अभिनेता अमिताभ बच्चन और निर्देशक यश चोपड़ा की जोड़ी ने हिंदी फिल्मों के लिए एक बहुत ही उपयोगी संयोजन प्रस्तुत किया है| 1975 से 1981 के बीच इस जोड़ी ने जिन पांच फिल्मों दीवार, कभी कभी, त्रिशूल, काला पत्थर और सिलसिला में काम किया और इन पाँचों फिल्मों में अमिताभ ने नायक की भूमिका निभाई| सिलसिला के 23 साल बाद 2004 में वीर-जारा में उनका पुनर्मिलन हुआ लेकिन यहाँ अमिताभ की उपस्थिति सह-भूमिका के रूप में थी| अमिताभ और यश चोपड़ा द्वारा साठ में की गयी छह फिल्मों से यह तो पता लगता ही है कि काश उन्होंने 23 साल के लंबा वक्त को न गंवाकर इन वर्षों में वे कम से कम 5-7 स्मरणीय फ़िल्में और एक दूसरे के साथ बना लेते तो दोनों की फिल्मोग्राफी भी और बेहतर बनती और सिने-प्रेमियों को भी कुछ और उल्लेखनीय फ़िल्में मिल जातीं देखने के लिए|
उनके युवा सालों में आपसी सहयोग की सभी 5 फिल्मों ने व्यावसायिक हिंदी सिनेमा में एक शक्तिशाली स्थान हासिल किया है। उनकी उन पांच फिल्मों की स्मृति कभी बासी नहीं पड़ती और उन्हें ऐसे याद किया और देखा जाता है मानो वे हाल ही में बनी और रिलीज़ हुई हों। वे प्रत्येक बार देखने पर दर्शकों को कुछ न कुछ गुणात्मकता प्रदान करती हैं, और यही बात अच्छी फिल्मों की निशानी है। फिल्म निर्माण के हर विभाग में वे 5 फिल्में कुछ न कुछ ठोस प्रस्तुत करती हैं।
युवा यश चोपड़ा की उपरोक्त सभी 5 फिल्मों में युवा अमिताभ को बहुत ही सशक्त और अच्छे लिखे हुए किरदार निभाने को मिले और इन फिल्मों ने उन्हें एक बहुत अच्छे अभिनेता के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई। इन फिल्मों में उन्हें भावनाओं का एक विशाल स्पेक्ट्रम प्रदर्शित करने का मौका मिला।
उन पांच फिल्मों को सबसे पहले दो बड़े भागों में बांटा जा सकता है : उनके लेखन के आधार पर|
दीवार, त्रिशूल और काला पत्थर सलीम-जावेद द्वारा लिखी गई थीं|
कभी-कभी और सिलसिला का जन्म यश चोपड़ा और सागर सरहदी के सहयोग से हुआ था।
दीवार, त्रिशूल और काला पत्थर अमिताभ बच्चन की एंग्री यंग मैं की छवि को बढ़ावा देने वाली फ़िल्में थीं| इन तीनों फिल्मों में अमिताभ बच्चन को एक गुस्सैल युवा व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया और जिसके पास हर समय गुस्से में रहने का एक कारण होता है। वह धीरे-धीरे अंदर ही अंदर जल रहा है और अंदर का यह गुस्सा उसके बाहरी व्यवहार में भी झलक रहा है। इन फिल्मों में अमिताभ को हँसना तो छोड़िये मुस्कुराते हुए भी बहुत ही कम दिखाया गया|
दीवार, त्रिशूल और काला पत्थर में अमिताभ को लार्जर देन लाइफ श्रेणी वाले रोचक संवाद कहने को मिले, जिन्हें एक बार भी इन फिल्मों को देखने वाला दर्शक याद रख लेता है| जैसे कि
मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता (दीवार)
मिस्टर आर.के. गुप्ता मेरी जेब में पांच पैसे नहीं हैं लेकिन मैं पांच लाख का सौदा करने आया हूं (त्रिशूल)
Pain is my destiny (काला पत्थर)
तीनों फिल्मों ने अमिताभ को एक क्रोधी चरित्र होने का आधार दिया, और उनका चरित्र या तो अपने पिता से या पूरी दुनिया से बदला लेने और अपनी जली हुई भावनाओं को ठीक करने के लिए जी रहा था।
