कहानी आधारित प्रसिद्द त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका – निकट, ने बीते साल 2024 का अपना अंतिम अंक प्रसिद्द साहित्यकार ‘प्रियंवद‘ के रचनाकर्म पर आधारित किया है|

हिंदी साहित्य पढने वालों में से बहुतों ने शायद प्रियंवद का रचा पढ़ा न हो क्योंकि उनके साहित्य को लेकर अतिरेक से भरे विचार ही ज्यादा मिलते हैं और इस मामले में वे अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे लेखकों के क्लब के सदस्य लगते हैं| या तो पाठक (अन्य साहित्यकार भी) उनके लिखे के प्रशंसक होते हैं या ऐसा पाठक वर्ग पाया जाता है जो शिकायत करता मिलता है कि उनका लिखा आसानी से पल्ले नहीं पड़ता| उनकी कुछ कहानियों पर छिड़ी चर्चाओं ने इन रचनाओं को विवादास्पद श्रेणी में भी भेजा|

साहित्य जगत में उनकी अलग अलग छवियाँ भी बनती बिगडती रहीं जिनमें ज्यादातर उन्हें बहुत दूर से देखे जाने या उनसे संवाद न कर पाने से निर्मित हुईं| वे जीविका के लिए अपने पारिवारिक उद्योग से जुड़े रहे हैं, यही एकमात्र तथ्य उन्हें अन्य साहित्यकारों से अलग करता चला गया|

वे (सबसे) मिलने जुलने में बहुत विश्वास नहीं रखते, और समय की बेहद पाबंदगी और रात में बहुत जल्दी सोने की (अच्छी) आदत और स्मार्ट फोन न रहने की निजी जिद, उन्हें ऐसे सामजिक मिलनों से अलग ही रखती आई है, तो सामान्य रूप में उनकी छवि एक अलग रहने वाले रचनाकार की बननी ही थी, क्योंकि यहाँ तो लोग समूहों में साहित्यिक सामजिक कार्यों को करने के आदि रहे हैं|

निकट‘ का ‘प्रियंवद‘ विशेषांक, हिन्दी साहित्य के पाठकों व नए लेखकों और अभी तक प्रियंवद से अपरिचित रहे पुराने लेखकों के सामने भी ‘प्रियंवद‘ और उनकी रचनाधर्मिता, रचने की प्रक्रिया और उनके निजी संसार को बहुत हद तक समीप लाकर खडा कर देता है|

जिस रचनाकार के ऊपर कोई भी पत्रिका एक विशेषांक बुनती है, तब वह रचनाकार एक तरह से उस पत्रिका के घर में मेहमान बन जाता है और अक्सर ही मेहमान की केवल प्रशंसा ही की जा सकती है| ‘निकट‘ के इस विशेषांक में ‘संपादकीय‘ में ही ‘प्रियंवद‘ की केवल प्रशंसा ही समाहित नहीं है बल्कि दो टूक तथ्य रखे गए हैं और संपादकीय से ही आरम्भ करते हुए इस विशेषांक को पढना शुरू करने वाले पाठक के सामने एक माहौल बन जाता है कि प्रियंवद और उनके रचना संसार के बारे में स्पष्ट बातें पढने को मिलेंगी जिनमें केवल लिहाज करने हेतु रची सामग्री नहीं मिलेगी और एक साफगोई के दर्शन हरेक लेख में मिलेंगे|

