सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन जी ने एक कविता लिखी थी –

वात्स्यायन जी की बहुत सी लघु कवितायेँ बड़े और गहरे प्रभाव वाली हैं| उनके रचनात्मक वर्षों में उनकी कविताओं, और अन्य विधाओं के लेखन पर पर्याप्त चर्चाएँ होती ही होंगी, समीक्षाएं और आलोचनाएँ भी छपती ही होंगीं| संभवतः उपरोक्त कविता पर भी भरपूर संवाद हुआ ही होगा| बेहद कम, सन्तुलित और बहुत आवश्यकता पर ही बोलने वाले वात्स्यायन जी ने शायद् अपनी इस कविता की समीक्षकों एवं आलोचकों द्वारा की गई व्याख्या, प्रशंसा, आलोचना या निंदा पर भी कुछ कहा होगा|

अब इस कविता द्वारा आधुनिक पाठकों के मन में जो प्रश्न उठेंगे उनके उत्तर देने के लिए कवि महोदय तो हैं नहीं| पर शायद उनके लेखन से सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर उनके लेखन और वाचन के इतिहास में प्राप्त हो जाएँ|

इस कविता में वात्स्यायन जी एक तरह से रामायण की कथा को कटघरे में खडा कर देते हैं| प्रथम दृष्टया स्थितियों और इतिहास के प्रति उनकी विवेचना बौद्धिक उत्तेजना उत्पन्न करने वाली तो है ही और बहुधा ऐसा होता भी है|

आधुनिक काल में इस प्रक्रिया का सबसे ज्वलंत उदाहरण फ़िल्म निर्माण है| एक फ़िल्म के निर्माण में लेखक, निर्माता, तकनीकी विशेषज्ञ (साउंड, कैमरा, संपादन, सेट सज्जा, लाईट, मेकअप आदि), निर्देशक, गायक, संगीतकार, और अभिनेताओं आदि का सामूहिक योगदान रहता है लेकिन सामने मुख्यतः अभिनेता और निर्देशक ही रहते हैं बाकी सब पार्श्व में चले जाते हैं|

यह भी है कि कई बार एक फ़िल्म एक व्यक्ति विशेष का विज़न होती है जैसे सत्यजीत रे की सभी फ़िल्में हैं, वे उनके विज़न का परिणाम हैं और उसे परदे पर उतारने हेतु उन्होंने अभिनेताओं सहित पूरी टीम जुटाई| सत्यजीत रे न केवल लेखन, निर्देशन और संपादन करते थे अपनी फिल्मों का बल्कि बहुधा उन्होंने कैमरा, कॉस्टयूम, सेट डिजायन, और संगीत तक की जिम्मेदारी भी निभाई|

आकर्षक होते हुए भी वात्स्यायन जी की कविता स्थितियों और परिस्थितियों का सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करती और सत्यजीत रे की फिल्मों की निर्माण विधि के आलोक में उपरोक्त कविता को परखें तो बहुतेरे प्रश्न इस कविता पर उठ खड़े होते हैं|

इस कविता को सिर्फ रामायण से सम्बंधित मानें तो नल-नील और वानर सेना के अन्य सदस्यों ने संभवतः इससे पहले भी तो अन्य और अनेक निर्माण किये ही होंगें, लेकिन इस बाबत उनकी प्रसिद्धि कहाँ है?

राम के संपर्क में आने से पूर्व भी सुग्रीवनल नीलजाम्बवत और अन्य वानर योद्धाओं के गुण वही रहे होंगे लेकिन वे बाली के अत्याचारों से सुग्रीव को न तो बचा पाए और न ही उसके विरुद्ध कोई युद्ध छेड़ उसे परास्त ही कर पाए|

राम के अभियान ने उन्हें एक मौक़ा दिया सेतु बनाने का जिसने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया| रावण से लड़ने जाना न तो उनका अपना लक्ष्य था न ही विगत में उन्होंने ऐसा कोई प्रयास ही किया था|

जिन चरित्रों पर इस कविता की नींव पडी है वे सब पुल बनाने वाले इस कविता के अर्थ से उलट यहाँ तो पार्श्व में न रहे बल्कि राम संग के कारण मानव इतिहास में अमर हो गए| राम भक्त हनुमान को छोड़ दें जो राम की भक्ति में लीन हो उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे, बाकी सारे वानर प्रजाति के चरित्र तो बस ऐसे ही जीवन व्यतीत कर रहे थे और ऐसे ही मानव स्मृति से लोप हो जाते अगर राम द्वारा रावण के विरुद्ध सभ्यता संघर्ष युद्ध में उनका साथ न देते| कभी बाली तो कभी रावण सरीखा कोई बलवान उन्हें प्रताड़ित करता ही रहता|

लंका तो स्थिर थी अपनी जगह समुद्र के दूसरी ओर| व्यापार हेतु ही दक्षिण भारत से लंका तक पुल बनाया जा सकता था लेकिन बनाया नहीं गया|

पुल बना राम के आह्वान पर, उनकी आवश्यकता पूर्ती हेतु|

यह कविता कालजयी और परिपूर्ण होती अगर इसमें ऐसे प्रश्न उठ जाने की गुंजाइश न बचती|

अंगरेजी में एक विद्वान ने युद्ध के संबंध में एक बात कही जिसका हिंदी में आसपास का अनुवाद निम्न प्रकार से हो सकता है

युद्धभूमि वह घटना स्थली है जहाँ सैनिक बोकर राजा उगाये जाते हैं|

कविता उपरोक्त्त पहलू को ध्यान में रखकर गढ़ी जाती तो अपने आप में पूर्ण होती लेकिन अभी वह सीमाओं से बंधी कविता है| राम कथा से जोड़ कर वात्स्यायन जी ने उसे सीमित कर दिया| अभी वर्तमान स्वरूप में कविता ऐसा प्रयास भर लगती है कवि का एकमात्र उद्देश्य यही रहा कि इस ढंग से भी सोचा जा सकता है| लेकिन इससे कविता को गहराई न मिल पायी और वह उथली रही| उसकी सार्वभौमिकता समाप्त हो गयी| विशेष ढंग से घटनाओं को देखो तो ही कविता लुभाती है, दूसरे कोण से देखें तो कविता अधूरी लगती है| महत्वपूर्ण बातों को नज़रंदाज़ करने वाली लगती है|

काश कि वात्स्यायन जी के जीवित रहते उनसे इस बारे में किसी ने वार्ता की होती!

…[राकेश]


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