निर्देशक सार्थक दासगुप्ता की फ़िल्म – Music Teacher के पास, एक कहानी है, जिसे उन्होंने स्वंय ही लिखा है, और उसके भावों को विस्तार और गहराई से दर्शकों तक पहुंचाने के लिए अच्छे अभिनेता, शानदार कैमरा निर्देशक एवं स्वंय का समर्थ निर्देशन भी है| फ़िल्म को एक पर्वतीय जगह पर स्थित किया गया है अतः पर्वतीय सौंदर्य और वहां का सामजिक परिवेश भी फ़िल्म में स्वतः ही आ जाता है| निर्देशक, डीओपी और अभिनेताओं की टीम सतत प्रवाह में बहती कहानी और इसके भावों को दर्शकों तक पहुंचाने में कुछ को छोड़ ज्यादातर दृश्यों में कामयाब रहती है|
संगीत में पंचम के फ़िल्मी संगीत संसार से दो गीतों [फिर वही रात है (घर1978), और, रिमझिम गिरे सावन (मंजिल1979)] को उधार लेकर नए पैकेज में प्रस्तुत किया गया है लेकिन किशोर कुमार की अद्भुत गायिकी के समक्ष उनके निष्ठावान और उन्हें लगातार सुनने वाले संगीत रसिकों को Papon की गायिकी और आवाज़ इन दोनों गीतों के पुनः प्रदर्शन में भा जाये ऐसी संभावना कम ही है| फ़िल्म में यदि नायक या नायिका को गायक या संगीतकार दिखाया जा रहा है तो निर्देशक और संगीत निर्देशक को पुराने गीत/गीतों के नए संस्करण बनाने से परहेज करना चाहिए, इससे उनका और उनकी फिल्मों का नुकसान ही होता है, लाभ कुछ भी नहीं होता| अगर फ़िल्म के नायक नायिका संगीत से जुड़े हुए हैं उसी में अपना जीवन खोज रहे हैं तो वे पुराने गीत क्यों गायेंगे, अपने ही (इस दौर के नए बने) गीत क्यों न गायेंगे? पुराने गीत के नए संस्करण पुराने की श्रेष्ठता से तुलना ले आते हैं, और नए चरित्र को कमजोर बनाते हैं| किशोर कुमार की गायिकी के सामने Papon की गायिकी में पुराने शानदार गीतों को फ़िल्म के नायक के मुंह से सुनने के बाद बहुत से दर्शकों को नायक की संगीत में श्रेष्ठता पर उस तरह का विश्वास नहीं जम पाता जिस तरह के विश्वास को दर्शकों से पाने की फ़िल्म की इच्छा है| नायिका को माध्यम सुर लगाने में कठिनाई की बात करते नायक को देख लगता नहीं कि वह इतना बड़ा गायक और संगीतकार है| अगर फ़िल्म नायक को एकदम नया गीत गाते दिखता तो दर्शकों के सामने यह कठिनाई न आती|
फ़िल्म – Music Teacher, मुख्यतः देवदास का ही एक आधुनिक संस्करण या रूपांतरण या व्याख्या है| थोड़े बहुत बदलाव के साथ देवदास के चोले में नायक – बेनी माधव (मानव कौल), नायिका की भूमिका में ज्योत्सना (अमृता बागची) और चंद्रमुखी के अवतार में गीता (दिव्या दत्ता) हैं|
प्रेम का प्रत्युत्तर प्रेम ही हो सकता है, होता है| उत्तरोत्तर विकसित होते प्रेम में भी समय (टाइमिंग) का बड़ा महत्त्व है| प्रेम में पड़े दोनों पक्षों को कदमताल करनी पड़ती है| प्रेम के बीच में किसी भी पक्ष की ओर से किसी भी तरह का अवरोध – किन्तु परन्तु, इच्छाएं, आकांक्षाएं, महत्वाकांक्षाएं, और हिचक आदि, आ जाए तो प्रेम के बढ़ते कदम भी हिचकिचा जाते हैं| उसके बाद प्रेम दुखद कथा बन रह जाता है, जो दोनों पक्षों को सताता है| उनके निजी अहंकार, आत्मसम्मान, और स्वभाव की रुकावटें मसले को और जटिल बनाती जाती हैं|
अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ
~ मुसव्विर सब्ज़वारी
