और सिद्ध किया है कि एक चरित्र की छवि परदे पर कैसे उकेरी जा सकती है| परिणीति उन्हें दी गयी भूमिका की सीमाओं से बाहर नहीं निकलतीं और एक रास्ता निश्चित करके उस पर चलती हैं जबकि दलजीत बार बार कभी इधर कभी उधर चलते दिखाई देते हैं| क्या अपने पहले प्रोमोटर के सामने खड़े चमकीला और इनकम टैक्स अधिकारी के सामने गए चमकीला में कोई सामंजस्य दिखाई देता है? बाद वाला चमकीला के चरित्र पर ऊपर से चिपकाया हुआ रंगीन पोस्टर लगता है| वहां वे चमकीला की भूमिका न निभाकर एक फ़िल्मी कॉमिक चरित्र निभाने लगते हैं|

जो एक गंवई हावभाव, भोलापन और ग्रामीण पहचान से उठकर बड़ी सफलता पाने से उपजा आत्मविश्वास अमर सिंह चमकीला के असली फोटो और वीडियोज़ में दिखाई देता है वह दलजीत दोसांझ में दिखाई नहीं देता| वे एक सितारे जैसा अभिनय करते दिखाई देते हैं| 

इम्तियाज अली रणदीप हुड्डा के साथ अपनी फ़िल्म हाइवे में कम कर चुके थे जहां रणदीप ने एक ग्रामीण हरियाणवी का चरित्र निभाया था, चेहरे मोहरे से भी वे अमर सिंह चमकीला के चेहरे से ज्यादा मेल खाते दिखाई देते हैं| उनमें वैसी काबिलियत है कि बायोपिक्स में निभाये जाने वाले चरित्र से आत्मिक सामंजस्य बिठाकर अभिनय करें, ऐसा उन्होंने राजा रवि वर्माचार्ल्स शोभराजसरबजीत और वीर सावरकर के चरित्र परदे पर निभाकर सिद्ध भी किया है|

अमर सिंह चमकीला अंत तक ऐसा भाव स्थापित नहीं कर पाती कि दर्शक उसके जीवन के उतार चढ़ावों संग भावनाओं के हिंडोले में झूले और जब उसकी और उसकी पत्नी की ह्त्या हो तो इसे देखकर वह स्तब्ध रह जाए| यह एक चमक दमक वाली बायोपिक है| 

ए आर रहमान ने चमकीला के पंजाबी गीतों से मिलता जुलता संगीत रच दिया यह उनकी श्रेष्ठता है, एक बायोपिक के रूप में अमर सिंह चमकीला एक साधारण सिनेमाई प्रयास ही लगती है|

श्याम बेनेगल की भूमिका में दर्शक अभिनेत्री  हंसा वाडेकर के जीवन के सुख दुःख से जैसा तारतम्य महसूस कर पाते हैं| वैसा यहाँ नहीं होता|

…[राकेश]


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