हिंदी सिनेमा में नायक-नायिका की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेताओं की प्रसिद्द जोड़ियों में मिठुन चक्रवर्ती और रंजीता कौर की जोड़ी भी रही है, जिन्होंने अपने फिल्मी जीवन के शुरुआती दौर में बहुत सी फ़िल्में एक साथ कीं| यह कहना भी शायद तथ्यात्मक रूप से सही हो कि मिठुन–रंजीता की जोड़ी ने सबसे ज्यादा बार बरसात में भीगने वाले गीतों को सिनेमा के परदे पर प्रस्तुत किया होगा| उस दौर की उनकी लगभग हरेक फ़िल्म में एक गीत तो बरसात में फिल्माया ही गया|
अच्छे अभिनय के साथ, लम्बा कद, कसरती शारीरिक सौष्ठव, नृत्य करने में सहूलियत वाली दक्षता और जूड़ो- कराटे के परिभाषित एक्शंस को पूरे आत्मविश्वास से एक्शन सीन्स में निभाना, जैसे गुण मिठुन चक्रवर्ती की शुरुआती फिल्मों में उनकी नैया सफलतापूर्वक खेने वाले पतवार बने और वे सदा ही चर्चा में बने रहे| उनके शारीरिक गुणों को परदे पर प्रदर्शित करने का लोभ उनकी शुरुआती फिल्मों के निर्देशकों के सामने रहता ही होगा इसी नाते उन्हें बरसात में भीगने के गीत भरपूर मात्रा में मिले, जहाँ फ़िल्मी कैमरा उनकी मजबूत मांसपेशियों का प्रदर्शन कर सका|
मिठुन की शुरुआती फिल्मों को बी ग्रेड की फ़िल्में करार दिया जाता रहा है| कम बजट की इन फिल्मों ने अपने स्तर पर बॉक्स ऑफिस पर सफलता प्राप्त की और मिठुन को सफलता की रेस में हरदम बनाए रखा| इनमें से अपवाद को छोड़कर हर फ़िल्म का संगीत बेहतरीन था| रविन्द्र जैन, राम लक्ष्मण, बप्पी लाहिरी, और ऊषा खन्ना आदि द्वारा संगीतबद्ध फिल्मों में हेमलता, सुरेश वाडकर, येसुदास, बप्पी लाहिरी, ऊषा मंगेशकर, और जसपाल सिंह की गायिकी में शानदार गीत मिल जाते हैं|
भयानक (1979) उस दौर की फ़िल्म है जब भारत में 99% लोगों ने न तो ड्रैकुला उपन्यास पढ़ा होगा न उस पर हॉलीवुड में बन चुकी फ़िल्में देखी होंगी| भयानक को हॉरर फ़िल्म के तौर पर बनाया गया और नीलू फूले और उनके परदे पर दिखाए परिवार व साथियों, जिनमें सिर्फ साधु मेहर को तब के दर्शक पहचनाते होंगे, के माध्यम से परदे पर खौफ़ पैदा करने का प्रयास किया गया|
कब्रिस्तान से शुरू हुयी फ़िल्म में शुरू के पांच मिनट में ही कब्रिस्तान के बाहर मिलने वाले नायक नायिका, जो रिश्तों व संबंधियों से वंचित हैं, एक और बार मिलकर ही परस्पर प्रेम में पड़ जाते हैं और बरसात में भीगते हुए एक गीत को प्रस्तुत करने लगते हैं| इसी गीत के बीच में ही नायक नायिका का विवाह भी संपन्न हो जाता है| फ़िल्म की लचर शुरुआत और गीत की खूबसूरती से मैच करता फिल्मांकन न दे सकने के बावजूद गीत आकर्षित करता है|
इन्दीवर के लिखे और ऊषा खन्ना द्वारा संगीतबद्ध गीत को हेमलता ने बड़े सुरीले अंदाज़ में गया है| झुलसाने वाली गर्मियों में जब बरसात का विचार मात्र ही आँखों के सामने एक राहत भरा सौन्दर्य से भरपूर वातावरण रच देता है, तब इन्दीवर द्वारा रचे ऐसे गीत के बोल सावन और बरसात की महिमा भारतीय जीवन में पुनर्जीवित कर देते हैं| इन्दीवर ने सरल और लयबद्ध बोलों से गीत की रचना की और जिस सुर में हेमलता ने इसे गया है यह सुनने वाले के कानों में घर कर बैठता है और उसके जेहन में लूप में चलता जाता है| गीत की बुनावट इतनी सरल एवं लयबद्ध और संगीत इतना मधुर है कि शौकिया गुनगुनाने वाले श्रोता भी गीत का मुखड़ा ही सुनकर हर इसकी पुनरावृत्ति हने पर इसके साथ गुनगुनाते अवश्य हैं|
राग मल्हार और कजरी जैसी लोक गायन पद्यति से प्रेरित गीत की संगीत संरचना में सितार, गिटार, तबला, ढोलक, बांसुरी , वायलिन आदि वाद्य यन्त्र शास्त्रीय एवं पाश्चात्य सॉफ्ट मेलोडी का मधुर संगम सुनाई देता है| कहरवा और रूपक तालों का मिश्रण गीत को संगीत के झरने की तरह प्रवाहमयी बनाता है|
भीगा भीगा मौसम आया
बरसे घटा घनघोर
प्रीत का पहला नटखट सावन
देखो मचाये कैसे शोर
भीगा भीगा मौसम आया
बरसे घटा घनघोर
