7 अक्तूबर 1914 को जन्मीं अख्तरी बाई फैजाबादी 13 वर्ष की आयु की ही थीं जब एक कामांध धनपशु ने उन्हें यौनहिंसा का शिकार बनाया| उस दुर्घटना के फलस्वरूप उत्पन्न कन्या को बहुत सालों तक अख्तरी बाई की छोटी बहन के रूप में पाला और बड़ा किया गया| किशोरावस्था की शुरुआत में ही इतनी बड़ी घटना का सामना करने वाली अख्तरी बाई को संगीत ने सहारा और प्रसिद्धि वाला जीवन तो दिया लेकिन कष्ट और दुःख को अन्दर दबा कर रखने से मन के अन्दर बर्फीले शिलाखंड भी पनप गए होंगे|

बेग़म अख्तर अपने संगीत की कला के बलबूते प्रसिद्धि के शिखर पर विराजमान थीं तो 1937-38 में किसी समय मेहर बाबा के शिष्यों ने उन्हें बाबा के सामने आकर गीत गाने के लिए आमंत्रित किया था और लखनऊ से अहमदनगर तक की यात्रा और अन्य सभी प्रबंध करने का प्रस्ताव दिया था लेकिन संभवतः अपने व्यस्त जीवन के कारण या अन्य किसी कारण से बेग़म अख्तर ने इतनी ज़्यादा फीस मांगी कि उनसे मेहर बाबा के सामने गीत का कार्यक्रम देने की योजना फलीभूत न हो सकी| मेहर बाबा को इस बात का पता चला तो उन्होंने इस योजना पर काम करने वालों से कहा,  “उसे अभी मत बुलाओ; एक दिन वह खुद आएगी।”  

और ऐसा वास्तव में हुआ, 22-23 साल बाद| 13 जनवरी, 1963 को बेग़म अख्तर स्वयं ही बिना किसी निमंत्रण के मेहेराजाद पहुंच गयीं।

बाबा के पास उनके कई रिकॉर्ड थे और वे उनकी पसंदीदा गायिकाओं में से एक थीं।

उससे पहले भी रेडियो के अधिकारी गोलवलकर, जो पुणे में रहते थे, ने उन्हें एक साल पहले बाबा के सामने गाने के लिए कहा था, लेकिन उस समय गंभीर रूप से बीमार पड़ जाने के कारण वे ऐसा नहीं कर पाईं।

मेहेराजाद पहुंचकर बाबा के दर्शन करके बेग़म अख्तर खूब रोईं। शायद उनके अन्दर जो दुःख दर्द जमा हुआ पड़ा था उसे अध्यात्मिक चिकित्सा की आवश्यकता थी और बाबा के स्पर्श से उनके अन्दर के बर्फीले हिम खंड पिघल कर आंसुओं के माध्यम से बह चले|

उनकी बातों से ऐसा लगा जैसे वे वर्षों से बाबा के साथ आंतरिक संपर्क में थीं।

उन्होंने बाबा से कहा, “जिस दिन से मैंने आपका आह्वान सुना है, मैं आपके दर्शन के लिए तरस रही हूं और मैं हर दिन आपकी तस्वीर के सामने एक विशेष ग़ज़ल अवश्य ही गाती हूं।”

उन्होंने बाबा से प्रार्थना की कि वे उन्हें अपने सामने गाने की अनुमति दें, जिस पर बाबा ने कहा, “अभी तो मैं एकांत साधना में हूँ और संगीत सुनना संभव न हो पायेगा|”  

बेग़म अख्तर ने बार-बार प्रार्थना की, तो बाबा ने कहा, “मैं केवल एक शर्त पर अनुमति दूँगा कि आप अप्रैल या मई में किसी भी दिन पूना आकर गुरुप्रसाद में सभी लोगों के सामने चार से पाँच घंटे का प्रदर्शन करने के लिए सहमत हों। यदि आप सहमत हैं, तो मैं अभी एक ग़ज़ल सुनू लूँगा।”

वे प्रसन्न हो गयीं और उन्होंने श्रद्धापूर्वक शर्त स्वीकार कर ली। मल्लिका-ए ग़ज़ल, उन्हें कहा जाता था, और वे एक गीत के लिए उस दौर में एक हज़ार रुपये लेती थीं| इतनी प्रसिद्ध और सफल गायिका स्वयं बाबा के पास आईं और प्रार्थना की कि उन्हें उनके सामने गाने की अनुमति दी जाए।  केवल प्रेम ही ऐसे चमत्कार कर सकता है!

बाबा और कुछ शिष्यों के सम्मुख बेग़म अख्तर ने एक भजन गया जो वे नित्य बाबा के लिए अपनी दैनिक “प्रार्थना” के रूप में गाती थीं|

भजन गाते हुए भावातिरेक में उनकी आँखों से प्रेम और आनंद के आंसू बहकर उनके गालों पर ढलक  रहे थे।

बाबा ने उन्हें एक रूमाल दिया, जिससे वे अपने आंसू पोंछ सकें।

बाबा उनके उनके गायन से अति प्रसन्न हुए और बेग़म अख्तर ने एक गीत पर ही न रुक कर तीन और गीत गाए।

बाबा ने उनसे कहा, “मैं फकीरों का फकीर और बादशाहों का बादशाह हूं!”

बेग़म अख्तर ने कहा, “इसमें जरा भी संदेह नहीं हो सकता।”

बाबा ने उनसे पूछा कि गुरुप्रसाद में कार्यक्रम देने के लिए वे कितनी फीस लेंगी, तो बेग़म अख्तर ने  कहा, “मुझे आपके पेम और आशीर्वाद के सिवा कुछ नहीं चाहिए।”

बाबा उनके उत्तर से प्रसन्न हुए।

बेग़म अख्तर के साथ उनकी बेटी और उनके तबला वादक – कामत भी थे। कामत दो बड़ी मालाएं लाए, जिससे बेग़म अख्तर और उनकी बेटी बाबा के गले में मालाएं पहनाएं।

बेग़म अख्तर भावावेश में इतनी अभिभूत हो गईं कि उन्होंने दोनों मालाएं स्वयं ही बाबा के गले में डाल दीं!

बाबा ने उनसे कहा,”तुम्हें पता नहीं है कि तुमने अपने गायन से मुझे कितना खुश कर दिया है।

वे बोलीं, “मैं ऐसा करके बहुत खुश और अपने को भाग्यशाली महसूस कर रही हूं।

जाते समय वे बाबा के पैरों से लिपट गई और उनके घुटनों पर सिर रखकर बहुत देर तक चुपचाप रोती रहीं। बाबा उन्हें आशीर्वाद देकर चुप कराते रहे|

[Reference : Lord Meher by Bhau Kalchuri]

Note : Meher Baba observed silence from July 10, 1925, until He Left His body (January 31, 1969). He communicated first by using an alphabet board and later by unique hand gestures which were interpreted and spoken out by one of his disciples, often Eruch Jessawala.]


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