डॉ. खान अहमद फ़ारूक से प्रियंवद की विस्तृत बातचीत से प्रियंवद की यह प्रवृत्ति भी सामने आती है कि वे ऐसी सामग्री भी खोजते हैं रचने के लिए जो अन्यों से भिन्न हो और उसके छपने से सनसनी उत्पन्न हो| वे स्वंय भी स्पष्टवादी हैं अतः किसी मामले के बहुत से पहलुओं पर चर्चा से उन्हें गुरेज नहीं हैऔर उनकी आस्था रचनाधर्मिता के प्रति ईमानदारी बरतने से है| वे किसी पक्ष को इसलिए नहीं छिपाएंगे क्योंकि समाज में राजनीति उसे छिपाना चाहती है| उन्हें ऐसी बातें उघाड़ने में आनंद भी मिलता है , वे एक खोजी पत्रकार की भांति ऐसी बातों का खुलासा करते हैं जिन्हें वे समझते हैं कि बिरला ही किसी और ने उन्हें देखा या समझा होगा, यह पक्ष राजेंद्र यादव में भी देखने को मिलती थी| यह प्रवृत्ति विभिन्नता भरी किताबों और बहुत पढने वाले लेखकों के पास पायी जाती है| उन्हें अपने लिखे और अपने विचारों पर पूर्ण और अटल विश्वास है, ऐसा उनकी बातों से पता चलता है| देर से लिखना और प्रकाशित होना आरम्भ करने के बावजूद उन्होंने अपनी साख अर्जित की है और एक एकांतवासी लेखक के तौर पर ही की है तो उन्हें हिंदी साहित्य की गुटबाजी की भी परवाह नहीं है| उनका यह रुख उन्हें और उनके लेखन को आकर्षक बनाता है| वे एक अच्छे राजनीतिक उपन्यास की रचना करने के प्रति उत्सुक हैं और यदि वे इसे लिख पाए तो वह अत्यंत रोचक उपन्यास होगा क्योंकि उसमें उनकी शोधपरक प्रवृत्ति और अन्यों से भिन्न सामग्री रचने की क्षमता के भरपूर दर्शन होंगे|

अपनी बातों में कई सारगर्भित बातें ऐसी कह जाते हैं जिन्हें बतौर कोटेशन लोग उयोग में ला सकें| उनकी प्रेम कहानियां भी भिन्न हैं| उनमें बहुत कुछ तो ऐसा है जो सिनेमाई रूपांतरण के लिए एक कथा प्रस्तुत करता है लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जो परदे पर रचा नहीं जा सकता और यह तत्व उनके रचना कर्म के प्रति यह भाव जागृत नहीं होने देता कि एक पाठक ने उनके लिखे को पूरा पूरा साध लिया है| बहुत से लेखक अब ऐसा ही लिखने लगे हैं जैसे वे सिनेमा के लिए रॉ मेटेरियल गढ़ रहे हों| प्रियंवद इस लालच से परे रहकर विशुद्ध साहित्य रचते नज़र आते हैं अपनी रचनाओं में| यूं उनकी एकाधिक कहानियां सिनेमा में अवतरित हुयी हैं और शायद इसलिए वे इस रूपांतरण के प्रति बेहद सतर्क दिखाई देते हैं और पूर्ण नियंत्रण के साथ ऐसी किसी योजना की ओर कदम बढ़ाना पसंद करते हैं|

कम ही लेखक ऐसे बचे है जो अन्य लेखकों द्वारा शिद्दत से पढ़े जाते हों, प्रियंवद उन चंद साहित्यकारों की सभा के सदस्य लगते हैं जिनकी रचनाएं समकालीन साहित्यकारों द्वारा पूरी गंभीरता से पढी जाती हैं और उनके इस तरह के पाठक वर्ग में लेखिकाओं की संख्या ज्यादा लगती है, इससे यह भी पता लगता है कि उनके लिखे में ऐसा अवश्य है जो स्त्री मन को गहरे में छूता है| बाकी लेखक भी इसलिए पढ़ते होंगे कि देखें इस बार क्या तूफ़ान वे उठाने वाले हैं|

प्रियंवद अपने को एक प्रांसगिक हिंदी साहित्यकार और बुद्धिजीवी के तौर पर स्थापित कर चुके हैं और ‘निकट‘ का यह विशेषांक उनकी चंद रचनाएं, उनके साक्षात्कार और उनसे सम्बंधित अन्य साहित्यकारों के स्मरण और उनकी रचनाओं पर अन्य साहित्यकारों की समीक्षापूर्ण टिप्पणियों के माध्यम से ‘प्रियंवद‘ और उनके रचना संसार सेउनके रचना संसार से एक बेहतरीन परिचय कराने का दायित्व सफलतापूर्वक निभाता है| ऐसा कोई पाठक अपवाद स्वरूप भी न मिलेगा जो इस विशेषांक को पढ़कर प्रियंवद की अन्य रचनाओं को पढने के लिए उत्सुकता से न भर जाए|

…[राकेश]


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