छोटी मगर गहरे भाव और अर्थ अपने में समाहित की हुयी कविता का उदाहरण देखना हो तो प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल की कविता “जो मेरे घर नहीं आयेंगें” तुरंत सामने आ जाती है| उनकी कविता दृश्यात्मक होते-होते एक अन्य दिशा पकड़ लेती है और पढने-सुनने वाले के मन में बनते दृश्य बिगड़ने लगते हैं और शब्दों के माध्यम से अर्थों की कुंडलियाँ खुलनी शुरू हो जाती हैं| उफनती नदी घर नहीं आयेगी तो कवि नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाने की कल्पना करते हैं|
जो लोग लगातार काम करते रहते हैं, शायद किन्हीं जिम्मेदारियों के कारण उन्हें भी आराम के क्षण चाहियें| फुर्सत से उनके पास गया कोई व्यक्ति भले उनका दिल बहलाने जाए लेकिन वह एक विषम व्यक्तित्व लगेगा उनके बंधे बंधाये ढ़र्रे से चलते जीवन में, लेकिन जो ऐसे जाएगा कि उनसे मिलने जाना उसका जरुरी काम है, वह शायद उनको अपने साथ आराम के कुछ क्षण व्यतीत करने के लिए व्यस्तता से इधर खींच ले|
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा
एक उफनती नदी कभी नहीं आयेगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा
पहाड़, टीले, चट्टान, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव – गाँव, जंगल- गलियाँ जाऊँगा|
जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फुरसत से नहीं
उनसे एक जरूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा|
(विनोद कुमार शुक्ल)
Discover more from Cine Manthan
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Leave a comment