भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पुण्य तिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, अभिनेता राज बब्बर ने लिखा –
[भारत को शुरुआत के 3-4 दशकों में ही 3-4 लड़ाईयां लड़नी पड़ी – आंतरिक उथल पुथल भी ख़ूब हुए – लेकिन फिर आया राजीव जी का ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ने वाला दौर – विज्ञान | गवर्ननेंस | कूटनीति | सभी क्षेत्रों में नई तरह से सोचने वाले भारत और भारतीयों का दौर। आर्थिक उदारीकरण की पहली बीज उसी दौर में बोई गई और दलबदल करने वालों पर अंकुश तभी लगा।
आज जब 18 साल के युवा Voter देखता हूँ – उनके हाथों में Computer है – और ऐसे Consumer देखता हूँ जो अधिकारों से लैस हैं – तो इन सब के पीछे राजीव जी की छवि बरबस आ जाती है।
एक छोटा से कार्यकाल लेकिन उपलब्धियाँ हिमालय जैसी। #RajivGandhi ji की पुण्यथिति पर श्रद्धांजलि।]
राज बब्बर सदैव कांग्रेस में नहीं थे| शुरुआत उनकी समाजवादी पार्टी से भी नहीं हुयी| वे कॉलेज के जमाने से ही छात्र संघ की राजनीति में सक्रिय रहे और संभवतः अपने कॉलेज में वे समाजवादी विचारधारा के दल से संबंधित रहकर छात्र संघ के अध्यक्ष भी रहे| हिंदी फिल्मों से राजनीति में आने वाले तमाम अभिनेताओं – अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, सुनील दत्त, गोविंदा, हेमा मालिनी, जया बच्चन, धर्मेन्द्र, और सनी देओल आदि में राज बब्बर ही अकेले ऐसे हैं जिनकी राजनीतिक चेतना कॉलेज के जमाने में ही जाग्रत हो चुकी थी और यह आसानी से कहा जा सकता है कि अगर वे फिल्मों में न आये होते तो एनएसडी के बाद थियेटर करने के साथ वे सक्रियता से राजनीति से अवश्य ही जुड़े रहते और किसी समाजवादी विचारधारा के दल के सदस्य होते ही होते|
कांग्रेस में शामिल होने से पहले वे मुलायम सिंह यादव द्वारा स्थापित समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं|सपा के विकास में उन्होंने भी खून पसीना एक किया है| अमर सिंह के सपा में महत्वपूर्ण स्थान पाने से पहले वे सपा में बेहद महत्वपूर्ण समझे जाते थे| अमर सिंह की मुलायम सिंह यादव से बढ़ती नजदीकी और अमर सिंह की अमिताभ बच्चन से बढ़ी नजदीकी ने राज बब्बर को सपा से दूरी बनाने पर विवश किया| राज बब्बर की अमिताभ बच्चन से अंदुरनी अदावत उनके कई साक्षात्कारों से प्रकट होती है| उन्होंने सिर्फ संकेत ही दिए हैं इस बारे में|
शायद उन्हें यह लगता हो कि उनके फ़िल्मी जीवन के शुरुआती दौर में शक्ति, और नमक हलाल आदि बड़ी फिल्मों से बाहर करवाने में अमिताभ बच्चन का हाथ रहा होगा| जिस सपा की स्थापना के बाद से ही उसके विकास में उन्होंने मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर जीतोड़ मेहनत की थी, उसी सपा में अमर सिंह की स्थिति तेजी से बनी और अमर सिंह मुलायम सिंह यादव के बाद नंबर दो की स्थिति में कहे जाने लगे और वे वयोवृद्ध समाजवादी नेताओं के इलाज के लिए धन और चिकित्सा का इंतजाम करने की बात भी कहने लगे| अमर सिंह ने बड़े बड़े कॉर्पोरेट घरानों को सपा के नजदीक ला खड़ा कर दिया, और फ़िल्मी दुनिया को भी मुलायम सिंह यादव के पैतृक गाँव में लगने वाले जलसे में बुलवाने लगे| अमिताभ बच्चन निस्संदेह उस समय हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े नाम थे और उनके पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन को उत्तर प्रदेश का यश भारती सम्मान देने स्वयं मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मुंबई गए और अमिताभ बच्चन के आवास पर पुरस्कार दिया| और जो बच्चन परिवार कभी कांग्रेस के नेहरु–गांधी परिवार का नजदीकी मन जाता था उसे सपा के नजदीक ला खड़ा किया| ऐसी घटनाओं से राज बब्बर का ऐसा सोचना स्वाभाविक था कि सपा में अब उनकी वैसी पूछ नहीं रही जिसके वे अधिकारी थे|
इन फ़िल्मी संबंधों से इतर साल 1987 के भारत के राजनीतिक दौरे पर जाएँ तो भारत सरकार में पहले वित्त मंत्री और फिर रक्षा मंत्री बनाए गए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स तोपों के सौदे में दलाली खाने के आरोप लगाकर पूरे भारत में बवंडर मचा दिया था| इन्डियन एक्सप्रेस के अरुण शौरी, सुप्रीम कोर्ट के वकील राम जेठमलानी भी अपने अपने स्तर पर इस आग में नित्य घी डाल रहे थे| एक वरिष्ठ नौकरशाह भूरेलाल एक जाना पहचाना नाम भारत भर में हो गया था| अमिताभ बच्चन द्वारा संसद की सदस्यता से त्यागपत्र देने से इलाहाबाद लोकसभा सीट पर उपचुनाव घोषित हुआ और वीपी सिंह निर्दलीय चुनाव में खड़े हो गए| वीपी सिंह भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने को एक आंदोलनकर्मी सिद्ध करने के लिये पूरे देश में दौरे कर रहे थे| प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मिस्टर क्लीन की छवि को उन्होंने तार तार कर दिया था| लगभग सारा गैर कांग्रेसी विपक्ष उपचुनाव में वीपी सिंह के साथ था|
