भारत में ब्रितानी राज के दौर में द्वितीय विश्व युद्ध के समय वायसरॉय की एक्जीक्यूटिव काउन्सिल में शिक्षा समिति के एक सदस्य थे श्री एन आर सरकार|

1945 में श्री सरकार ने एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें आईआईटी की अवधारणा पहली बार प्रकाश में आई| श्री सरकार ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि ऐसे संस्थान देश के विभिन्न हिस्सों में शुरू किये जाने चाहिए।

एन.आर. सरकार रिपोर्ट की सिफारिशों पर कार्य चला और अंततः 1950 में खड़गपुर में पहला भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान स्थापित किया गया। भारत सरकार ने एन. आर. सरकार रिपोर्ट की अन्य सिफारिशों को स्वीकार करते हुए मित्र देशों की सहायता से और अधिक प्रौद्योगिकी संस्थान स्थापित करने का निर्णय लिया| पहली सहायता यूएसएसआर से आई जो बम्बई (मुंबई) में यूनेस्को के माध्यम से एक संस्थान की स्थापना में सहयोग करने के लिए सहमत हो गया।

इसके बाद पश्चिम जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन के सहयोग से क्रमशः मद्रास, कानपुर और दिल्ली में प्रौद्योगिकी संस्थान स्थापित किये गए।

यहाँ यह तथ्य भी गौर तलब है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों से दशकों क्या सौ वर्ष से ज्यादा बड़ी उम्र वाले तकनीकी संस्थान, जो इंजीनियरिंग की शिक्षा प्रदान करते थे, भारत में अस्तित्व में थे| इन डेढ़ दर्जन इंजिनियरिंग तकनीकी शिक्षा संस्थानों की सूची नीचे दी गयी है|

IITs से पुराने 17 संस्थानों में से तीन को सन 2001 या उसके बाद IIT संस्थानों में परिवर्तित कर दिया गया| एक IISc को छोड़ दें तो बाकी किसी भी तकनीकी संस्थान को भारत सरकार या राज्य सरकारों की ओर से कभी भी इतना फंड नहीं मिला जितना किसी भी IIT को शुरू से ही मिलता रहा है| हालत यह रही है कि अगर किसी राज्य में स्थित एक IIT और उसी राज्य में पहले से चले आ रहे तकनीकी संस्थान के वार्षिक फंड में 20 से लेकर 100 गुने का अंतर रहा है| फंड की इतनी कमी के बावजूद कई पुराने तकनीकी संस्थानों ने बार बार IIT संस्थानों को कड़ी टक्कर दी है|

चाहिए तो भारत की सरकारों और राज्य सरकारों को यह था कि इन संस्थानों को भी उचित संरक्षण देकर इन्हें वैश्विक स्तर के संस्थान बनातीं लेकिन फंड्स की कमी से ये संस्थान उतनी तरक्की कर नहीं पाए जितनी तरक्की के ये अधिकारी थे| IIT संस्थानों का आधा बजट भी इन्हें दिया जाता तो ये बहुत बेहतर कर सकते थे|
ब्रेन ड्रेन के दौर में भी भारतीय उद्योग इन्हीं तकनीकी संस्थानों से निकलने वाले स्नातकों के भरोसे विकास की राह पर चल पाए हैं| भारत के औद्योगिक विकास में इन तकनीकी संस्थानों का योगदान IIT संस्थानों से ज्यादा नहीं तो बराबर तो रहा ही है, वह भी बहत का फंड्स मिलने के बावजूद| जहाँ IIT संस्थानों से निकलने वाले स्नातकों का बहुत बड़ा हिस्सा विदेश जाता रहा है, कभी उच्च शिक्षा के नाम कभी वहीं बसने की खातिर, इन पुराने तकनीकी संस्थानों के स्नातकों ने भारत में औद्योगिक आवश्यकताओं से भरपूर टक्कर ली है|




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