Martin Brest की प्रसिद्द फ़िल्म Beverly Hills Cops (1984) से प्रेरित होकर पंकज पाराशर ने जलवा बनायी थी जिसे, खट्टा मीठा, और चश्मे बद्दूर, जैसी रोचक मध्यमार्गी फ़िल्में निर्मित करने वाले निर्माता गुल आनंद का भरपूर सहयोग मिल गया|
भारत में 80 का दशक बहुत से घटनाक्रमों और उथल पुथल से भरा था| वैश्विक स्तर पर भी एड्स ने मानव जीवन को ऐसे ही काँपने पर मजबूर कर दिया था जैसे आजकल कोविड 19 ने| हॉलीवुड स्टार रॉक हडसन की एड्स द्वारा मृत्यु ने इसके भय को सारे विश्व में फैला दिया था और ड्रग्स का कोण भी इसमें जुड़ गया था| ड्रग्स के विरुद्ध ऐसा माहौल था कि दूरदर्शन ने ड्रग्स के प्रसार के विरोध में एक धारावाहिक – सुबह, बनवाया तो उसे प्रस्तुत करने अमिताभ बच्चन पहली बार छोटे पर्दे पर अवतरित हुये| अमिताभ उस वक्त इलाहाबाद, उ॰प्र॰, से सांसद हुआ करते थे और उस दौर में अमिताभ अखिल भारतीय स्तर पर एक बहुत ही बड़ा नाम होते थे|
दूरदर्शन के एक बेहद लोकप्रिय धारावाहिक करमचंद के निर्देशक पंकज पाराशर की ‘जलवा’ ड्रग्स की पृष्ठभूमि पर एक समसामयिक, मनोरंजक और लगभग अपनी तरह की एकमात्र हिन्दी फ़िल्म होने के अलावा ‘जलवा’ की बहुत सी खूबियाँ हैं| मसलन इसमें काम करने वाले अभिनेताओं की सूची भी रोचक है|
आम तौर पर ढ़ीली ढाली शारीरिक उपस्थिति वाले नसीरुद्दीन शाह इसमें जिम में तराशे गए कसरती शरीर के साथ एक्शन भूमिका में ऐसे रमें पाये जाते हैं मानों बरसों उन्होंने ऐसी ही फिल्में की हों| राम गोपाल वर्मा की रंगीला की नायिका (उर्मीला मार्तोंडकर) से कई बरस पहले समुद्र किनारे नृत्य करती अर्चना पूरन सिंह को देख बहुत से शायद विश्वास न करें कि ऐसे ग्लैमरस अवतार से शुरुआत करने वाली अभिनेत्री को कालांतर में हास्य भूमिकाओं में टाइप्ड करके सीमित कर दिया गया| ‘जलवा’ ने अर्चना के लिए बेहद आकर्षक अवसर उपलब्ध कराया था|
नायक कपिल (नसीरुद्दीन शाह) की माँ की भूमिका में थीं कामिनी कौशल, जिन्हें फ़िल्म बड़े रोचक अंदाज़ में दिलीप कुमार की दीवानी प्रशंसिका खाती है| हिन्दी फिल्मों में अभिनेता अभिनेत्रियों के प्रचलित कई किस्सों के मुताबिक एक किस्सा दिलीप कुमार और कामिनी कौशल का भी रहा है सो उस किस्से के जानकार दर्शकों के लिए फ़िल्म में माँ – बेटे के मध्य दिलीप कुमार को लेकर चलने वाले वार्तालाप अच्छे मनोरंजक हैं|
नसीर – ओम पुरी बहुत सी फिल्मों में साथ नज़र आए हैं और उस तुलना में नसीर और पंकज कपूर की जोड़ी साथ में कम नज़र आए है| जलवा में दोनों दोस्त बने हैं और ड्रग माफिया, नसीर के पुलिस इंस्पेक्टर चरित्र के इस गोवा स्थित दोस्त की हत्या उसकी आँखों के सामने कर देता है, नसीर पहले ही अपने छोटे भाई को ड्रग के कारण मरते देख चुके हैं और दोस्त की हत्या के बाद उनका बदले का अभियान शुरू होता है| लेकिन मुंबई के एक पुलिस अधिकारी का कोई भी रुतबा गोवा में नहीं चलता और अब नायक को कानून के दायरे से परे रहकर अपने बदले को अंजाम देना है| ड्रग माफिया और गोवा के पुलिस दोनों के लिए वह एक अवांछित तत्व है और ऐसी प्रतिकूल स्थितियों में नायक के प्रतिशोध की ही गाथा ‘जलवा’ है|