भीगा, मौसम, घटा, बरसे, घनघोर, प्रीत, नटखट, सावन, मचाये, शोर जैसे खूबसूरत लगते शब्दों से सजा हुआ गीत का मुखड़ा आकर्षक है जो इसे सावन के मौसम के एक रोमांटिक गीत का रूप प्रदान कर देता है| श्रृंगार रस से भरपूर मुखड़े की सुन्दरता किसी ज्यादा काबिल फ़िल्म निर्देशक की कुशल कल्पना का सहयोग मिल जाता तो गीत का फिल्मांकन भी गज़ब ढा देता|प्रेमीगणों के दिलों को गुदगुदाने और उन्हें प्रेम के हिंडोले पर झुलाने भेजने में गीत का मुखड़ा बेहद कामयाब रहता है| प्रीत का पहला नटखट सावन – गागर में सागर जैसी अभिव्यक्ति इन्दीवर ने प्रस्तुत की है|
दिल जिस तरह न भूले धड़कना
मैं भी तुझे यूं न भूलूँ
मेरे सनम नहीं ये भी कम
ख्यालों में अगर तुझको छूलूँ
सात जनम का साथ हमारा
छूटे न ये डोर
प्रीत का पहला नटखट सावन
देखो मचाये कैसे शोर
भीगा भीगा मौसम आया
बरसे घटा घनघोर
प्रकृति के विविधता से भरे सौंदर्य के साथ नायिका के प्रेम भरे उदगार जब मिल जाते हैं तो गीत के पहले अंतरे की संरचना सामने आती है| अंतरे में नायिका नायक से विवाह के समय अपने जीवन में नायक की महत्ता का वर्णन कर दोनों के आपसी संबंध में स्थायित्व और गहराई को दर्शा रही है| अनाथ किस्म के नायक नायका के मध्य तेजी से बढ़ती नजदीकी विवाह में परिणत हो जाती है और इस अनपेक्षित तेज रफ़्तार रिश्ते की गहराई से अभिभूत होकर नायिका सात जन्म के स्थायी संबंध की बातें करती है, प्रेमी जो अब पति बन गया है उसे तसव्वुर में ही छूने को भी बड़ी बात समझती है|
इतना मुझे मिला तेरा प्यार
मन में मेरे न समाये
रखना मुझे छुपा के सदा
दुनिया नहीं छीन पाए
बूंदों की सरगम, नाचे
छमछम मेरे मन का मोर
प्रीत का पहला नटखट सावन
देखो मचाये कैसे शोर
भीगा भीगा मौसम आया
बरसे घटा घनघोर
बहुत ज्यादा शीघ्र ही मिल जाए तो व्यक्ति को अपने भाग्य पर भी भरोसा नहीं होपता कि ऐसे कैसे हो सकता है| उसे एक भय सताने लगता है कि जो मिल रहा है वह कहीं उससे ले न लिया जाए, उससे छीन न लिया जाए| नायिका प्राप्य को छिपा कर रखने की बात करती है| पर इस प्राप्य के कारण अपने अन्दर घर करते जा रहे प्रसन्नता से भरे चित को संभाल पाने में भी असफल है| उसका अंतर्मन उससे गुजारिश करता है कि इतनी खुशी में तो मयूर की तरह नाच|
खुद से ही मैं डरने लगी हूँ
दिल में वो अरमा जगे हैं
टूटे नहीं सीमा कहीं
सागर में तूफ़ान उठे है
प्यार की हलचल जीवन चंचल
मन पे रहा न कोई जोर
प्रीत का पहला नटखट सावन
देखो मचाये कैसे शोर
भीगा भीगा मौसम आया
बरसे घटा घनघोर
प्रीत का पहला नटखट सावन
देखो मचाये कैसे शोर
भीगा भीगा मौसम आया
बरसे घटा घनघोर
प्रेम संबंध की सीढ़ी पर और ऊंचा चढ़ने के लिए नायिका का मन उत्सुक भी और इसी नाते उससे संकेतों में प्रणय निवेदन भी करवा रहा है लेकिन अनजाने का हल्का भय भी है| भय और उत्सुकता की जंग में भय को ही हारना होता है और इसी की घोषणा नायिका करती है – मन पे रहा न कोई जोर, कहकर| प्रेम संबंध में उसके पूर्ण समर्पण की यह शुरुआत है|
इस गीत का दूसरा भाग भी है जो फ़िल्म में बाद में आता है जब नायक को ऐसा भ्रम होता है कि मृत नायिका की भटकती रूह उसके सामने गीत गा रही है|
फिर वही सावन
फिर वही रिमझिम
फिर वही बादलों का शोर
याद पुरानी बीती कहानी
खींचे मुझे तेरी ओर
जन्मों के ये रिश्ते नाते
जन्मों तक चलते हैं
मिल जाती हैं रूहों से रूहें
सिर्फ बदन जलते हैं
तन से बिछड़ने के
होने वाले होते हैं संजोग
मन की अंतरतम गहराई तक जो प्रेम संबंध पहुँच गए वे फिर मिटाए नहीं मिटते| ऐसे संबंध अशरीरी होते हैं| नायिका की रूह नायक को जताती है कि चिता की अग्नि में केवल बदन जलते हैं, रूह अलग नहीं हो पातीं| तन से बिछोह के भी संयोग होते हैं|
गीत का यह दुखद भाग नायक नायिका के मध्य संबंध का एक वर्तुल पूरा करता है और गीत को न केवल नायक के जीवन में कालजयी बनाता बल्कि श्रोता और दर्शक के लिए भी एक अविस्मरणीय गीत इसे बना देता है
…[राकेश]
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