इसका सबसे सटीक उदाहरण देवदास की कथा है| पारो की अनुपस्थिति देवदास को उसके अपने जीवन के नग्न यथार्थ के सम्मुख ला खड़ा करती है| बिना पारो वह स्वाभाविक रूप से जीवन जीने के लिए समर्थ नहीं है| उसके दुख और संताप से भरे जीवन में उसके कष्ट पाते मन का ध्यान भटकाने के लिए चंद्रमुखी उसके जीवन में आती है, जो उसके संग सच्चे प्रेम का अनुभव भी करती है, लेकिन देवदास उसके प्रेम के प्रत्युत्तर में उससे वैसा प्रेम नहीं कर सकता| उसकी साँसे पारो संग प्रेम में अटक चुकी हैं, बस इस बात का एहसास उसे पारो को जाने के बाद हुआ|
सोलन में शास्त्रीय संगीत परंपरा के संगीतज्ञ पिता से संगीत सीख कर बेनी को मुंबई में फिल्मों में संगीत देने, या गीत गाने के सपनों को स्थगित पिता की मृत्यु के कारण सोलन में ही रहना पड़ता है (ऐसा वह नायिका ज्योत्सना को बताता है)| अब वह एक दो ट्यूशन करके थोडा बहुत कमाते हुए भी उसे आशा है कि उसे संगीत की दुनिया में बड़े अवसर मिलेंगे| ज्योत्सना को संगीत सिखाने का काम मिल जाने से बने गुरु-शिष्य संबंध में प्रेम की नैतिकता पर न जाएँ तो ज्योत्सना स्पष्ट रूप से अपने से कई साल बड़े अपने संगीत शिक्षक, दोस्त और गाइड से उस पर मोहित होने की सीमा तक प्रभावित रहती है, गुरु लजीला है और संगीत पर ध्यान केन्द्रित करते रहना चाहता है लेकिन यह दोनों को पता है कि दोनों एक दूसरे की आवश्यकता बनते जा रहे हैं| उनकी नजदीकी ज्योत्सना की माँ को पसंद नहीं लेकिन बेटी के हठ के कारण उसका बेनी से संगीत सीखना चलता रहता है| बेनी अपनी शिष्या को प्रतियोगी संगीत में प्रस्तुत कर उसे आगे बढ़ाना चाहता है, जहाँ उसे मुंबई जाने का अवसर मिले| उसके दिमाग में है कि ज्योत्सना वहां गाना गाने का अवसर भी पायेगी तो उसके लिए भी रास्ता खुलेगा|
ज्योत्सना के दिल और दिमाग में ऐसी कोई योजना नहीं है| वह वर्तमान में पूर्ण संतुष्ट और प्रसन्न है| उसे वर्तमान जीवन आनंददायक लगता है जहाँ वह अपने सबसे पसंदीदा व्यक्ति के साथ नित्य घंटो बिताती है, प्रसन्नता के लिए संगीत सीखती है| वह जीवन के इसी रूप को आगे बढ़ाना चाहती है, और इसी स्थिति का ठहराव चाहती है|
इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
~ अकबर इलाहाबादी
स्थानीय प्रतियोगिता में ज्योत्सना गाना नहीं चाहती, क्योंकि उसे आभास है कि उसका संगीत में आगे बढ़ना उनके बीच दूरियां लाएगा ही लाएगा| पर बेनी को तो उसे आगे बढ़ाना है ताकि उसके सहारे वह भी बढ़ सके|
इश्क़ में कौन बता सकता है
किस ने किस से सच बोला है
~ अहमद मुश्ताक़
प्रतियोगिता में ज्योत्सना विजेता बनती है| अब ज्योत्सना के पास मुंबई जाने का निमंत्रण है| वह जाना नहीं चाहते| उसके लिए प्रेम महत्वपूर्ण है और उसका संगीत में व्यवसायिक जीवन गौण|
पारो की तरह स्वंय ही पहल कर ज्योत्सना बेनी से स्पष्ट कहती और पूछती है कि वह उससे विवाह क्यों नहीं कर लेता? प्रेम के सामने व्यवहारिक बातों को हटाकर, दिल में प्रेम के भावों से भरी वह आयी थी प्रेम प्रस्ताव रखने लेकिन प्रत्युत्तर में बेनी के सामने संगीत को लेकर उसके स्वप्न आ गए| सोलन में उसे कोई अच्छा भविष्य भी नहीं दिखाई देता होगा| वह उसे जबरदस्ती मुंबई भेज देता है यह हिदायत देकर कि वहां वह उसके काम को भी लोगों को सुनवाने की कोशिश करे| वह देख नहीं पाया कि प्रेम प्रस्ताव ठुकराने से आहत ज्योत्सना को स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि वहां से जाना उनके बीच के संबंध में जुदाई का जनक होगा|
सालों बीत जाते हैं, सोलन में नाकाम बेनी रह रहा है, और मुंबई में ज्योत्सना सफलता की सीढियां चढ़ती जा रही है, गायन की दुनिया में एक सफल सितारा बन चुकी है| बेनी के लिखे खतों का कोई जवाब कभी नहीं आया|
मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था
~ अंजुम रहबर
अब वास्तविकता उसके सामने मुंह बाए खड़ी है| छोटी बहन का विवाह करना है और आमदनी के नाम उसके पास संगीत सिखाने के नाम पर दो तीन ट्यूशन हैं| उसकी माँ को लगता है कि बेनी ने ही ज्योत्सना को संगीत सिखाया और सफल होकर वह उसे भूल गयी| सोलन भर को गुरु को गुड और चेली को शक्कर होते देखने में आनंद आता है, बेनी को ज्योत्सना के नाम छेड़ा जाता है|
दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं
लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं
~ क़तील शिफ़ाई
उसे लगता है कि शायद कभी ज्योत्सन उसके जीवन में पुनः लौटेगी| पर ऐसा एकदम से तो हो नहीं रहा|
न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ
इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं
~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
प्रेत जैसा जीवन जीता नाकाम बेनी शाम को अकेले में अपनी पसंद के गीत गुनगुना लिया करता है, जिन्हें सुनकर उसके पड़ोसी की बहुत साल बाद वहां रहने लौटी पड़ोसन गीता उसके जीवन में आती है| उसके जीवन के सच भी बेनी को सोलनवासियों से पता लगते हैं| दुखी ह्रदय एक दूसरे में राहत पाते हैं| गीता बेनी से आगे देख पाने में समर्थ है| परिस्थितियों में एक आशा बंधी रहती है, पर सबकी आशाएं तो अलग- अलग होती हैं| गीता के सामने एकदम निश्चित है कि उसका भूतकाल अब कभी उसके जीवन में वर्तमान बन कर नहीं लौटेगा, पर बेनी को अपने जीवन के भूतकाल से कुछ आशा बंधी रहती है| दोनों अपने अपने कारणों से वर्तमान में एक संबंध से घिर जाते हैं|
पूरा सोलन इस खबर से उत्तेजित है कि ज्योत्सना उनके नगर में एक प्रोग्राम में भाग लेने आ रही है| इस खबर मात्र से बेनी के जीवन में उथल-पुथल मच गयी है| वहां आते हुए दिल्ली में एक राष्ट्रीय अखबार को साक्षात्कार देते हुए ज्योत्सना ने अपने सारी सफलता का श्रेय अपने गुरु बेनी माधव को दिया है| इस खबर को पढने से बेनी के अन्दर ज्योत्सना के प्रति नकारात्मकता की बर्फ पिघल जाती है और भावनाओं के समुद्र में ज्वारभाटा दिखने लगता है|
जो पहले दिखाया करता था कि उसकी हालत एक शेर जैसी है –
ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में
~ जौन एलिया
वह अब मन में चाह रहा है कि काश ऐसा शेर उसकी भावनाओं को व्यक्त करे
आरज़ू है कि तू यहाँ आए
और फिर उम्र भर न जाए कहीं
~ नासिर काज़मी
उसके सामने उसका पहले का अनुभव भी है जब ज्योत्सना उसके पास बिलकुल इसी बात को कहने आयी थी| पर तब उस पर उसे संगीत की दुनिया में सफल बनाना और उसके माध्यम से स्वंय भी कुछ कर दिखाने का सपना सवार था|
ज्योत्सना के जिस कार्यक्रम की वजह से उसने अपनी बहन की शादी उसी तारीख पर खिसका ली थी जिससे अगर ज्योत्सना उससे मिलने न आये तो सोलन वासी उसे ताने न दे सकें, क्योंकि वह तो अपनी बहन की शादी में व्यस्त था| ज्योत्सना का साक्षात्कार अखबार में पढ़कर वह किसी धुन में पोस्ट बॉक्स में उसके नाम अपनी बहन की शादी का निमंत्रण पत्र डाल देता है|
शादी के दिन किसी काम की वजह से घर से बाहर जाकर लौटने के बाद वह आश्चर्य में पड़ जाता है जब उसे पता चलता है कि उसकी अनुपस्थिति में ज्योत्सना वहां आयी थी और एक मंहगा हार उपहार में दे गयी है|
अब तो सुप्त प्रेम जागना ही है, उसके अन्दर आशा जागती है| शादी की रस्में बीच में ही छोड़ उसे ज्योत्सना का कार्यक्रम देखने सुनने जाना है| कैसी हालत एक कमोर स्थिति में रह रहे प्रेमी की हो जाती है| वह पूरी तरह ज्योत्सना की इच्छा पर निर्भर है|
