ओशो महावीर के जीवन के सहारे अपनी बात कहते हैं|

महावीर के जीवन में एक घटना का उल्लेख है, जिस पर एक बहुत बड़ा विवाद चला। और महावीर के अनुयायियों का एक वर्ग टूट गया। और महावीर के पाँच सौ मुनियों ने अलग पंथ का निर्माण कर लिया उसी बात से। महावीर कहते थे जो हो रहा है वह एक अर्थ में हो ही गया है। अगर आप चल पड़े तो एक अर्थ में पहुंच ही गए।  अगर आप बूढ़े हो रहे है तो एक अर्थ में बूढ़े हो ही गए।

      महावीर कहते थे, जो हो रहा है, जो क्रियमाण है—वह हो ही गया। महावीर का एक शिष्‍य वर्षा काल में महावीर से दूर जा रहा था। उसने अपने एक शिष्‍य को कहा कि मेरे लिए चटाई बिछा दो। उसने चटाई बिछानी शुरू की। मुड़ी हुई, गोल लिपटी हुई चटाई को उसने थोड़ा सा खोला, तब महावीर के उस शिष्‍य को ख्‍याल आया कि ठहरो, महावीर कहते है—जो हो रहा है वही हो ही गया। तू आधे में रूक जा, चटाई खुल तो रही है, लेकिन खुल नहीं गयी है—रूक जा

      उसे अचानक ख्‍याल हुआ कि यह तो महावीर बड़ी गलत बात कहते हे। चटाई आधी खुली है, लेकिन खुल कहां गई है। उसने चटाई वहीं रोक दी। वह लौटकर वर्षा काल के बाद महावीर के पास आया और उसने कहा कि आप गलत कहते है कि जो हो रहा है, वह हो ही गया। क्‍योंकि चटाई अभी भी आधी खुली रखी है—खुल रही थी, लेकिन खुल नहीं गई। तो मैं आपकी बात गलत सिद्ध करने आया हूं। महावीर न उससे जो कहा,वह नहीं समझ पाया होगा, वह बहुत औसत बुद्धि का रहा होगा, अन्‍यथा ऐसी बात लेकर नहीं आता।

      महावीर ने कहा, तूने रोका—रोक ही रहा था….ओर रूक ही गया। वह जो चटाई खोलने का काम तूने रोका—रोक रहा था…रूक गया। तूने सिर्फ चटाई रुकते देखी,एक और क्रिया भी साथ चल रही थी, वह हो गयी। और फिर कब तक तेरी चटाई रुकी रहेगी। खुलनी शुरू हो गयी है—खुल ही जाएंगी….तू लौट कर जा| वह जब लौटकर गया तो देखा  एक आदमी खोलकर उस पर लेटा हुआ है। विश्राम कर रहा था। इस आदमी ने सब गड़बड़ कर दिया। पूरा सिद्धांत ही खराब कर दिया।

      महावीर जब यह कहते थे जो हो रहा है वह हो ही गया तो वह यह कहते थे, जो हो रहा है वह तो वर्तमान है, जो हो ही गया वह भविष्‍य है। कली खिल रही है। खिल ही गई—खिल ही जाएगी। वह फूल तो भविष्‍य में बनेगी, अभी तो खिल ही रही है। अभी तो कली ही है। जब खिल ही रही है तो खिल ही जाएगी। उस का खिल जाना भी कहीं घटित हो गया।

      अब इसे हम जरा और तरह से देखें, थोड़ा कठिन पड़ेगा।

      हम सदा अतीत से देखते है। कली खिल रही है। हमारा जो चिन्‍तन है, आमतौर से पास्‍ट ओरिएंटेड़ है, वह अतीत से बंधा है। कहते है कली खिल रही हे, फूल की तरफ जा रही है। कली फूल बनेगी…लेकिन इससे उल्‍टा भी हो सकता है। यह ऐसा है जैसे मैं आपको पीछे से धक्‍के दे रहा हूं, आपको आगे सरका रहा हूं। ऐसा भी हो सकता है कोई आपको आगे खींच रहा हो। गति दोनों तरफ हो सकती है। मैं आपको पीछे से धक्‍का दे रहा हूं,और आप आगे जा रहे हो।

      ज्‍योतिष का मानना है कि यह अधूरी है दृष्टि कि अतीत धक्‍का दे रहा है और भविष्‍य हो रहा हे।

पूरी दृष्‍टि यह है कि अतीत धक्‍का दे रहा है और भविष्‍य खींच रहा है। कली फूल बन रही है,इतनी ही नहीं—फूल कली को फूल बनने के लिए पुकार रहा है। खींच रहा है, भविष्‍य आगे हे। अभी वर्तमान के क्षण में एक कली है। पूरा अतीत धक्‍का दे रहा हे। खुल जाओ। पूरा भविष्‍य आह्वान दे रहा है, खुल जाओ, अतीत और भविष्‍य दोनों के दबाव में कली फूल बनेगी।

      अगर कोई भविष्‍य न हो तो अतीत अकेला फूल न बना पाएगा। क्‍योंकि भविष्‍य में आकाश चाहिए फूल बनने के लिए। भविष्‍य में जगह चाहिए स्‍पेस चाहिए। भविष्‍य स्‍थान दे तो ही कली फूल बन पाएगी। अगर कोई भविष्‍य न हो तो अतीत कितना ही सिर मारे, कितना ही धक्‍का माने—मैं आपको पीछे से कितना ही धक्‍का मारू, या दूँ।  लेकिन सामने एक दीवार हो तो मैं आपको आगे न हटा पाऊँ गा। आगे जगह चाहिए। मैं धक्‍का दूँ और आगे की जगह आपको स्‍वीकार कर ले, आमंत्रण दे-दे कि आ जाओ,अतिथि बना लें, तो ही मेरा धक्‍का सार्थक हो पाए। मेरे धक्‍के के लिए भविष्‍य में जगह चाहिए। अतीत काम करता है भविष्‍य जगह देता है।

      ज्‍योतिष की दृष्‍टि यह है कि अतीत पर खड़ी हुई दृष्‍टि अधूरी है, आधी—वैज्ञानिक हे, भविष्‍य पूरे वक्‍त पुकार रहा है, पूरे वक्‍त खींच रहा है। हमें पता नहीं हमें दिखाई नहीं पड़ता। यह हमारी आँख की कमजोरी है, यह हमारी दृष्‍टि की कमजोरी है। हम दूर नहीं देख पाते हमें कल कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।

~ ओशो

सन्दर्भ – ज्योतिष अद्वैत का विज्ञान


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