
उपरोक्त उद्धरण पीयूष मिश्र के आत्मकथात्मक उपन्यास – तुम्हारी औकात क्या है, से लिए गए हैं| वे अपने कई साक्षात्कारों में भी सूरज बड़जात्या द्वारा निर्देशित “मैंने प्यार किया” की बाबत बता चुके हैं कि राजकुमार बड़जात्या मुंबई से दिल्ली में एनएसडी परिसर में आये थे, अपनी एक नई फ़िल्म के नायक की तलाश में| राजश्री प्रोडक्शन की इस नई फ़िल्म से उनका बेटा सूरज बड़जात्या अपनी निर्देशकीय पारी की शुरुआत कर रहा था|
मोहन महर्षि दो साल (1984-1986) एनएसडी के निदेशक रहे, और पीयूष मिश्रा भी 1986 में ही एनएसडी से पढ़कर निकले| “मैंने प्यार किया” 1989 के दिसम्बर माह के आख़िरी शुक्रवार को प्रदर्शित हुयी थी| इन सभी विवरणों में पीयूष मिश्रा की थ्योरी फिट बैठती है| वे तीन साल बाद जब मुंबई पहुंचे तब तक फ़िल्म बनकर रिलीज हो चुकी थी|
“मैंने प्यार किया” के सन्दर्भ में दीपक तिजोरी और आशुतोष गोवारीकर की कही बातें भी विगत वर्षों में सामने आयी हैं कि उन दोनों के नाम पर भी इस फ़िल्म के नायक की भूमिका के लिए विचार किया गया था हो सकता है दोनों ने इस हेतु स्क्रीन टेस्ट भी दिया हो| यह भी पूरी तरह संभव है कि इन तीनों के अलावा भी अन्य नवोदित कलाकारों के नाम पर भी विचार हुआ हो, लेकिन फ़िल्म तो सलमान खान को नायक की भूमिका में लेकर ही बनी|
“मैंने प्यार किया” एक बेहद सफल फ़िल्म है और सभी को इस फ़िल्म के इतिहास से किसी न किसी तरह जुड़ना अच्छा लगता होगा| लेकिन यह बिलकुल भी आवश्यक नहीं है कि अगर इस फ़िल्म में नायक की भूमिका – पीयूष मिश्रा, दीपक तिजोरी या आशुतोष गोवरीकर में से कोई एक अभिनेता निभाता और तब भी फ़िल्म इतनी बड़ी सफलता प्राप्त करती|
एक फ़िल्म बनाते समय कई अभिनेताओं के नामों पर विचार किया जा सकता है लेकिन अंततः जिस अभिनेता के साथ फ़िल्म बनती है और अगर फ़िल्म सफलता प्राप्त करती है तो उसमें उस अभिनेता की उपस्थिति और अभिनय का भी योगदान होता है|
जैसे शोले, और दीवार के सन्दर्भ में भी उनकी विभिन्न भूमिकाओं के लिए अन्य अभिनेताओं के नाम सामने आते हैं तो उस बारे में भी यही कहना सार्थक होगा कि भिन्न कास्ट के साथ भी ये फ़िल्में इतना बड़ा स्थान अपने लिए बना पातीं यह कतई भी आवश्यक नहीं है|
मैंने प्यार किया के सन्दर्भ में ही देखें तो दीपक तिजोरी ने एकल नायक वाली ऐसी कोई फ़िल्म नहीं की जिसके आधार पर उन्हें इस फ़िल्म के नायक के रूप में कल्पित किया जा सके| आशुतोष गोवरिकर ने किसी फ़िल्म में एकल नायक की भूमिका निभाई हो ऐसा भी साधारण सिने दर्शक को तो ज्ञात नहीं है| उस समय वे केतन मेहता की टेली फ़िल्म – होली, और अमोल पालेकर के दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक – कच्ची धूप, में ही देखे गए थे और उनमें निभाई उनकी भूमिकाओं और “मैंने प्यार किया ” के नायक में बहुत ज्यादा अंतर है|
दीपक तिजोरी और आशुतोष गोवरिकर से इतर पीयूष मिश्रा एनएसडी जैसे ख्यति प्राप्त संस्थान से थियेटर की औपचारिक शिक्षा पाए हुए कलाकार थे और निस्संदेह वे इन दोनों और सलमान खान के समक्ष भी एक ट्रेंड एक्टर थे| शायद वे इस भूमिका को भी प्रभावशाली ढंग से निभा जाते|
लेकिन फिल्मों में उनकी चयनित भूमिकाओं को देखते हुए अब यह बेहद कठिन स्थिति लगती है कि उन्हें “मैंने प्यार किया” के नायक के रूप में कल्पित किया जा सके|
उन्होंने तकरीबन दस साल बाद 1998 में मणि रत्नम की फ़िल्म – दिल से में सीक्रेट सर्विस एजेंट की एक छोटी भूमिका निभाकर फ़ीचर फिल्मों के संसार में प्रवेश किया| और इसे स्वीकार करने में उन्हें खुद भी कोई परेशानी नहीं होगी कि फ़िल्म में वे औसत और प्रभावहीन स्तर का अभिनय ही दर्शा पाए, वे अपनी भूमिका में कतई भी रूचि लेकर अभिनय करने वाले अभिनेता प्रतीत नहीं हुए| इस फ़िल्म को देख ऐसा ही लगता है कि बस उन्होंने एक ड्यूटी की तरह अरुचि से इस फ़िल्म को कर दिया था|