उधर कभी कभी और सिलसिला एक तरह से सामजिक विषयों वाली प्रेम कथाएं थीं जिनमें दोनों में अमिताभ बच्चन ने लेखक एवं कवि की भूमिकाएं निभाईं| इन दोनों फिल्मों में अमिताभ बच्चन को बहुरंगी चरित्र निभाने, कविता कहने और, परदे पर युवा प्रेम की इबारत गढ़ने, अच्छे गीत प्रस्तुत और कॉमेडी करने के अवसर मिले|
यश चोपड़ा और अमिताभ बच्चन के युवा दिनों के गठबंधन की फिल्मों के प्रशंसकों के लिए बहुत मुश्किल हो जायेगा अगर उनसे कहा जाए कि या तो दीवार, त्रिशूल और काला पत्थर की राह चुनो या फिर कभी कभी और सिलसिला की तरफ जाओ| और इतना कर चुकने के बाद भी अगर उसे यह कहा जाए कि अब इन तीन या इन दो में से भी किसी एक को सर्वश्रेष्ठ के रूप में चुन कर उधर ऊँचे मंच पर रख दो तो बहुत बड़ी मुश्किल उसके सामने आ जायेगी| और यह एक असंभव सा कम लगेगा|
23 साल बाद अमिताभ बच्चन यश चोपड़ा निर्देशित फ़िल्म वीर-जारा में नज़र आये तो जिन दृश्यों में वे उपस्थित रहे वहां वे गुणवत्ता का सारा श्रेय लूट लेते हैं| यह कहना कतई भी अतिशयोक्ति न मना जाएगा कि वीर-जारा में सबसे बड़ी दो कमियाँ झलकती हैं, एक तो वीर के पाकिस्तान चले जाने के बाद भारत से उसके माता-पिता की भूमिकाएं ही गायब हो जाती हैं और दूसरे ऐसा ही कुछ पाकिस्तान में रज़ा (मनोज वाजपेयी) के साथ होता है और वीर के जेल में बंदी बनाये जाने के साथ रज़ा भी परदे से गायब हो जाता है जबकि अगर वीर के कैदी बनने के बाद भारत में वीर की अनुपस्थिति में अमिताभ–हेमा मालिनी की भूमिका और पाकिस्तान में रज़ा के चरित्र की जो कहानी ज़ारा बाद में सुनाती है उसे परदे पर घटता हुआ दिखाया जाता तो फ़िल्म में की गुणवत्ता में गुणात्मक वृद्धि हो जाती|
इसे एक तरह से हिन्दी सिनेमा का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि बेटे आदित्य चोपड़ा की दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे की अपार सफलता के पश्चात यश चोपड़ा दिल तो पागल है, जैसी युवा चरित्रों वाली रोमांटिक फ़िल्म बनाते हैं, जबकि अब उन्हें बड़ी उम्र के चरित्रों को नायक बना कर परिपक्व कहानियों पर फ़िल्में बनानी थीं|
वे 70 के दशक से ही दिलीप कुमार के साथ फ़िल्म बनाना चाहते थे लेकिन इसे भी वे कम से कम 10-12 साल की देरी से 1984 में ही कर पाए जब मशाल उन्होंने दिलीप कुमार के साथ बनायी| जबकि उस समय यह विषय अमिताभ बच्चन के ज्यादा अनुकूल था|
काश यश चोपड़ा अमिताभ बच्चन के साथ परिपक्व उम्रदराज चरित्रों वाली फ़िल्में भी बना पाते| अमिताभ की चीनी कम (2007) बनने के बाद भी यश चोपड़ा ने जब वीर जारा के लगभग 7-8 साल निर्देशन किया तो एक और युवा चरित्रों की रोमांटिक फ़िल्म जब तक है जान बनायी|
सिलसिला के बाद 23 साल अगर यश चोपड़ा अमिताभ के साथ फ़िल्में बनाते रहते तो अमिताभ की फिल्मोग्राफी औसत गुणवत्ता की फिल्मों से नीचे को न खिसकती|
इस सिलसिले में यश चोपड़ा की कभी कभी में साहिर लुधायनवी द्वारा लिखी पंक्तियाँ ही याद आती हैं|
मगर ये हो न सका और अब ये आलम है…
…[राकेश]
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