दो हास्य कलाकार इसमें पूरे रंग में हैं| एक हैं जॉनी लीवर, जो इस फ़िल्म से पहले एक अंजाने अभिनेता थे| दूरदर्शन के चर्चित धारावाहिक ‘हम लोग’ की हर कड़ी को अशोक कुमार प्रस्तुत किया करते थे और जॉनी लीवर इसमें अशोक कुमार की मिमिक्री करके खासे चर्चा में आए|
दूसरे हास्य कलाकार हैं सतीश कौशिक जो पुलिस सब इंस्पेक्टर बने हैं और फ़िल्म में अपने को इलाहाबादी और अमिताभ बच्चन का खास दोस्त बताते हैं| उनके द्वारा अमिताभ और क्रिकेट के बारे में ऐसे ही गप्प छोडते हुये एक बार अमिताभ वास्तव में उनके पास आकर खड़े हो जाते हैं और यह दृश्य दर्शकों को गुदगुदा जाता है| सतीश कौशिक की हड़बड़ाहट और अमिताभ का उनसे पूछना कि रामू भैया शॉट कहाँ मारें सिविल लाइंस की और या संगम की और अच्छे हास्य को जन्म देता है|
2-4 बरस पहले ही गांधी फ़िल्म में कस्तूरबा और गोविंद निहलानी की पार्टी में एक बड़े लेखक की कुंठित पत्नी की भूमिका और श्याम बेनेगल की कलयुग में नज़र आने वाली रोहिणी हटंगणी को सिगार पीती खलनायिका के रूप में देखना फ़िल्म के प्रति उत्सुकता जगाता ही जगाता है|
दूरदर्शन पर अँग्रेजी के समाचार वक्त्ता और थियेटर के कलाकार, जो अपनी दमदार आवाज और शख्सियत के लिए खासे मशहूर थे, तेजेश्वर सिंह, ने ‘जलवा’ में खलनायक की भूमिका निभाई|
उस ज़माने में कलाकारों के दिल कितने बड़े होते थे यह फ़िल्म के एक सीक्वेंस से स्पष्ट हो जाता है| एक टैक्सी ड्राईवर (जावेद खान) निर्देशक बासु चटर्जी से बहुत नाराज़ रहता है कि उन्होंने रजनी टीवी धारावाहिक में टैक्सी ड्राइवरों को बहुत गलत छवि के साथ दिखाकर एकपक्षीय कार्यक्रम दिखाया| वह अपनी टैक्सी में बासु चटर्जी की तसवीर लगा कर रखता है और एक चप्पल रखता है कभी तो बासु चटर्जी उसकी टैक्सी में बैठेंगे और जब ऐसा होगा वह चप्पल से उनकी मरम्मत करेगा| फ़िल्म में वास्तव में ही एक रात बासु चटर्जी उसकी टैक्सी में बैठने आ जाते हैं और हाथ में चप्पल लिए टैक्सी ड्राईवर उन्हें दौड़ा लेता है|
तेज रफ्तार का भाव जगाती संपादन कला और प्रयोगात्मक सिनेमेटोग्राफी के साथ-साथ जलवा को इसके संगीत के लिए भी जाना जाता है| आनंद मिलिंद के साथ रेमो फर्नांडीज ने भी एक गीत रचा जिसमें बोलों के नाम सिर्फ एक ही पंक्ति (देखो देखो ये है जलवा) है| इसी एक पंक्ति के दुहराव से जादू जगाया गया|
छोटे से बजट से बनी ‘जलवा’ कभी भी बासी न होने वाली मनोरंजक फ़िल्म है|
…[राकेश]
Discover more from Cine Manthan
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Leave a comment