प्रिय,

मौन आशीर्वाद है,

लेकिन यह मौन तुम्हारे द्वारा रचा नहीं जा सकता|

क्योंकि तुम तो स्वयं में शोर ही हो|

इसलिए तुम कैसे मौन रच सकते हो?

लेकिन तुम मौन का भ्रम अवश्य ही रच सकते हो|

और मौन का यह भ्रम

स्वयं को सम्मोहित करने की विधियों द्वारा रचा जा सकता है|

इसलिए मौन होने के लिए आत्म-सम्मोहन विधि का पालन करते हुए

स्वयं को मौन होने का सुझाव कदापि न देना|

इसके बदले तुम अपने लगातार चलायमान मस्तिष्क के प्रति जागरूक हो जाओ|

इसे शांत व स्थिर बनाने का प्रयत्न मत करो

केवल इसे समझने का प्रयास करो|

अपने मस्तिष्क की क्रियाओं के बारे में विकसित समझदारी

मौन के प्रकाश की ओर ले जाती है

वह ऐसा मौन नहीं होगा जो शोर की अनुपस्थिति से जन्मता है|

बल्कि वह परम आनंद की अनुभूति होगी|

(ओशो)

Letter Courtesy : Sharing Wisdom


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