और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं
लोग मिलते हैं, जुदा होते हैं

कब बिछड़ जाए, हमसफ़र ही तो है
कब बदल जाए, एक नज़र ही तो है
जान-ओ-दिल जिसपे फ़िदा होते हैं

और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं

जब रुला लेते हैं जी भर के हमें
जब सता लेते हैं जी भर के हमें
तब कहीं ख़ुश वो ज़रा होते हैं

और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं

…[राकेश]


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