ऐसे माहौल में हिन्दी सिने उद्योग से दो अभिनेता अपने आरामतलब घरों से निकल कर आये और मई-जून की धूल भरी गर्मी में वीपी सिंह के समर्थन में रैलियाँ करने लगे| ये दो अभिनेता थे शत्रुघ्न सिन्हा और राज बब्बर| वीपी सिंह भरी गर्मी में मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर जगह जगह जनता से मिलने जा रहे थे|
शत्रुघ्न सिन्हा और राज बब्बर के यूं उस उपचुनाव में उतरने के पीछे उनकी अमिताभ बच्चन से प्रतिद्वंदिता नहीं थी, ऐसा कह पाना मुश्किल है| राज बब्बर तो राजनीतिक जीव रहे लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा ने इससे पहले कभी ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था कि उनकी रूचि चुनावी राजनीति में है| राज बब्बर तो भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम से उत्तेजित होकर वीपी सिंह के समर्थन में स्वाभाविक रूप से आ सकते थे, क्योंकि उनके लिए सक्रिय राजनीति से दूर रहना मुश्किल काम था, लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा का अनायास सक्रिय होना आश्चर्यजनक बात थी|
बहरहाल उस उपचुनाव और उसके बाद 1989 के लोकसभा चुनावों में वीपी सिंह द्वारा बनाये जनमोर्चा के एक सदस्य जनता दल के बैनर तले वीपी सिंह ने इलाहाबाद से और राज बब्बर ने आगरा से लोकसभा का चुनाव लड़ा और दोनों ही जीते| दोनों ने भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम में राजीव गांधी को भ्रष्ट ठहराने में कोई कसर न छोड़ी होगी| तब राज बब्बर को यह कहाँ ज्ञात होगा कि भविष्य में वे कांग्रेस में ही राजनीतिक ठौर पायेंगे|
शत्रुघ्न सिन्हा ने 1989 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रचार किया था और उससे विधिवत जुड़ गए थे| शत्रुघ्न सिन्हा को भी भाजपा में लगभग तीन दशक व्यतीत करने और हर मोड़ पर कांग्रेस का मुखर विरोध करने के बाद 2019 में लोकसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर ही लड़ेंगे? और उससे अगले चुनाव में कांग्रेस से ही टूटकर बनी तृणमूल कांग्रेस से सांसद बन जायेंगे|
भारत में राजनीतिक दलों के बीच मतभेद से उनके नेताओं की एक दल से दूसरे दल में होने वाली आवाजाही पर कोई अंतर नहीं पड़ता|
एक बड़ा दिलचस्प किस्सा है कि 1989 में विपक्ष में बैठने का निर्णय लेने के बाद जनमोर्चा सरकार के गठन के समय वीपी सिंह के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेते हुए उनके और राजीव गांधी के एक साथ हँसते हुए दृश्य सारी दुनिया ने देखे| पाकिस्तान के नेता नवाज शरीफ ने भी उन दृश्यों को देखा और जब वे राजीव गांधी से मिले तो उन्होंने अचरज प्रकट किया कि जिस आदमी ने उनके विरुद्ध इतना बड़ा आन्दोलन चलाया, विरोध में कितनी बातें कहीं, उसके साथ राजीव गांधी हाथ कैसे मिला सकते हैं और कैसे उससे हंस कर बात कर सकते हैं?
राजीव गांधी ने हंस कर उनसे कहा कि हमारे यहाँ यह सामान्य बात है, हम लोग राजनीतिक विरोध करते हैं व्यक्तिगत नहीं|
नवाज शरीफ ने कहा हमारे यहाँ तो यह मुमकिन ही नहीं|
भारत में पिछले 30 सालों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए और भाजपा के नेतृत्व वाले राजग गठबंधन ही केंद्र में मुख्य भूमिका में रहे हैं और यह सर्वविदित है कि यूपीए और राजग में विभिन्न दलों का आना जाना लगा ही रहता है| भाजपा को सांप्रदायिक दल बताते बताते राम विलास पासवान, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी राजग की केंद्र सरकार में कई बार मंत्री पद का सुख लेते रहे| राजग के बाद फिर से यूपीए में और पुनः राजग में आने की कारगुजारियां भी बहुत से नेता दिखा चुके हैं|
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग 2014 में केंद्र में सत्ता में आया तो उसमें 100 के लगभग ऐसे नेता लोकसभा चुनाव जीत कर आये थे जो चुनाव पूर्व कांग्रेस या अन्य दलों से सासंद थे|
राजनीति को इसीलिए संभावना का क्षेत्र कहा जाता है| यहाँ तात्कालिक स्थितियों के अनुसार निर्णय लिए जाते हैं और आपसी संबंध बनते और बिगड़ते हैं और नजदीक समझे जाने वाले नेता और दल एक दूसरे के विरोध में और कल तक कट्टर विरोधी समझे जाने वाले नेता और दल एक ही गठबंधन का हिस्सा बन कर सरकार बनाते और चलाते हैं|
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