सलमान खान कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन वे गुलाल में पीयूष मिश्रा द्वारा दर्शाए अभिनय कौशल की बराबरी नहीं कर पायेंगे, भारत के किसी अन्य बेहतरीन अभिनेता को भी समस्या आ सकती है|
लेकिन इसी तरह मैंने प्यार किया के नायक के चरित्र के ढांचे में संभवतः पीयूष मिश्रा भी फिट न हो पाते भले ही वे उस चरित्र के भावनात्मक पक्ष को बहुत ज्यादा गहराई से प्रकट कर सकते थे लेकिन सलमान खान ने एक अमीर नवयुवक प्रेमी के रूप में अपनी उपस्थिति से जो जगह घेरी उसके लिए किसी भी अभिनेता को ऐसी अमीरी को ओढना बिछाना पड़ता और सामान्यतः जो ऐसी अमीरी को जीकर बड़े होते हैं वही इसमें ज्यादा प्राकृतिक लगते हैं| ऐसी भूमिकाएं कुमार गौरव, संजय दत्त, आमिर खान, बॉबी देओल, जैसे सितारा पुत्रों या शाहरुख खान जैसे अभिनेताओं के लिए एक आकर्षक पिच तैयार करती हैं जहाँ वे सहूलियत से खेल सकते हैं| एन एस डी पथ से आये अभिनेताओं के लिए ऐसी भूमिकाएं निभाना इतना आसान कभी नहीं रहा| उनका अभिनय का व्याकरण ऐसी भूमिकाओं से मैच नहीं कर पाता|
राजश्री प्रोडक्शन अगर इस फ़िल्म को अपनी पुरानी फिल्मों की तर्ज पर ही बनाता, तो पीयूष मिश्रा फिट हो जाते लेकिन यह भी एक तथ्य है कि राजश्री की फिल्मों से किसी नायक को ऐसा सितारापन प्राप्त नहीं हुआ जैसा सलमान खान को “मैंने प्यार किया” से प्राप्त हुआ| किसी फ़िल्म को सफलता ऐसे ही नहीं मिल जाती, एक सम्पूर्ण कलात्मक उत्पाद के रूप में उसमें वहुत सी बातें सांचे में ढली प्रतीत होती हैं तभी वे बड़े स्तर पर दर्शकों की स्वीकृति को पा पाती हैं|
एनएसडी से शिक्षित अभिनेताओं में केवल राज बब्बर ही ऐसे हैं जिन्होंने शुरुआत से ही हिन्दी सिनेमा में प्रचलित शैली में बनने वाली हिन्दी फिल्मों में नियमित नायकों की भूमिकाएं प्राप्त कीं और स्टारडम प्राप्त किया| इरफ़ान खान को नायक की भूमिकाएं बहुत सालों के संघर्ष के बाद मिलीं, और एकल नायक की नियमित भूमिकाएं तो बहुत ही कम मिलीं वे भी अभिनय जीवन के उत्तरार्द्ध में|
पीयूष मिश्रा अगर इसी “मैंने प्यार किया‘ के नायक बन जाते तो यह फ़िल्म तब एक अलग रूप और भाग्य लेकर सामने आती|
जैसे शोले में अगर शत्रुघ्न सिन्हा –जय बन जाते और डैनी- गब्बर सिंह तो वह फ़िल्म अलग ही रूप ले लेती या दीवार राजेश खन्ना या शत्रुघ्न सिन्हा के साथ ऐसा रूप न लेती जैसा अमिताभ बच्चन के होने से इसने लिया|
समर्थ अभिनेता अपने रंग में फ़िल्म को ढाल लेते हैं| हर भूमिका हर अभिनेता के लिए नहीं होती| पीकू में अमिताभ बच्चन द्वारा अभिनीत भूमिका को बंगाली अभिनेता, सौमित्र चटर्जी, विक्टर बनर्जी या धृतमान चटर्जी करते तो फ़िल्म में ज्यादा और विश्वसनीयता आती|
किसी अभिनेता ने अभिनय में अपनी विशाल रेंज दिखाई हो तो मामला अलग हो जाता है| उसके बाद भी एक बहुत अच्छे अभिनेता की रेंज से बाहर ऐसे चरित्र अवश्य होते हैं जहाँ वह उतना प्रभावशाली नहीं लगता|
बी आर चोपड़ा ने अफसाना अशोक कुमार के साथ बनाई और दो दशक बाद उसी कहानी पर दास्तान दिलीप कुमार के साथ और दोनों फ़िल्में अपने आप में समर्थ लगती हैं|
बी आर चोपड़ा नया दौर पहले अशोक कुमार के साथ बनाना चाहते थे लेकिन अशोक कुमार ने विवशता जाहिर की कि वे एक ग्रामीण तांगे वाले की भूमिका में सहज न लगेंगे और उन्हें दिलीपकुमार को लेने का सुझाव दिया| शुरुआती हिचक के बाद दिलीप कुमार मान भी गए और एक कालजयी फ़िल्म बन गयी|
…[राकेश]
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