स्टेज पर ज्योत्सना को गाते देखता है, जहाँ वह पूरे आत्मविश्वास से गीत गा रही है| आज बेनी का ध्यान उसके गायन की गुणवत्ता पर नहीं है| उसकी हालत ऐसी है –
आज देखा है तुझ को देर के बअ’द
आज का दिन गुज़र न जाए कहीं
~ नासिर काज़मी
वह हॉल के दरवाजे से हटकर स्टेज के साइड में चला जाता है जहाँ स्टेज पर गाती ज्योत्सना उसे देख पाती है| सैंकड़ों लोगों की भीड़ के सामने दो जोड़ी आँखों में आंसू छलक उठते हैं| ज्योत्सना की भीगी आँखें बेनी को ही आश्वस्त नहीं कर रहीं बल्कि दर्शकों को भी अपेक्षा दे रही हैं कि शायद उनका सुखद मिलन हो जाएगा और यह एक सुखान्त प्रेमकथा बन जायेगी|
गाना समाप्त होते ही ज्योत्सना बेनी को लेकर अपने लिए निर्धारित कक्ष में आ जाती है| बनी बहुत कुछ कहता है जिसका सारांश ऐसा ही है –
तुम क्या जानो अपने आप से कितना मैं शर्मिंदा हूँ
छूट गया है साथ तुम्हारा और अभी तक ज़िंदा हूँ
~ साग़र आज़मी
ज्योत्सना भी बहुत कुछ कहती है जिसका सारांश ऐसा शेर ही व्यक्त्त कर सकता है –
वही कारवाँ वही रास्ते वही ज़िंदगी वही मरहले
मगर अपने अपने मक़ाम पर कभी तुम नहीं कभी हम नहीं
~ शकील बदायूनी
बेनी की कोशिशें ज्योत्सना की निगाहों में उसके कद को गिरा रही हैं इसलिए वह उसे आग्रहपूर्वक रोक देती है| आज उसे प्रेम रहने के बावजूद मेल की गुंजाईश नहीं दिखाई देती| जिस मार्ग पर बेनी ने अभी उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती भेजा था वहां से उसका लौटना अब संभव नहीं|
कई साल पहले प्रतियोगिता में जाने से पहले ज्योत्सना उससे वचन लेती है कि अगर वह जीत गयी तो वह सिगरेट पीना छोड़ देगा| वह उनकी अंतिम मुलाक़ात थी, उसके सालों बाद यह जीवन भर की अंतिम मुलाक़ात हो सकती है| प्रेम में प्रेमियों के मध्य कदमताल न हो तो यह दुखांत ही होती है|
ये मोहब्बत की कहानी नहीं मरती लेकिन
लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं
~ अब्बास ताबिश
आज बरसों से पाली कुंठा, निराशा, और एक क्षीण उम्मीद, इन सभी के गिर जाने के बाद, बेनी सिगरेट सुलगता है एक कश लेता है और अपने वादे को याद कर उसे फेंक देता है| अब उसे अपने बलबूते ही बाकी का जीवन काटना है, इसका वह जो चाहे बना ले| उसे अंदाज़ा नहीं है कि उसके जीवन में आये अचानक से आये बदलाव की तासीर भांप कर गीता भी जा चुकी है|
बेनी की माँ पूछती है क्या वह खुश है? वह कहता है कि खुश है| उसकी माँ कहती है- बस खुश रहा कर|
लेखक निर्देशक सार्थक दासगुप्ता अगर बेनी और गीता के मध्य सांकेतिक दृश्यों के भरोसे ही रहते तो उनकी फ़िल्म का असर बढ़ जाता| गीता के ससुर के अचानक कक्ष के बाहर आ जाने से उनके चौंक कर भयभीत हो जाने से जो प्रभाव पड़ता वह दृश्यों को खुले रूप में दिखाने से कमजोर हो गया, अब दर्शकों को तो पहले से पता है, अतः बुजुर्ग के दृष्टिकोण का खास महत्त्व नहीं रहा|
यह उनकी सफलता है कि वे एक सतत प्रवाह वाली ऐसी फ़िल्म बना पाए जिसके हर दृश्य से अनकहा रह गया या रखा गया भाव भी दर्शक तक सफलतापूर्वक पहुँच जाता है|
ओटीटी और डिजिटल सिनेमा के आगमन से यह लगभग निश्चित है कि अच्छा सार्थक सिनेमा एक आर्ट फॉर्म के रूप में और एक स्वतंत्र विधा के रूप में कम बजट के साथ ऐसे माध्यमों के सहारे ही जीवित रहेगा|
…[राकेश]
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